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सेक्स वर्कर्स नहीं देंगी दुर्गा प्रतिमा के लिए मिट्टी:बोलीं- इंसाफ नहीं, तो मिट्टी भी नहीं; कोलकाता रेप-मर्डर पर ममता से नाराज

ग्राउंड रिपोर्ट

सेक्स वर्कर्स नहीं देंगी दुर्गा प्रतिमा के लिए मिट्टी:बोलीं- इंसाफ नहीं, तो मिट्टी भी नहीं; कोलकाता रेप-मर्डर पर ममता से नाराज

कोलकाता11 घंटे पहलेलेखक: शिवांगी सक्सेना और शुभम बोस

‘आरजी कर हॉस्पिटल की उस महिला डॉक्टर को इंसाफ नहीं मिला। डॉक्टर तो भगवान जैसा होता है। लोग जब उसका सम्मान नहीं कर सकते, तो हम मिट्टी किसलिए दें। अगर अगले साल तक भी उस डॉक्टर को इंसाफ नहीं मिला, तो हम अगले साल भी मिट्टी नहीं देंगे।’

सुषमा (बदला हुआ नाम) कोलकाता के रेडलाइट एरिया सोनागाछी में रहती हैं। हर साल दुर्गा प्रतिमा के लिए अपने घर से मिट्टी देती थीं। इस बार उन्होंने साफ मना कर दिया। दुर्गा प्रतिमा बनाने में लगने वाली 10 तरह की मिट्टी में एक रेड लाइट एरिया की भी होती है। सुषमा की तरह बाकी सेक्स वर्कर्स भी इस बार मिट्टी नहीं देंगी। ये सभी ममता सरकार से नाराज हैं।

पश्चिम बंगाल में हर साल दुर्गा पूजा धूमधाम से मनती है, लेकिन इस बार माहौल अलग है। 9 अगस्त को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर से रेप-मर्डर की घटना हुई। इसके विरोध में कोलकाता में रोज धरना, प्रदर्शन और मार्च निकाले जा रहे हैं है। इसका असर दुर्गा पूजा पर भी दिख रहा है।

ममता सरकार दुर्गा पूजा के लिए हर इलाके के लोकल क्लब को 85 हजार रुपए देती है, लेकिन घटना के चलते कई क्लब ने ये पैसे लेने से भी मना कर दिया है। हर साल इस समय तक दुर्गा पूजा पंडालों को 70-80% स्पॉन्सरशिप मिल जाती थी। इस बार सिर्फ 40-45% मिल पाई है। लिहाजा, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की 50 हजार करोड़ रुपए की इकोनॉमी खतरे में है। 20 लाख लोगों का रोजगार भी दांव पर है।

पश्चिम बंगाल में 7 अक्टूबर से दुर्गा पूजा शुरू होनी है। इसके लिए तैयारियां कैसी चल रही हैं और आरजी कर हॉस्पिटल की घटना का क्या असर है, ये जानने के लिए दैनिक भास्कर ने दुर्गोत्सव फोरम, कारीगरों, पूजा में ढाक बजाने वाले और सोनागाछी की महिलाओं से बात की।

सबसे पहले बात सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स की… दुर्गा पूजा में परंपरा है कि मां की प्रतिमा के लिए मिट्टी सेक्स वर्कर्स के घर से लाई जाती है। इसलिए हम सबसे पहले कोलकाता के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया सोनागाछी पहुंचे। कुछ सेक्स वर्कर्स से बात की।

यहां मिलीं सुषमा बताती हैं, ‘दुर्गा पूजा में समाज के हर वर्ग की हिस्सेदारी होती है। राजा, दलित सभी को बराबर का हक दिया गया है। यही वजह है कि सेक्स वर्कर्स के घर से मिट्टी लाकर मां दुर्गा की मूर्ति तैयार की जाती है। आरजी कर हॉस्पिटल में महिला डॉक्टर के साथ जो हुआ, उसके बाद हमने मिट्टी देने से मना कर दिया है।’

चंचल (बदला हुआ नाम) कहती हैं, ‘आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर को तड़पाकर मारा गया। बंगाल में महिलाएं सेफ नहीं हैं। हम तो सेक्स वर्कर्स हैं, फिर हम भला कैसे सुरक्षित महसूस करेंगे। हम चाहते हैं कि महिलाओं के लिए सुरक्षा के बेहतर इंतजाम हों। हम इसीलिए सरकार के खिलाफ विरोध कर रहे हैं।’

