लड़की के जैसे नैन-नक्श, वैसी कीमत:इंच-टेप के नाप से तस्कर तय करते हैं दाम, तब नेपाल से बॉर्डर पार यूपी भेजते हैं
लंबाई- 5 फीट 5 इंच। उम्र- 23 साल। वजन- 55 किलो। नीचे जो तस्वीर दिख रही है, उसमें एक तस्कर इंच-टेप से नेपाली लड़की का नाप ले रहा है। वह चेक करता है, लड़की के शरीर पर कोई दाग तो नहीं। नाप-जोख का वीडियो बनाता है। फिर भारत में बैठे दलाल को भेजकर रेट तय करता है। रेट 2 से लेकर 25 लाख रुपए तक होता है। लड़की को विश्वास दिलाया जाता है कि नौकरी के लिए यह सब जरूरी होता है
एक बार रेट तय हो गया तो लड़की को भारत-नेपाल क्रॉस कराकर यूपी लाया जाता है। यहां से पहले कोलकाता और दिल्ली-मुंबई के रेड लाइट एरिया में बेच दिया जाता है। फिर खाड़ी देशों से डिमांड आने पर वहां भेज दिया जाता है। हर साल 3 हजार से अधिक लड़कियां नेपाल से तस्करी कराकर भारत लाई जाती हैं। एनजीओ, पुलिस और एसएसबी करीब 500 ही लड़कियों को तस्करों से बचा पाती हैं।
दोनों मुल्कों के तमाम पहरे के बावजूद इस बॉर्डर पर की तस्करी समेत अवैध गतिविधियां चल रही हैं। ये सब कुछ कैसे होता है? लड़कियों को कैसे फंसाकर दूसरे देशों में भेजा जाता है? यह सब जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ने ‘अपराध का बॉर्डर’ बन चुकी यूपी-नेपाल की सीमा और आसपास के गांवों की 10 दिन पड़ताल की।
पहले पार्ट में पढ़िए नेपाली लड़कियों की तस्करी…
लड़कियों की कहानी जानने से पहले पढ़िए कैसे तस्करी का नेटवर्क काम कर रहा है
लड़कियों की तस्करी की कड़ियां जोड़ते हुए हमारी टीम लखनऊ से 220 किमी दूर सिद्धार्थनगर जिले के बढ़नी पहुंची। यह नेपाल के बॉर्डर से लगा हुआ कस्बा है। नेपाल की तरफ कृष्णनगर है, जो कपिलवस्तु जिले में आता है। हम बॉर्डर पर पहुंचे तो सशस्त्र सीमा बल (SSB) के जवान मिले। हमारी गाड़ी चेक की गई। डिटेल लेने के बाद बॉर्डर क्रॉस करके नेपाल में दाखिल हुए।
हमारा बड़ा सवाल था कि तस्कर लड़कियों को गांव से निकाल कर क्या सीधे बॉर्डर पार करा देते हैं? हम नेपाल के अंदर 80 किलोमीटर तक पहुंचे। यहां से पहाड़ी इलाके शुरू हो जाते हैं। तस्करी के रूट और तरीके जानने के लिए गांववालों और तस्करी से जुड़े लोगों से बात की। कोई कैमरे पर आने के लिए तैयार नहीं हुआ। गांव वालों ने कहा, अगर तस्करों को पता चल जाएगा कि उन्होंने कुछ बताया है, तो मुसीबत में पड़ जाएंगे।
फिर हम उन लड़कियों तक पहुंचे, जो तस्करी कर भारत लाई गईं थी और उन्हें रेस्क्यू करके नेपाल भेजा गया था। उन्होंने जो बताया, उससे साफ हो गया कि सबसे ज्यादा तस्करी दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहने वाली लड़कियों की होती है। मैदानी इलाकों की लड़कियों की तस्करी बहुत कम होती है, क्योंकि वे भारतीय दिखती हैं। पहाड़ी लड़कियों की तस्करी की दो वजहें हैं। पहला- देखने में खूबसूरत होती हैं। दूसरा- गरीबी ज्यादा है। इसलिए उन्हें टारगेट करना आसान होता है।
तस्करी के लिए अलग-अलग हैंडलर होते हैं। पहला- गांवों से लड़कियों को निकालने वाले। दूसरा- बॉर्डर पार कराने वाले। तीसरा- भारत के हिस्से में लड़कियों को पहुंचाने वाले होते हैं। हमारी इंवेस्टिगेशन में सामने आया कि नेपाल से बॉर्डर तक लड़कियों को दो तरीके से लाया जाता है।
