Headlines

बद्रीनाथ धाम के पुजारी बोले- अविमुक्तेश्वरानंद ही हमारे शंकराचार्य:UP के मंत्री ने कहा था- हम नहीं मानते; उत्तराखंड के मंत्री बोले- सीएम से पूछकर बताऊंगा

बद्रीनाथ धाम के पुजारी बोले- अविमुक्तेश्वरानंद ही हमारे शंकराचार्य:UP के मंत्री ने कहा था- हम नहीं मानते; उत्तराखंड के मंत्री बोले- सीएम से पूछकर बताऊंगा

तुहिन शर्मा, देहरादून43 मिनट पहले
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद यूपी से उत्तराखंड तक जा पहुंचा है। बद्रीनाथ धाम उन्हें शंकराचार्य मान रहा है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद अब यूपी से निकलकर उत्तराखंड तक पहुंच गया है। यूपी के मंत्री धर्मपाल सिंह जहां साफ कह चुके हैं कि सरकार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं मानती।

वहीं, बद्रीनाथ धाम से जुड़ी डिमरी पंडितों की पंचायत अविमुक्तेश्वरानंद को ही शंकराचार्य मान रही। यही वजह है कि उन्हें गाड़ू कलश (तेल कलश) यात्रा में शामिल होने का आमंत्रण दिया जा चुका है।

डिमरी समाज का कहना है कि उनका फैसला किसी मंत्री या सरकार के बयान के आधार पर नहीं, सनातन परंपरा के अनुसार होता है। शंकराचार्य की पहचान आस्था और परंपरा से तय होती है, न कि राजनीतिक या प्रशासनिक रुख से।

इसी बीच दैनिक भास्कर एप ने उत्तराखंड सरकार में धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज से सवाल किया कि क्या आप अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानते हैं? इस पर उन्होंने कहा- मैं इस मामले में सीएम धामी से पूछकर बताऊंगा। वहीं, श्री बद्री-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) ने इसे तीर्थ पुरोहितों का निजी धार्मिक निर्णय बताते हुए टिप्पणी से दूरी बना ली।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद पर बोलते उत्तर प्रदेश के मंत्री धर्मपाल सिंह।

‘हम सरकार के अधीन नहीं, परंपरा के अधीन हैं’ हमने सबसे पहले श्री बद्रीनाथ डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी से बात की। उन्होंने 25 जनवरी को अविमुक्तेश्वरानंद को बद्रीनाथ के कपाट खुलने से पहले होने वाली गाड़ू कलश यात्रा का न्योता भेजा है।

उन्होंने साफ कहा कि वे किसी मंत्री के बयान से नहीं, बल्कि सनातन परंपरा से चलते हैं। उन्होंने कहा- यूपी के मंत्री का अपना मत हो सकता है। लेकिन, हम प्रमाणिकता के आधार पर बात करते हैं। 2022 में ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी के दो ही शिष्य थे- एक सदानंद सरस्वती और दूसरे अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। एक को द्वारका और दूसरे को ज्योतिषपीठ की जिम्मेदारी दी गई। हम सनातनी और परंपरावादी लोग हैं। हमारे लिए वे शंकराचार्य हैं।

‘यह मेरी निजी जागीर नहीं, डिपार्टमेंट और सीएम से पूछकर ही बता पाऊंगा’ इस मामले पर उत्तराखंड के धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने कहा- उत्तराखंड सरकार अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानती है या नहीं, इस पर मैं अभी कोई राय नहीं दे सकता। मुझे पहले डिपार्टमेंट (विभाग) का व्यू लेना पड़ेगा। यह कोई मेरी निजी प्रॉपर्टी का मामला नहीं है। जब तक मैं अधिकारियों और सीएम (मुख्यमंत्री) से बात नहीं कर लेता, मैं कुछ नहीं कह सकता।

निमंत्रण की बात पर उन्होंने कहा कि वह निमंत्रण मंदिर समिति (BKTC) ने नहीं दिया है। वह डिमरी समाज का अपना निजी निमंत्रण है। रही बात शंकराचार्य मानने की, तो यह मामला अभी सब-जुडिस (न्यायालय में विचाराधीन) है। पट्टाभिषेक के मामले पर कोर्ट का क्या वर्डिक्ट (फैसला) है, उसका अध्ययन करना पड़ेगा।