दुर्गोत्सव फोरम ने कहा- इस साल कोविड से भी बदतर हालात आरजी कर हॉस्पिटल में हुई घटना को एक महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इसका असर पूजा पंडालों की स्पॉन्सरशिप पर भी पड़ा है। कपड़े, सजावट और पूजा के सामान की खरीदारी कम हो रही है। मूर्तिकारों और ढोल बजाने वालों को काम नहीं मिल रहा। इनकी कमाई दुर्गा पूजा के वक्त ही होती है।

हर साल इस समय तक दुर्गा पूजा पंडालों को 70-80% स्पॉन्सरशिप मिल जाती थी, लेकिन इस बार हालात बदल गए हैं। हमने फोरम फॉर दुर्गोत्सव के जनरल सेक्रेटरी शाश्वत बासु से बात की है। फोरम फॉर दुर्गोत्सव, राज्य में पूजा आयोजकों का संगठन है।

बासु बताते हैं, ‘इस बार अब तक सिर्फ 40-45% स्पॉन्सरशिप ही मिल पाई है। इसका असर दुर्गा पूजा से जुड़े व्यवसायों पर देखने को मिल रहा है।’

बासु कहते हैं, ‘ये साल कोरोना वाले दौर से भी बुरा है। उस वक्त तो हमने अपनी इच्छा से बजट में कटौती की थी। इस बार आरजी कर हॉस्पिटल में हुई घटना की वजह से स्पॉन्सर पैसा देने से डर रहे हैं।’

बासु लोगों से अपील कर रहे हैं कि आरजी कर हॉस्पिटल में जो हुआ, उसे दुर्गा पूजा से न जोड़ें।

वे आगे कहते हैं, ‘राज्य में हर साल दुर्गा पूजा पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं। पंडाल, मूर्ति, लाइट और सजावट पर ही 1600 करोड़ का खर्च आता है। इस बजट का 60% पैसा स्पॉन्सरशिप से आता है। ये कंपनियां ज्यादातर मुंबई और बेंगलुरु की होती है। स्पॉन्सरशिप गणेश पूजा खत्म होने के बाद दी जाती है।’

‘इस बार कई कंपनियों ने बदनामी या किसी कंट्रोवर्सी में पड़ने से बचने के लिए स्पॉन्सरशिप रोक ली या वापस ले ली। लोकल लेवल पर TMC के कार्यकर्ता जोर-शोर से पूजा में हिस्सा लेते हैं। वे पूजा करने से लेकर चंदा जमा करने और चंदा देने तक में आगे रहते हैं। इस बार लोग इससे बचना चाहते हैं।’

दुर्गा पूजा कराने वाले क्लब नाराज, ममता की मदद ठुकराई दुर्गा पूजा के लिए ममता बनर्जी की सरकार हर इलाके के लोकल क्लब को हर साल 85 हजार रुपए देती है। इस आयोजन से 20 लाख लोगों का रोजगार जुड़ा रहता है। इसमें मजदूर, इलेक्ट्रिशियन, पंडाल की सजावट करने वाले, ढोल बजाने वाले, दुकानदार, मूर्तिकार और पुजारी शामिल हैं।

आरजी कर की घटना के बाद कई क्लब ने घटना के विरोध में ममता सरकार से मिलने वाली मदद लेने से इनकार कर दिया है। इस पर ममता बनर्जी ने कहा-

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जिन पूजा समितियों ने सरकारी मदद लेने से इनकार कर दिया, उन्हें लिस्ट से हटा दिया जाएगा। नई पूजा समितियां बनाई जाएंगी और उन्हें लिस्ट में जोड़ा जाएगा।

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मूर्तिकारों को दुर्गा प्रतिमा की कीमत नहीं मिल रही, ऑर्डर भी कम मूर्तिकारों से बात करने हम बेलगरिया इलाके के रबिन्द्राकनन पहुंचे। मूर्तिकार गोपाल पाल बताते हैं, ‘सबसे ज्यादा असर हम पर ही पड़ा है। हमें अगस्त की शुरुआत में ही ऑर्डर मिल जाते थे। इस बार मुझे 12 ऑर्डर मिले थे। इनमें अलग-अलग आकार और थीम की मूर्तियां शामिल हैं, लेकिन मेरे आधे ऑर्डर कैंसिल हो गए।’

