मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने चार साल की मासूम से दुष्कर्म के आरोपी की सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान अफसोस जताते हुए कहा कि देश में नाबालिग अपराधियों के साथ नरमी बरती जा रही हैं। ऐसे अपराधों के पीड़ितों का दुर्भाग्य है कि विधानमंडल ने 2012 के निर्भया कांड की भयावहता से अभी तक कोई सबक नहीं सीखा।
कोर्ट ने जिस मामले में ये टिप्पणी की वो घटना 29 दिसंबर 2017 की है। 17 साल के नाबालिग आरोपी ने मासूम से दुष्कर्म किया था। निचली अदालत ने उसे 10 साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की थी। जिस पर 11 सितंबर को जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने सुनवाई करते हुए अपील खारिज कर ये टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी अभी 23 साल का है। जब उसने अपराध किया था तब उम्र 17 साल 3 महीने और 27 दिन थी। उसे निचली अदालत ने 2019 में रेप और पॉक्सो एक्ट में 10-10 साल की सजा सुनाई थी।
जुवेनाइल एक्ट में कोर्ट ने माना था दोषी हाई कोर्ट में यह बात भी आई कि यह घटना 29 दिसंबर 2017 को हुई थी, जब पीड़िता की मां ने अपनी चार वर्षीय बेटी को बेहोश पाया और उसके गुप्तांगों से खून बह रहा था। आरोपी ने 17 साल की उम्र में अपराध किया था।
दो साल के भीतर मई 2019 में जिला अदालत ने उसे जुवेनाइल एक्ट में दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी। जिला कोर्ट ने कहा था कि आरोपी की उम्र 21 साल होने तक उसे बाल सुधारगृह में रखा जाए। उसके बाद जेल में शिफ्ट कर दें।
बालगृह से भागने का मामला भी उठा इसी बीच, आरोपी जिला कोर्ट के फैसले के चार महीने के भीतर सितंबर 2019 में बाल सुधार गृह से सात अन्य के साथ फरार हो गया था। कोर्ट में उसकी इस हरकत को लेकर भी जानकारी दी गई कि आरोपी ने न सिर्फ अपराध किया, बल्कि 18 साल की आयु होने के बाद पुन: बालगृह से भागकर एक और अपराध किया।
आरोपी के वकील के तर्क खारिज किए आरोपी के वकील ने तर्क दिया था कि किराए के विवाद के कारण मामला गढ़ा गया है। वकील ने पीड़िता की उम्र के दस्तावेजों पर सवाल उठाया। इस पर अदालत ने कहा कि पीड़िता की मां जो खुद घटना के तुरंत बाद मौके पर पहुंची थी, जहां उसने आरोपी को अपनी बेटी के पास खड़ा पाया था। पहले से ही खून बह रहा था।
आरोपी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करने और असली अपराधी को बचाने का कोई कारण नहीं था। अपीलकर्ता को सही तरीके से दोषी ठहराया गया है। इसके अलावा अदालत ने मेडिकल गवाही और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर पीड़िता की उम्र को विश्वसनीय पाया।
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की, “अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र और उसे लगी चोटों की प्रकृति को पर्याप्त रूप से साबित कर दिया है, जो आरोपों की पुष्टि करता है।”
