हिंदू हैं, भारतीय भी, लेकिन साबित करना पड़ रहा:असम में रहीम ही नहीं, शंकरी और ममता भी नागरिकता के लिए तरसे
तारीख: 28 दिसंबर, 2021 जगह: असम के नलबाड़ी जिले का काशिमपुर गांव
रहीम अली की उम्र 58 साल थी। रहीम उम्रभर अवैध नागरिक के टैग के साथ जिए। इसी टैग के साथ दफना दिए गए। 12 साल बाद 11 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भारतीय नागरिक करार दिया, तब तक रहीम को दुनिया छोड़े दो साल बीत चुके थे।
ये कहानी सिर्फ रहीम अली की नहीं है। उनकी तरह ही असम में रहने वाली शंकरीबाला दास, ममता और अरुण जैसे हजारों लोग खुद को भारतीय साबित करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अभी दो दिन पहले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने असम के बारपेटा जिले के 28 लोगों को अवैध प्रवासी बता दिया। इन्हें ट्रांजिट कैंप भेज दिया गया क्योंकि वे खुद को भारतीय साबित नहीं कर सके।
फरवरी, 2024 में असम सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वोटर लिस्ट में करीब 97 हजार डी-वोटर्स हैं। इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल हैं। ये कई साल से अपने अधिकार पाने के लिए लड़ रहे हैं। न ये वोट डाल सकते हैं और न ही इन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा मिल रहा है।
इनमें से कई तो अब CAA के तहत नागरिकता मांग रहे हैं। वहीं, कुछ का मानना है कि हम तो भारतीय हैं, फिर कैसे CAA के तहत नागरिकता ले सकते हैं। दैनिक भास्कर ने असम में कुछ ऐसे ही परिवारों से मुलाकात की।
पहली कहानी कछार की अंजलि रॉय की…
खुद को भारतीय साबित करने के लिए 9 साल लड़ाई लड़ी
2012 में सिलचर के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल- 4 ने अंजलि की नागरिकता पर सवाल उठाया था। उसी साल उनके नाम पर एक नोटिस जारी हुआ और वोटर लिस्ट से नाम भी हटा दिया गया।
नोटिस में लिखा था कि आपने तय समय में अपनी नागरिकता के बारे में पूछताछ या सत्यापन के दौरान पुलिस के सामने कोई वैलिड डॉक्यूमेंट पेश नहीं किए। आप पर अवैध प्रवासी होने का संदेह है।’
60 साल की अंजलि ने 2015 में कानूनी लड़ाई शुरू की। वे बताती हैं, ‘मैं अपने परिवार में नोटिस पाने वाली पहली सदस्य थी। 2012 में ही मेरे भाई अर्जुन नामसूद्रा और 2022 में मेरी मां अकालरानी नामसूद्रा को नोटिस मिला। मां को 83 साल की उम्र में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल जाना पड़ा।’
‘मैंने और मां ने केस लड़ा और साबित किया कि हम भारतीय नागरिक हैं। भाई अपमान बर्दाश्त नहीं कर सके। उन्होंने आत्महत्या कर ली। अंजलि बताती हैं, ‘एक वक्त तो मुझे भी लगा कि मेरे भाई का खुदकुशी का फैसला सही है। हमें लग रहा था कि सरकारी सिस्टम हमें भारतीय मानने को तैयार नहीं है।’
अंजलि के परिवार में उनके पति को छोड़कर बाकी सभी सदस्यों को आधार कार्ड देने से मना कर दिया गया। अंजलि कहती हैं, ‘मैं अवैध प्रवासी नहीं हूं, ये साबित करने में मुझे करीब 10 साल लगे। इसके बाद मुझे वोट देने का अधिकार मिला।’
वोटर लिस्ट में 2024 में जुड़ा अंजलि का नाम
हमने अंजलि के वकील अनिल डे से बात की। अनिल ने हमें उनकी कानूनी लड़ाई के बारे में बताया। अंजलि भारत-बांग्लादेश इंटरनेशनल बॉर्डर के पास कछार के कटिगोराह इलाके से हैं। उनका घर बराक घाटी में है, जहां बंगाली हिंदुओं और मुस्लिमों की बड़ी आबादी रहती है।