‘कुछ ऑर्डर का तो मैंने काम भी शुरू कर दिया था। किसी मूर्ति में मां के पैर बन गए थे, तो किसी में चेहरा। पिछले दो हफ्तों से पैसों की कटौती की वजह से 4 ऑर्डर ही बचे हैं। हर साल मैं 10 से 15 लाख रुपए कमा लेता था। इस बार क्लब ने ममता का पैसा लौटा दिया। लोग इसी पैसे से मूर्ति खरीदते थे। मेरी एक मूर्ति 50 हजार रुपए से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक में बिकती है।’

‘इस बार सभी ऑर्डर छोटी मूर्तियों के हैं। कमाई न होने से हम परेशान हैं। कोविड-19 के बाद से ये पहला मौका है, जब हमें अपनी मूर्तियां कम कीमत पर बेचनी पड़ रही हैं।’

गोपाल के पास में बैठे अशोक पाल भी मूर्ति बना रहे थे। वे कहते हैं, ‘इस बार अब तक लोग ऑर्डर देने नहीं आए। इस वक्त तो हमारे पास खाना खाने का भी टाइम नहीं होता था। मेरे पास हर साल 20 ऑर्डर आ जाते थे। ये सभी बड़ी मूर्तियों के होते थे, जो बड़े पंडालों में बैठाई जाती हैं।’

‘इस बार मैं सिर्फ 5 मूर्तियां बना रहा हूं। पैसे भी पहले से कम मिल रहे हैं। इतने कम ऑर्डर तो कोविड-19 के बाद हुई दुर्गा पूजा में भी नहीं मिले थे। तब भी मुझे 12 ऑर्डर मिले थे। हम सब भी आरजी कर अस्पताल में हुई घटना के विरोध में हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि लोग दुर्गा पूजा से इसे अलग रखें। दुर्गा पूजा बंगाल की परंपरा और स्वाभिमान का प्रतीक है।’

पारंपरिक ढाक बजाने वालों को नहीं मिल रहा काम मां दुर्गा की पूजा ढाक बजाकर की जाती है। ढाक, ढोल जैसा ही होता है। इसे दुर्गा पूजा, काली पूजा और चरक पूजा पर बजाया जाता है। ये दुर्गा पूजा का अहम हिस्सा है। ये इसलिए भी खास है क्योंकि ढाक को दलित समाज के लोग बजाते हैं। हमने बेलगरिया में ढाकी वालों से बात की।

श्यामल नट्टा पिछले 20 साल से ढाक बजा रहे हैं। वे बताते हैं, ‘दुर्गा पूजा पर ढाक बजाना शुभ माना जाता है। इसके बिना दुर्गा पूजा नहीं होती। इसे सिर्फ दलित समाज के लोग ही बजाते हैं। हम पूरे साल खाली बैठते हैं। हमारी कमाई दुर्गा पूजा पर ही होती है।’

‘हम 5 से 10 लोगों के ग्रुप में अलग-अलग पंडालों में ढाक बजाते हैं। सिर्फ 10 दिन की कमाई एक से डेढ़ लाख रुपए हो जाती है। हम एक पंडाल से 10 से 12 हजार रुपए लेते हैं। इस बार कोई प्री-ऑर्डर नहीं मिला है।’

श्यामलाल आगे कहते हैं, ‘हमारा घर इसी से चलता है। अगर हम ढाक नहीं बजाएंगे तो क्या खाएंगे। हमारे पास कोई दूसरा काम-धंधा नहीं है। कई पंडालों ने पैसे में कटौती की है। मैंने अपने पुराने साहब को भी कॉल किया, जो श्यामबाजार में पंडाल लगाते हैं, लेकिन उन्होंने अब भी प्री-बुकिंग करने से मना कर दिया है। उन्होंने कहा कि बाद में बताएंगे।’