‘जिन्होंने बुलाया है…उनसे पूछिए, मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा’ बद्री-केदार मंदिर समिति (BKTC) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी से इस मामले पर बात की गई तो वे इस मुद्दे पर पूरी तरह ‘नो कमेंट’ मोड में नजर आए। उन्होंने कहा, यूपी के मंत्री क्या कह रहे हैं, उसका जवाब वही दे पाएंगे। हम सभी संतों का सम्मान करते हैं। लेकिन यह निमंत्रण समिति की तरफ से नहीं गया है। यह पंचायत की यात्रा है। आप उन्हीं से पूछें तो ज्यादा बेहतर होगा। मैं इस विवाद में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।

क्या है गाड़ू घड़ा यात्रा जिसमें बुलाए गए अविमुक्तेश्वरानंद

  • टिहरी के नरेंद्र नगर के राजमहल में गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत होती है। यहां डिमरी सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर पारंपरिक विधि से तिल का तेल निकालती हैं। तेल निकालने में किसी भी तरह की मशीन का इस्तेमाल नहीं होता। शुद्धता बनाए रखने के लिए महिलाएं मुंह पर पीला कपड़ा बांधती हैं। सिलबट्टा, ओखली और हाथों से तेल तैयार किया जाता है।
  • तैयार तिल के तेल को चांदी के कलश में भरा जाता है, जिसे गाड़ू घड़ा कहा जाता है। डिमरी पुजारी समुदाय की अगुवाई में इस कलश को सजे-धजे रथ में रखकर यात्रा शुरू होती है। यह यात्रा विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए बद्रीनाथ धाम तक पहुंचती है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के दिन इसी पवित्र तिल के तेल से भगवान बद्री विशाल का अभिषेक किया जाता है। इसके साथ चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।
मुंह ढक तिल कूटती महिलाएं। फाइल फोटो

इस बार गाड़ू घड़ा यात्रा का शेड्यूल

गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत 7 अप्रैल को टिहरी के नरेंद्र नगर स्थित राजमहल से होगी। इसी दिन परंपरा के अनुसार भगवान बद्री विशाल के अभिषेक में इस्तेमाल होने वाला तिल का तेल विधि-विधान से पिरोया जाएगा और चांदी के कलश में भरकर गाड़ू घड़ा तैयार किया जाएगा।

अगले दिन, 8 अप्रैल को गाड़ू घड़ा यात्रा ऋषिकेश पहुंचेगी, जहां श्री बद्री-केदारनाथ मंदिर समिति के विश्राम गृह में इसे श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसी प्रस्थान कार्यक्रम में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है।

इसके बाद 23 अप्रैल को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर बद्रीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। कपाट खुलने के दिन इसी पवित्र तिल के तेल से भगवान बद्री विशाल का अभिषेक किया जाएगा और इसके साथ ही चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाएगी।

कौन हैं डिमरी ब्राह्मण, क्या है उनका इतिहास…

  • आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ा है उद्गम: डिमरी ब्राह्मणों का संबंध आदि गुरु आदि गुरु शंकराचार्य की परंपरा से माना जाता है। मान्यता है कि जब शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार धामों और पीठों की स्थापना की, उसी समय यह व्यवस्था बनाई गई कि उत्तर भारत के प्रमुख मंदिरों में दक्षिण भारत के पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिरों में उत्तर भारत के पुजारी सेवा करेंगे। इसी परंपरा के तहत बद्रीनाथ धाम में मुख्य पुजारी केरल के नंबूरी ब्राह्मण होते हैं, जिन्हें रावल कहा जाता है।
  • दक्षिण भारत से गढ़वाल आए, डिम्मर गांव में बसे: डिमरी ब्राह्मण मूल रूप से द्रविड़ ब्राह्मण माने जाते हैं। मान्यता के अनुसार, ये कर्नाटक के संतोली क्षेत्र से आदि गुरु शंकराचार्य के साथ सहायक अर्चक के रूप में गढ़वाल आए थे और बाद में वापस नहीं लौटे। इसके बाद ये चमोली जिले में कर्णप्रयाग के पास पट्टी तली चांदपुर के डिम्मर गांव में बस गए। गांव के नाम पर ही यह समुदाय आगे चलकर डिमरी ब्राह्मण कहलाया।
  • बद्रीनाथ की परंपराओं में आज भी अहम भूमिका: भगवान बद्रीनारायण से जुड़ी प्राचीन परंपराओं के निर्वहन में डिमरी ब्राह्मणों की आज भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले गाड़ू घड़ा यात्रा की शुरुआत डिमरी बारीदार ही करते हैं। इसके अलावा भगवान को भोग अर्पित करने और कई प्रमुख धार्मिक रस्मों के संचालन का अधिकार भी डिमरी पंडितों के पास सुरक्षित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Budget 2024