भागवत बोले- न रिटायर हो रहा, न किसी से कहा:संघ चाहे तो 75 की उम्र के बाद भी काम करूंगा; भाजपा-RSS में मनभेद नहीं
मैंने यह नहीं कहा कि मैं रिटायर हो जाऊंगा या किसी और को रिटायर हो जाना चाहिए। मैं 80 की उम्र में भी शाखा लगाऊंगा। हम किसी भी समय रिटायर होने के लिए तैयार हैं। संघ हमसे जिस भी समय तक काम कराना चाहेगा, हम काम करने के लिए तैयार हैं।

यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को संघ के शताब्दी वर्ष पर दिल्ली के विज्ञान भवन में चल रही व्याख्यानमाला के आखिरी दिन कही। भागवत सवालों के जवाब दे रहे थे, उनसे पूछा गया था कि क्या 75 के बाद राजनीति से रिटायर हो जाना चाहिए।
भागवत ने यह भी कहा कि भाजपा और संघ में कोई विवाद नहीं है। हमारे भाजपा सरकार ही नहीं, सभी सरकारों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। हमारे बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं हैं।
सरकार में फैसले लेने के सवाल पर भागवत ने कहा कि यह कहना गलत है कि सरकार में सब कुछ संघ तय करता है। हम सलाह दे सकते हैं, लेकिन फैसले वे ही लेते हैं। हम तय करते तो इतना समय नहीं लगता।
PM-CM को जेल जाने पर पद से हटाने वाले नए बिल पर संघ प्रमुख ने कहा कि नेतृत्व-नेताओं की छवि साफ होना चाहिए। इस पर कानून बने या नहीं, ये संसद तय करेगी।
कार्यक्रम की 4 तस्वीरें…
भागवत की स्पीच की मुख्य बातें…
- अन्य राजनीतिक दलों के साथ संबंध: प्रणव मुखर्जी जब संघ के मंच पर आए तो संघ के प्रति उनकी गलतफहमी दूर हो गई थी। अन्य राजनैतिक दलों के भी मन परिवर्तन हो सकते हैं। अच्छे काम के लिए जो मदद मांगते हैं उन्हें मदद मिलती है। और यदि हम मदद करने जाते हैं और जो मदद नहीं लेना चाहते उन्हें मदद नहीं मिलती।
- हिंदू-मुस्लिम एकता पर: नाम और शब्दों के झगड़े में हम नहीं पड़ते। इन शब्दों के कारण हिंदू-मुस्लिम की भावना आ गई है। हिंदू-मुस्लिम एकता की जरूरत नहीं है ये तो पहले से एक हैं। इनकी सिर्फ पूजा बदली है। लेकिन जो डर भर दिया है कि ये लोग रहेंगे तो क्या होगा, इतनी लड़ाई हुई, अत्याचार हुआ इतने कत्लेआम हुए, देश भी टूटा।
- डेमोग्राफी में बदलाव पर: डेमोग्राफी की चिंता है। ये बदलती है तो देश का बंटवारा होता है। चिंता इसलिए भी होती है कि जनसंख्या से ज्यादा इरादा क्या है। धर्म अपनी चॉइस है। लोभ-लालच से धर्म नहीं बदला जाना चाहिए, इसे रोकना है।
- घुसपैठ पर: ये सच है कि हमारा सबका DNA एक है, लेकिन देश अलग-अलग होते हैं। यूरोप में भी तीन-चार देश ऐसे हैं जिनके DNA एक हैं। लेकिन DNA एक होने का मतलब ये नहीं कि घुसपैठ की जाए, नियम-कानून तोड़कर नहीं आना चाहिए। परमिशन लेकर ही आना चाहिए। घुसपैठ को रोकना चाहिए। इसके लिए सरकार कोशिश कर रही है।
- शहरों-रास्तों के नाम बदलने पर: शहरों और रास्तों के नाम बदलना वहां के लोगों की भावना के हिसाब से होना चाहिए। आक्रांताओं के नाम नहीं होने चाहिए। इसका मतलब ये नहीं कि मुसलमान का नाम नहीं होना चाहिए।
- अखंड भारत पर: अखंड भारत एक राजनीतिक विचार नहीं है, क्योंकि अखंड भारत जब था तब भी अलग अलग राजा थे, लेकिन जनता किसी भी राज्य में जाकर नौकरी करती थी और जीवनयापन करती थी। अखंड भारत की भावना फिर से आ जाएगी तो सब सुखी रहेंगे और दोस्त बढ़ जाएंगे। अखंड भारत है ये समझकर हमको चलना चाहिए।
- काशी-मथुरा आंदोलन पर: संघ किसी आंदोलन में नहीं जाता। सिर्फ राम मंदिर आंदोलन में शामिल हुए और उसे अंत तक ले गए। बाकी आंदोलनों में संघ नहीं जाएगा, लेकिन हिंदू मानस में काशी-मथुरा और अयोध्या तीनों का महत्व है। इसलिए हिंदू समाज इसका आग्रह करेगा।
- हथियार बढ़ाने पर: संघ शांति की बात करता है, हम बुद्ध के देश हैं। और हथियार बढ़ाने का मतलब युद्ध करना नहीं है; खुद की रक्षा करना भी है, क्योंकि दुनिया के सभी देश बुद्ध के देश नहीं हैं।
- जनसंख्या के मुद्दे पर: जनसंख्या नीतियों की अनुशंसा की जाती है। परिवारों में तीन बच्चे होने चाहिए, लेकिन इससे अधिक नहीं। इससे संतुलन बनाए रखने और समुचित विकास सुनिश्चित करने में मदद मिलती है। अभी जन्म दर में गिरावट आ रही है और हिंदुओं में यह गिरावट तेजी से बढ़ रही है।
- तकनीक और शिक्षा नीति पर: तकनीकी शिक्षा का विरोध नहीं है, लेकिन नई तकनीक का सदुपयोग हो। हमारे यहां विदेशी शिक्षा लाई गई, जिससे हम अंग्रेजों के गुलाम बने रहें। नई शिक्षा नीति में पंचकोशीय शिक्षा का कॉन्सेप्ट रखा गया है। जैसे कला, खेल और योग। अपनी संस्कृति की शिक्षा देना जरूरी है। इंग्लिश एक भाषा है, भाषा सीखने में समस्या नहीं होनी चाहिए। इंग्लिश के लिए हिंदी नहीं छोड़ना चाहिए। भारत को जानना है तो संस्कृत का ज्ञान जरूरी है।
भागवत का पहले 2 दिन का संबोधन….