अनिल बताते हैं, ‘हमने नागरिकता साबित करने के लिए अंजलि का बर्थ सर्टिफिकेट जमा किया और साबित किया कि उसके पिता का जन्म भारत में ही हुआ था। पड़ोसियों ने भी उसके पक्ष में गवाही दी। फिर अंजलि इलेक्शन ऑफिस के बूथ लेवल ऑफिसर से मिलीं। उनसे वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने का अनुरोध किया। वोटर लिस्ट में नाम न होने की वजह से अंजलि को सभी सरकारी सुविधाएं नहीं मिल पाईं।’
अंजलि के केस को लेकर सोशल एक्टिविस्ट कमल चक्रवर्ती कहते हैं, ‘थक हारकर अंजलि रॉय ने नागरिकता संशोधन अधिनियम, यानी CAA के तहत नागरिकता के लिए अप्लाई करने की इच्छा जताई थी।’
कमल बताते हैं, ‘अफसरों ने बताया कि 2024 के आम चुनावों के लिए लिस्ट पहले ही तैयार हो चुकी है। अंजलि का नाम आगे होने वाले किसी चुनाव से पहले ही शामिल किया जा सकता है।’
चुनाव आयोग ने हाल ही में एक उपचुनाव की घोषणा की, जिसमें कछार का धोलाई भी शामिल है। इस वजह से पोर्टल फिर से खोला गया।
कमल बताते हैं, ‘हमने इसका फायदा उठाया और अंजलि का नाम शामिल करने के लिए आवेदन किया। उनका नाम लिस्ट में आ गया। उन्होंने वोटर आईडी कार्ड डाउनलोड कर लिया।’
अंजलि की मां और परिवार के बाकी मेंबर कछार के कटिगोराह चुनाव क्षेत्र के हरितिकर गांव में रहते हैं। भारत सरकार ने यहां 173 परिवारों को जमीन दी थी। ये परिवार पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से पलायन करके आए थे और बॉर्डर के पास शरणार्थी शिविरों में रह रहे थे।
हालांकि अंजलि के परिवार के सदस्यों को पिछले कुछ साल में डी-वोटर नोटिस मिले है। उनमें से कई राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में नाम भी नहीं दर्ज करा सके।
बोंगाईगांव की शंकरीबाला दास की कहानी…
80 हजार रुपए खर्च, भारतीय होने की पहचान नहीं मिली
असम में बंगाली हिंदुओं के ऐसे और भी मामले हैं, जो CAA के तहत नागरिकता की मांग कर रहे हैं। हम बोंगाईगांव में कुछ परिवारों से मिले, जो कई साल से नागरिकता को लेकर फॉरेन ट्रिब्यूनल में केस लड़ रहे हैं। उनमें से कुछ ने एक या दो साल डिटेंशन कैंप में भी बिताए हैं।
बोंगाईगांव जिले में रहने वाली 72 साल की शंकरीबाला दास का परिवार खुद को भारतीय साबित करने के लिए कोर्ट-कचहरी में अब तक 80 हजार रुपए खर्च कर चुका है। शंकरीबाला को 2019 में एक नोटिस मिला था। उनके माता-पिता और भाई-बहन पहले ही गुजर चुके हैं।
शंकरीबाला दास का जन्म बाघपोर गांव में हुआ था। जिस जगह पर उनका जन्म हुआ, वहां अब नदी है। उनका पुराना घर बाढ़ में डूब चुका है। अब बाघपोर गांव बेकी नदी के अंदर है। उनके बेटे निताई दास बताते हैं कि कानूनी लड़ाई में इतना पैसा खर्च हो चुका है, तो आगे भी हम लड़ते रहेंगे। निताई भले ही कानूनी लड़ाई जारी रखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें CAA के तहत नागरिकता से भी परहेज नहीं है।
शंकरीबाला ही नहीं, कई ऐसे लोग है जो फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के चक्कर और डिटेंशन सेंटर में रहने के बाद CAA के तहत भारत की नागरिकता लेने के लिए तैयार हैं। ये लोग कई साल से खुद को भारतीय साबित करने में लगे हैं। इनके केस फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में चल रहे हैं।
हालांकि CAA के तहत नागरिकता लेना भी आसान नहीं है। डी-वोटर पहले कोर्ट में साबित कर रहे थे कि वो भारतीय नागरिक हैं, लेकिन उन्हें CAA के तहत नागरिकता लेनी है, तो ये भी साबित करना होगा कि वे भारत के नागरिक नहीं है। साथ ही 2014 के पहले भारत में आए थे।