1- लड़कियों को पहले पहाड़ी इलाकों से निकाल कर काठमांडू लाया जाता है। वहां कुछ दिन रखने के बाद उन्हें बस या प्राइवेट गाड़ियों से बॉर्डर के करीब गांवों में ठहरा दिया जाता है। बॉर्डर पार कराने वाले तस्कर की हरी झंडी मिलते ही बॉर्डर तक लाकर तस्कर को सौंप दिया जाता है।
2- अगर लड़कियों को काठमांडू नहीं ले जा पाते, तो उन्हें बॉर्डर के 100 से 50 किमी की रेंज में किसी कस्बे या गांव में रखा जाता है। फिर मौका देखकर बॉर्डर पार कराने वाले तस्कर को सौंप दिया जाता है।
बॉर्डर से लगे आसपास के गांवों को तस्कर लॉन्चिंग पैड की तरह इस्तेमाल करते हैं। बॉर्डर पार कराने वाले तस्कर एक्सपर्ट होते हैं। उनका काम होता है, लड़की को किसी तरह से बॉर्डर पार कराना। कई बार यह झुंड में होता है, तो कई बार एक-एक कर बॉर्डर पार कराया जाता है। एक बार बॉर्डर क्रॉस हुआ, तो आगे का रास्ता बसें आसान कर देती हैं। बॉर्डर से कई बसें देर रात दिल्ली जैसे बड़े शहरों के लिए चलती हैं।
इन्हें इंडिया लाकर पहले तो किसी घर में रखा जाता है, फिर इनके फोटो-वीडियो देश-विदेश में तमाम खरीदारों को भेजे जाते हैं। लड़कियों की मुंहमांगी कीमत मिलते ही उन्हें बेच दिया जाता है। कीमत 2 लाख से शुरू होकर 25 लाख तक होती है।
हम बॉर्डर से लगे नेपाल के हिस्से वाले गांवों में पहुंचे। यहां मधेसी रहते हैं। मधेसी और भारत के लोगों में रोटी-बेटी का नाता है। शादियां एक-दूसरे में करते हैं। खुली सीमा होने से आवाजाही आसान होती है। खुले हिस्से से लड़कियों की तस्करी नहीं होती। वजह यह है कि भारत वाले हिस्से में SSB और पुलिस के मुखबिर एक्टिव होते हैं।
नेपाली लड़कियों की पहचान आसानी से हो जाती है, इसलिए ज्यादातर चेक पोस्ट से ही उनको पार कराया जाता है। सबसे मुफीद समय शाम 4 से लेकर रात 10 बजे के बीच होता है। इस समय भीड़भाड़ ज्यादा होती है, इसकी वजह से पूछताछ कम होती है।
अब पढ़िए तस्करों के चंगुल से छूटकर आईं लड़कियों की कहानी…
1- दिल्ली में GB रोड के कोठे पर बेचा, छापा पड़ा तो पिलर में बंद किया
हमने इंवेस्टिगेशन के दौरान तीन लड़कियों से बात की, जिनमें से दो को भारत से रेस्क्यू करके नेपाल लाया गया था। पहली लड़की- रश्मि ( बदला हुआ नाम) नेपाल के बागमती प्रदेश के एक गांव की रहने वाली है। वॉट्सऐप वीडियो कॉल पर हमारी बात हुई।
रश्मि बताती है- दुर्गम पहाड़ी इलाकों में मेरा घर है। घर के हालात अच्छे नहीं थे। परिवार में तंगी थी, इसलिए मैं भी चाहती थी कि कुछ काम करूं। गांव के ही कुछ लोग अचानक मेरे संपर्क में आए और शहरों को लेकर तमाम बातें करने लगे। कहने लगे, कहां तक मेहनत-मजदूरी करोगी। शहर चलो, अच्छा काम और पैसा मिलेगा। मैं उनके साथ चलने को तैयार हो गई। मेरे साथ आसपास के भी कुछ लोग थे। मैं अपने परिवार को बिना बताए उनके साथ निकल गई। पहले हमें काठमांडू में 10-15 दिन रखा गया। सख्त पहरा रहता था। हमें घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। इसके बाद हमारी जैसी लगभग 10 से 15 लड़कियों को बस से काठमांडू से लाया गया। यह पता नहीं, मुझे किस बार्डर से पार कराया गया?