‘मैंने बहुत लोगों को कॉन्टैक्ट किया है। कुछ लोगों ने एडवांस देने से मना कर दिया। अब जिसके पास पैसा होगा, वो हमें बुलाएगा। अगर उनके पास पैसा नहीं होगा तो हमें ही तकलीफ होगी। इस बार बुकिंग नहीं मिल रही। पिछले साल 15 -16 जगह से बुकिंग आई थी। इस बार अब तक सिर्फ 5 लोगों ने बुक कराया है।’

वे आगे कहते हैं, ‘आरजी कर अस्पताल में जो हुआ, उसके लिए आवाज उठानी जरूरी है। साल में एक ही बार पूजा होती है। सब साल भर इसका इंतजार करते हैं। पहले पंडाल के लिए लोग लोकल नेताओं और कार्यकर्ताओं से चंदा लेते थे। वे लोग अच्छा पैसा देते थे। इस बार किसी भी पॉलिटिकल पार्टी और नेता से पैसा नहीं लिया जा रहा। ऐसे में पैसे की कमी तो होगी ही।’

‘क्लब के लोग कहते हैं हमारे पास एक रुपया होगा, उसी से पूजा करेंगे। किसी पॉलिटिकल पार्टी से पैसा नहीं लेंगे। ऐसे में हम क्या करेंगे। हमारा बहुत नुकसान हुआ है। कोई काम नहीं मिल रहा।’

बाजारों में पहले से कम भीड़, पंडालों की संख्या भी घटी दुकानदारों से बात करने हम श्यामबाजार और बड़ाबाजार पहुंचे। यहां लोग कैमरे पर आने से हिचकिचा रहे थे। बहुत कोशिश के बाद हमारी मुलाकात पार्थो घोष से हुई, जो ज्वेलरी शॉप चलाते हैं। उन्होंने बताया, ‘बड़ाबाजार में लगभग रोजाना प्रदर्शन और मार्च होता है। शाम को यहां जाम लग जाता है, इसलिए लोग आने से बच रहे हैं।’

’वे सोचते हैं कि यहां से अच्छा है कि मॉल या पार्क स्ट्रीट की तरफ चले जाएं। वहां शोरूम हैं। दुर्गा पूजा पर हर तरफ सेल लगती है, लेकिन फिर भी लोग सड़क पर दुकानों से ही सामान खरीदते हैं।’

यहीं मिले जीतू गोस्वामी कहते हैं, ’इस बार लोगों में आरजी कर केस को लेकर गुस्सा है और वो दिख भी रहा है। हम भी प्रदर्शन में शामिल हुए थे। अब ये हमारे रोजगार को प्रभावित कर रहा है। मार्केट सामान्य ढंग से लगती है। लोग भी आ रहे हैं, लेकिन अभी लोगों का आना कम है। जगह-जगह प्रदर्शन के चलते ट्रैफिक से बचने के लिए लोग ऑनलाइन ही मंगा लेते हैं।’

हॉस्पिटल में ट्रेनी डॉक्टर से रेप और मर्डर, इसी से भड़का गुस्सा 31 साल की ट्रेनी डॉक्टर कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में काम करती थी। चेस्ट मेडिसिन डिपार्टमेंट में PG सेकेंड ईयर की स्टूडेंट थी। शुक्रवार, 9 अगस्त को हॉस्पिटल के सेमिनार हॉल में उसकी डेडबॉडी मिली।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि मर्डर से पहले उससे रेप किया गया था। शरीर पर चोट और खंरोच के कई निशान थे। चेहरे और आंखों पर खून के धब्बे थे। प्राइवेट पार्ट से खून बह रहा था। गर्दन की हड्डी भी टूटी हुई थी।

मर्डर का आरोप कोलकाता पुलिस में सिविल वॉलंटियर संजय पर है। 33 साल का संजय अभी पुलिस की गिरफ्त में है। वो बेरोकटोक हॉस्पिटल में जाता था। खुद को पुलिसवाले की तरह दिखाता था। कोलकाता पुलिस की टीशर्ट पहनता था और बाइक पर भी कोलकाता पुलिस का टैग लगा रखा था। घटना के बाद से ही देश भर में प्रोटेस्ट शुरू हो गया। पश्चिम बंगाल में डॉक्टर हड़ताल पर चले गए थे।

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