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MP में​​​​​​​ भाजपा की पहली लिस्ट का एनालिसिस:शिवराज को दिल्ली का बुलावा; 5 सीटें क्यों छोड़ीं, 6 सांसदों के टिकट क्यों काटे, जानें

21 जनवरी को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन से ओरछा जा रहे थे। ट्रेन में ही मैंने उनसे सवाल किया था- ‘ये ट्रेन भी दिल्ली जा रही है। कभी दिल्ली का भी टिकट बनवाएंगे?’ ‘जब जरूरत पड़ेगी तो दिल्ली जाएंगे।’ शिवराज के इस अधूरे जवाब को पार्टी ने पूरा कर दिया है- उनकी जरूरत अब मध्यप्रदेश में नहीं, दिल्ली में है।

लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची में मध्यप्रदेश की राजनीति के सबसे कठिन सवाल का जवाब मिल गया है कि आखिर शिवराज की नई भूमिका क्या होगी?

भाजपा की पहली सूची से ऐसे ही कई सवालों के जवाब आए तो कुछ नए सवाल भी खड़े हुए हैं। 8 सवालों के जवाब में मध्यप्रदेश में भाजपा की 24 प्रत्याशियों की लिस्ट का एनालिसिस…

1. सबसे बड़ा सवाल- पांच सीटों को होल्ड पर क्यों रखा?

इंदौर, उज्जैन, धार, छिंदवाड़ा और बालाघाट। ये वो पांच सीटें हैं, जहां पार्टी ने अभी प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं। पहला संकेत तो यही मिल रहा है कि यहां मौजूदा सांसद का टिकट संकट में है। वैसे हर एक सीट का अपना अलग चुनावी गणित है। इस गणित को सीट के हिसाब से समझते हैं…

  • छिंदवाड़ा : भाजपा अपने लिए एकमात्र चुनौती छिंदवाड़ा को मानती है। पार्टी जीत के लिए ‘कुछ भी’ कर सकती है। इस ‘कुछ भी’ की वजह से ही कमलनाथ और नकुलनाथ को लेकर तमाम तरह की खबरें चली थीं। हालांकि पिता-पुत्र ने भाजपा में जाने की अटकलों को खारिज कर दिया। पार्टी ने यहां प्रत्याशी की घोषणा नहीं अभी अपना दरवाजा खुला रखा है।
  • इंदौर : यहां ‘ताई’ यानी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और ‘भाई’ यानी कैलाश विजयवर्गीय के बीच नाम को लेकर सहमति नहीं बनने की बात सामने आ रही है। एक धड़ा मौजूदा सांसद के पक्ष में तो दूसरा खेमा नए चेहरे के लिए जोर लगा रहा है। सिंधी जाति का समीकरण भी एक फैक्टर है।
  • उज्जैन : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह नगर वाली इस सीट को होल्ड पर रखना जरूर चौंका रहा है। मौजूदा सांसद अनिल फिरोजिया की जगह किसी महिला प्रत्याशी को मौका देने की बात सामने आई थी, लेकिन संघ परिवार की वजह से आलोट विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने दिल्ली जाने के लिए पूरी ताकत लगा दी है, वहीं फिरोजिया भी डटे हुए हैं।
  • धार : यह सीट भाजपा के लिए रेड जोन में है। विधानसभा चुनाव के रिजल्ट ने यहां पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। संसदीय क्षेत्र में आने वाली आठ में से पांच सीटें कांग्रेस ने जीतीं। लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो यहां पार्टी वोटों के हिसाब से माइनस में रही। अब पार्टी यहां ऐसे आदिवासी चेहरे को लाना चाहती है जो विधानसभा चुनाव के वोट के घाटे को पूरा कर सके।
  • बालाघाट : पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने अपनी बेटी मौसम के लिए महिला कोटे का हवाला देते हुए पूरी ताकत लगा दी है। मौसम को विधानसभा चुनाव में टिकट दिया गया था, लेकिन स्वास्थ्य की वजह से वे पीछे हट गईं। पिता गौरीशंकर बिसेन चुनाव लड़े, मगर हार गए। वहीं प्रदेश संगठन भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वैभव पंवार के पक्ष में है, इसी वजह से यहां पेंच फंस गया।

2. छह सांसदों के टिकट काटने की क्या वजह रही?

प्रज्ञा सिंह ठाकुर (भोपाल) : भोपाल सांसद अपने बयानों के कारण पूरे कार्यकाल में विवादों में रहीं। गोडसे पर बयान देने के चलते पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे उन्हें कभी माफ नहीं कर पाएंगे। माना जा रहा था कि उन्हें दोबारा मौका नहीं मिलेगा, ऐसा ही हुआ।

विवेक शेजवलकर (ग्वालियर) : मेयर रह चुके शेजवलकर 76 साल के हो चुके हैं। ऐज फैक्टर के चलते वे बाहर हुए। यहां विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की पसंद से उम्मीदवार तय हुआ।

राजबहादुर सिंह (सागर) : परफॉर्मेंस के मामले में पीछे रहे। पिछली बार शिवराज सरकार में मंत्री रहे भूपेंद्र सिंह की पसंद से राजबहादुर सिंह को टिकट मिला था। इस बार ओबीसी महिला के कोटे से लता वानखेडे़ को मौका मिल गया।

डॉ. केपी यादव (गुना) : 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया को केपी यादव ने हराया था। 2020 में सिंधिया कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा में आ गए। सिंधिया अपनी परंपरागत सीट को अपने कब्जे में रखने और राजनीतिक करियर पर लगे हार के टैग को हटाना चाहते हैं। ऐसे में बीजेपी ने सिंधिया की इच्छा का ध्यान रखा।

रमाकांत भार्गव (विदिशा) : शिवराज को टिकट देने के लिए भार्गव का टिकट काटना स्वाभाविक था। रमाकांत, शिवराज सिंह चौहान के करीबी हैं और विदिशा शिवराज की परंपरागत सीट।

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