रश्मि ने बताया- इसके बाद हमें दिल्ली में कुछ दिनों तक एक अपार्टमेंट में रखा गया। यहां भी हमें बाहर नहीं निकलने दिया जाता था, लेकिन हमें मोटिवेट करने के लिए दिल्ली की चकाचौंध के वीडियो दिखाए जाते थे। फिर एक दिन हमें दिल्ली के रेड लाइट एरिया में बेच दिया गया। जहां बेचा गया, उस कोठे की मालकिन भी नेपाली थी। जिस दिन मेरे साथ पहली बार गंदा काम हुआ, तब पता चला कि बहुत बड़ी गलती हो गई। हालांकि, अब मेरे हाथ से सब कुछ निकल चुका था। मेरे पास कॉन्टैक्ट करने का कोई तरीका नहीं था। इसलिए बस नियति की मार समझ कर सब चुपचाप सह रही थी। मुझे यहां तक पहुंचाने में 3 से 4 लोग शामिल थे। हालांकि, एक दिन मेरी किस्मत जागी। मेरे पास एक नेपाली कस्टमर आया। मैंने उससे आपबीती बताई। उसने मेरे साथ कुछ गलत नहीं किया। साथ ही मेरी मदद करने को तैयार हो गया। तब तक GB रोड पर मेरे 3 साल बीत चुके थे।
लड़की के उस कोठे से मुक्त होने की कहानी भी दिलचस्प है
उस नेपाली युवक ने पीआरसी (पीस रिहैबिलिटेशन सेंटर) से संपर्क किया। लड़की के बारे में सब कुछ बताया। पीआरसी सेंटर के भूमिराज भट्टराई बताते हैं- लड़की को छुड़ाने हम GB रोड स्थित कोठी नंबर- 56 पहुंचे। लोकल पुलिस को कॉन्टैक्ट नहीं किया, ह्यूमन ट्रैफिकिंग ऑफिस में कॉन्टैक्ट किया। फिर छापा मारा। पूरी कोठी घूमने के बाद भी कोई हाथ नहीं लगा। फिर ध्यान आया कि रश्मि की जो फोटो दिखाई गई थी, उसमें वह किसी पिलर के पास खड़ी थी। उस पिलर की खोज हुई। जब पिलर मिला तो उससे कोई सुराग नहीं मिलता दिखा। पिलर को जब थपथपाया, तो वह खोखला निकला।
वह पिलर प्लाईवुड का बना था। उसे तोड़ा गया तो उसमें 11 नाबालिग लड़कियां बंधी मिलीं। उन्हीं में रश्मि भी थी। इसके बाद कोठे की संचालिका उस 36 साल की नेपाली महिला को पकड़ लिया गया और रश्मि नेपाल आ गई। बाकी लड़कियों को भी उनके घर भेज दिया गया।
बहरहाल, रश्मि के लिए जीवन अभी भी कठिन ही है। रश्मि बताती है- जब गांव पहुंची, तो लोग ताना मारते थे। कुछ लोग गलत निगाह से भी देखते थे। मैं अपनी बुआ के घर आकर रहने लगी। तब से यहीं रहती हूं। बीच में मैंने भी मानव तस्करी रोकने के लिए पीआरसी सेंटर जॉइन किया था। लोगों को इसके लिए जागरूक करती थी।
2- 30 हजार में खरीद कर यूपी ले गया ठेकेदार, वहां रेप करता रहा