27 अगस्त: संघ जितना विरोध किसी संगठन का नहीं हुआ
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने बुधवार को कहा- जितना विरोध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का हुआ है, उतना किसी भी संगठन का नहीं हुआ। इसके बावजूद स्वयंसेवकों के मन में समाज के प्रति शुद्ध सात्विक प्रेम ही है। इसी प्रेम के कारण अब हमारे विरोध की धार कम हो गई है।
अमेरिकी टैरिफ विवाद के बीच उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता जरूरी है, देश आत्मनिर्भर होना चाहिए। स्वदेशी चीजों का मतलब विदेशों से संबंध तोड़ना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार तो चलेगा, लेन-देन होगा, लेकिन किसी के दबाव में नहीं होगा।
26 अगस्त: सभी की श्रद्धा का सम्मान करें, हिंदू राष्ट्र का सत्ता से लेना-देना नहीं
मंगलवार को कार्यक्रम के पहले दिन सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि हिंदू वही है, जो अलग-अलग मान्यताओं वाले लोगों की श्रद्धा का सम्मान करे। हमारा धर्म सभी के साथ समन्वय का है, टकराव का नहीं।
उन्होंने कहा था कि पिछले 40 हजार वर्षों से अखंड भारत में रह रहे लोगों का DNA एक है। अखंड भारत की भूमि पर रहने वाले और हमारी संस्कृति, दोनों ही सद्भाव से रहने के पक्षधर हैं। भारत के विश्व गुरु बनने की बात पर कहा कि भारत को दुनिया में योगदान देना है और अब यह समय आ गया है।
मंगलवार को कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, अनुप्रिया पटेल, भाजपा सांसद कंगना रनौत और बाबा रामदेव समेत अन्य हस्तियां शामिल हुईं
कार्यक्रम में 1300 लोगों को निमंत्रण
संघ ने विभिन्न क्षेत्रों से 17 कैटेगरी और 138 सब-कैटेगरी के आधार पर 1300 लोगों को निमंत्रण भेजा है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी, क्रिकेटर कपिल देव और ओलिंपिक गोल्ड मेडलिस्ट अभिनव बिंद्रा इसमें भाग लेंगे।
कई देशों के राजनयिक भी मौजूद रहेंगे। साथ ही, कार्यक्रम में मुस्लिम, ईसाई, सिख समेत सभी धर्मों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
दरअसल, RSS की स्थापना 1925 में दशहरा के अवसर पर हुई थी। इस साल RSS की स्थापना को 100 साल पूरे हो रहे हैं। इसको लेकर संघ की ओर से शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है।
कार्यक्रम का शेड्यूल
RSS प्रवक्ता सुनील आंबेकर ने बताया कि भागवत इस दौरान देश के भविष्य, संघ की दृष्टि और स्वयंसेवकों की भूमिका पर विचार रखेंगे। तीसरे दिन वे प्रतिभागियों के सवालों के जवाब देंगे। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण मीडिया और सोशल मीडिया पर होगा। आगे ऐसी व्याख्यान श्रृंखलाएं बेंगलुरु, कोलकाता और मुंबई में भी आयोजित होंगी।
संघ सभी धर्म और वर्गों के बीच पैठ बनाना चाहता है
RSS का मानना है कि समाज से सीधा संवाद ही उनके विचार और दृष्टिकोण समझने का सबसे अच्छा तरीका है। यह आयोजन न सिर्फ संघ की 100 साल की यात्रा दिखाएगा, बल्कि धर्मों और वर्गों के बीच संवाद और सह-अस्तित्व की नई संभावनाओं को भी बढ़ावा देगा।