आखिर में अरुण और ममता की कहानी…
डाउटफुल वोटर, फिर भी वोट दे रहे, सरकार मांग रही नागरिक होने का सबूत
58 साल अरुण सूत्रधार बोंगाईगांव जिले के दौतोला बाजार गांव के रहने वाले हैं। उनके पास आधार कार्ड और वोटर आईडी है। फिर भी सरकार की नजर में वे डाउटफुल वोटर हैं। 2019 में असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन यानी NRC लागू किया गया, तब अरुण को इसके लिए रिजेक्ट कर दिया गया।
2019 में ही पुलिस अचानक अरुण को उठा ले गई और डिटेंशन सेंटर में डाल दिया। अरुण 2 साल के बाद घर लौट सके। सरकार की नजर में अरुण को वोट देने का अधिकार नहीं है, लेकिन उन्होंने लोक सभा चुनाव में भी वोट दिया था। उनके पास सभी दस्तावेज हैं, जो किसी भारतीय नागरिक के पास होने चाहिए।
अरुण बताते हैं, ‘थाने ले जाने के बाद मुझे डाउटफुल वोटर कहा गया। डिटेंशन सेंटर में मुझे जेल के कैदियों के साथ रखा गया। एक साल बाद मुझे बैरक में शिफ्ट कर दिया। मैं बेल पर बाहर आ गया, लेकिन केस अभी कोर्ट में है।’
अरुण को हर हफ्ते नजदीकी थाने में हाजिरी लगानी होती है। केस खत्म होने तक वे कहीं और शिफ्ट भी नहीं हो सकते।
अरुण के घर से कुछ कदम दूर हमारी मुलाकात ममता से हुई। उनकी मुश्किल भी यही है। वे सरकार की नजर में डाउटफुल वोटर हैं, लेकिन वोट दे रही हैं। ममता की पैदाइश 1977 की है। उनके पास 1966 से लेकर सभी दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए उन्हें लड़ाई लड़नी पड़ रही है। 2020 में ममता को पहली बार खुद को भारतीय साबित करने का नोटिस मिला।
एक्टिविस्ट बोले- ज्यादातर डाउटफुल वोटर गरीब परिवारों से
डी वोटर करार दिए गए लोगों से बात करने के बाद हम लोकल एक्टिविस्ट अमृत से मिले। वे बताते हैं कि जितने भी लोगों को सरकार ने डाउटफुल वोटर बनाया है, वे सभी गरीब परिवारों के हैं। उनके पास कानून की ज्यादा समझ नहीं है।
अमृत से हमारी मुलाकात बोंगाईगांव में हुई थी। वे कहते हैं, ‘सरकार लोगों को भ्रम में रख रही है। सभी केस सरकार पहले ही कोर्ट में भेज चुकी। फिलहाल कोई ऐसा नया केस न है और न आएगा।’
CAA पर अमृत कहते है, ‘इस कानून में सरकार को बिना किसी सवाल के नागरिकता देनी चाहिए। 2014 के पहले भारत आने वाली पाबंदी नहीं होनी चाहिए। 2014 के बाद भी तो लोग प्रताड़ित हो सकते हैं। साथ ही वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी CAA के तहत नागरिकता देनी चाहिए।’
बंगाली हिंदुओं पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में नहीं चलेगा मुकदमा
असम के गृह और राजनीतिक विभाग ने 5 जुलाई को कहा था कि 2014 से पहले भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई लोगों के नागरिकता मामलों को सीधे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को न भेजा जाए। इसके बजाय इन्हें CAA के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने को प्रोत्साहित करें।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भी कह चुके हैं कि बंगाली हिंदू समुदाय के लोग जो NRC में शामिल नहीं हैं, वे नागरिकता के लिए CAA के तहत आवेदन नहीं करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मैंने कई लोगों से मुलाकात की। वे बता रहे हैं कि हम भारतीय नागरिकता के बारे में आश्वस्त हैं और इसे अदालत में साबित करना चाहते हैं।
