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मुंह पर गीला कपड़ा बांधा, घुटनों के बल अंदर घुसे:एक-एक को बाहर निकाला, 11 बच्चों को बचाने वाले 3 डॉक्टरों की कहानी

मुंह पर गीला कपड़ा बांधा, घुटनों के बल अंदर घुसे:एक-एक को बाहर निकाला, 11 बच्चों को बचाने वाले 3 डॉक्टरों की कहानी

झांसी3 घंटे पहलेलेखक: सचिन सिंह

लोग चीख रहे थे, आग लग गई…शोर सुनकर मैं भी वार्ड तक पहुंचा। अंदर घुसा तो वहां का टेम्प्रेचर करीब 70°C रहा होगा। लगा कि शरीर झुलस जाएगा। कदम पीछे करना पड़ा, तभी एक अटेंडेंट से गमछा लिया। गीला करके उसे मुंह पर लपेटा। फिर अंदर गया। बच्चे लपटों से घिरे हुए थे। उन्हें बाहर पहुंचाया।’

झांसी मेडिकल कॉलेज अग्निकांड में 11 नवजातों को बचाने वाले डॉ. हिमांशु गौतम न्यूरो डिपार्टमेंट में जूनियर रेजिडेंट हैं। उनके साथ डॉ. नीरज शर्मा और डॉ. नितिन उस ऑपरेशन का हिस्सा रहे, जिसमें 39 बच्चों का रेस्क्यू किया ने रेस्क्यू ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाने वाले 3 डॉक्टरों से अलग-अलग बात की।

ये तस्वीरें वार्ड में अग्निकांड के बाद की हैं। हादसा रात में 10.30 बजे हुआ। दूसरे दिन सुबह डिप्टी CM ब्रजेश पाठक मौके पर पहुंचे थे।

वार्ड जल रहा था, हम अंदर नहीं जा पा रहे थे हमने सबसे पहले डॉ. हिमांशु गौतम से बात की। उन्होंने बताया- 15 नवंबर की रात करीब 10:30 बज रहे थे, मैं खाना खाने के बाद टहलते हुए अपने घरवालों से बात कर रहा था। तभी शोर होने लगा कि आग लग गई…सब चिल्ला रहे थे। मैं भागते हुए शिशु वार्ड के बाहर पहुंचा तो एंट्रेंस पर काफी ज्यादा धुआं था। मैं वार्ड में किसी तरह दाखिल हुआ। अंदर की तरफ आग लगी हुई थी। वहां बहुत ज्यादा धुआं था। कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।

बाहर बहुत लोग खड़े थे। कोई भी अंदर घुस नहीं पा रहा था, क्योंकि आग की वजह से गर्मी बहुत ज्यादा हो गई थी। टेम्प्रेचर करीब 70°C से ज्यादा रहा होगा। वार्ड में रखी मशीनें जल रही थीं।

अंदर पानी डालने वाले भी हम ही लोग थे हिमांशु कहते हैं- हम कुछ जूनियर डॉक्टरों ने धीरे-धीरे अंदर घुसने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो पा रहे थे। तब पुलिसवालों से एक लाइट ली, एक अटेंडेंट का गमछा लिया। गमछे को गीला करके मुंह पर बांधा। कपड़े भी पूरे गीले किए, फिर नीचे जमीन पर बैठकर अंदर घुसे, क्योंकि आग में टेम्प्रेचर ऊपर ज्यादा होता है, नीचे कम।

कमरे में पहुंचे तो वेंटिलेटर पर बच्चे रखे हुए थे। उन्हें उठाकर बाहर भेजना शुरू किया। तभी किसी ने एक विंडो तोड़ी और वहां से एक पानी का पाइप आया। हम लोगों ने ही आग पर पानी डाला और टेम्प्रेचर को कम किया। फिर देखा तो कुछ दूरी पर 7 से 8 बच्चे और दिखे। उन्हें खिड़की से बाहर पहुंचाया। मैं 6 बच्चों को बाहर निकाल सका।

डॉ. हिमांशु गौतम ने कहा – हमें जो समझ में आया, हमने किया। जिन्हें बचा सकते थे, बचा लिया।

अचानक चक्कर आए, 4 घंटे ऑक्सीजन पर रहा, अब ठीक हूं डॉक्टर हिमांशु ने आगे बताया- वार्ड के अंदर 5 से 7 मिनट लग गए। मेरा दम घुटने लगा, फिर भी मैं बच्चों को उठाकर बाहर पहुंचाता रहा। जली हुई प्लास्टिक की दुर्गंध मेरे अंदर भर गई थी।

इस वजह से मेरे शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो गई और मुझे चक्कर आना लगा। तब साथियों ने मुझे एडमिट करा दिया। 4 घंटे भर्ती रहा, ऑक्सीजन लगी रही, फिर मैं ठीक हो गया। अब मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने मुझे 2 दिन से रेस्ट पर रखा है।

डॉ. नितिन ने कहा- मैं पहले भी वहां ड्यूटी कर चुका था। सारे रास्ते जानता था, इसका फायदा मिला।

डॉ. नितिन बोले- मैंने 3 नवजात को बचाया बालरोग विभाग के जूनियर डॉक्टर नितिन ने बताया- मेरी इमरजेंसी में नाइट ड्यूटी चल रही है। जब आग लगी तो मैं ड्यूटी पर था। मेरे साथी का कॉल आया कि बच्चा वार्ड में आग लगी है, जो कंट्रोल नहीं हो रही है। जल्दी आओ। हम तुरंत भागे और एक से डेढ़ मिनट में पहुंच गए। जब हम पहुंचे तो आग अच्छी-खासी फैल चुकी थी। वार्ड दो हिस्सों में था, आगे वाला हिस्सा खाली हो चुका था। अंदर ICU में बच्चे फंसे थे।

कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। डर का माहौल था, सिर्फ चीखें सुनाई दे रही थी। चूंकि मैं वहां पहले काम कर चुका था, इसलिए मुझे सारे रास्ते पता थे। मैंने रूमाल को पानी में भिगोया और मुंह पर बांध लिया। फिर बैठकर ICU में पहुंचा, जहां बच्चे फंसे थे। मैंने 3 बच्चों को निकाला।

डॉ. नीरज ने कहा- वार्ड में मोबाइल की रोशनी में अंदर गए।

डॉक्टर नीरज बोले – मोबाइल की रोशनी में 2 बच्चे ही निकाल सका बालरोग विभाग के जूनियर डॉक्टर नीरज ने बताया- जब आग लगी तो लाइट काट दी गई थी। चारों ओर धुआं था। हम लोगों ने मुंह पर कपड़े बांधे और मोबाइल की रोशनी में अंदर घुस गए। हमारी कोशिश थी कि बच्चों को बचा लें, लेकिन दो ही बच्चे निकाल सका। धुएं से आंखों में जलन होने लगी। बाद में फायर सर्विस आ गई तो उन्होंने मदद की।

नवजात बच्चों को निकालने के बाद हम लोग तुरंत उनको इमरजेंसी में ले गए और उनका इलाज शुरू किया। इसके बाद एक वैकल्पिक SNIU बनाया और वहां पर बच्चों को एडमिट कर इलाज शुरू किया।

बच्चों को बचाने में डॉ. हिमांशु, डॉ. नितिन की तबीयत बिगड़ गई। उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी। उन्होंने 4 घंटे इलाज कराया और फिर बच्चों का इलाज करने में जुट गए।

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