नेपाल के कृष्णनगर स्थित पीआरसी सेंटर पर बीते 26 जुलाई को तस्करों के चंगुल से छुड़ाई गई राशि (बदला हुआ नाम) से हमारी मुलाकात हुई। राशि की कहानी भी रोंगटे खड़ी कर देने वाली है। राशि बताती है- परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। 2 साल पहले जब मैं 14 साल की थी। तब मेरे गांव के एक जानने वाले के जरिए गोरखपुर का जगदीश मौर्य मेरे परिवार के संपर्क में आया। उसने मेरे मां-बाप को कुछ रुपए दिए। फिर मुझे बस्ती और गोरखपुर में मजदूरी के नाम पर गांव के कुछ और लोगों के साथ लेकर गया। वह हमारे साथ गंदा काम करने लगा। मेरे साथ की दूसरी लड़कियों के साथ भी ऐसा ही करता था। कोई आवाज इसलिए नहीं उठाता था, क्योंकि काम छिन जाता। लेकिन, मैं वहां से चली आई। घर आकर मां-बाप को बताया, तो मां ने फोन पर उसे गालियां दीं।
राशि ने बताया- बीते जुलाई में एक बार फिर वह गांव पहुंचा और मेरी मां काे 30 हजार रुपए देकर मुझे ले जाने को कहा। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से मैं भी उसके साथ चल दी। रात में जब बॉर्डर बंद होने वाला था, तब वह मुझे मोटरसाइकिल से लेकर जा रहा था। चेकिंग के दौरान उसने मुझे अपनी पत्नी बताया। लेकिन, पूछताछ के दौरान वह भाग निकला।
हमारा सवाल था- तुम दोबारा उसके साथ जाने को तैयार क्यों हो गई? राशि कहती है- क्या करें, घर के हालात ही ऐसे हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते। काम नहीं करेंगे, तो कैसे चलेगा? मां ने कहा जाओ, अबकी बार कुछ नहीं होगा, इसलिए हम चल दिए।
3- जहां से सीमा हैदर ने पार किया बॉर्डर, वहां 26 हजार में खरीदी जा रही थी नाबालिग दुल्हन
इन दोनों पीड़िताओं की कहानी जानने के बाद हम सिद्धार्थनगर जिले के खुनवां बॉर्डर पहुंचे। यह वही बॉर्डर है, जहां से पाकिस्तानी नागरिक सीमा हैदर नोएडा पहुंची थी। बॉर्डर पर हमारी मुलाकात ह्यूमन ट्रैफिकिंग रोकने के लिए भारत में काम करने वाले NGO मानव सेवा संस्थान के कर्मचारियों से हुई। उनके जरिए हम बॉर्डर से 5 किमी दूर एक गांव पहुंचे। यहां हमारी मुलाकात राजेश्वरी (बदला हुआ नाम) से हुई।
राजेश्वरी अभी 17 साल की है। उसने बताया- घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। पड़ोस के गांव की एक महिला वंदना हमारे घर रिश्ता लेकर आई। उसने बताया, महराजगंज के लेहड़ा देवी मंदिर के पास के गांव का लड़का है। वह शादी के बदले कुछ रुपए भी देगा। वंदना ने मेरे मां-बाप को 26 हजार रुपए भी दिए। जुलाई में शादी तय हुई।
इसकी खबर जब मानव सेवा संस्थान के सदस्यों को हुई तो शादी के दिन वे लोग वहां पहुंच गए। पता चला, बारात के नाम पर सिर्फ 5 लोग आए हैं। आधार कार्ड चेक किया गया, तो उसमें हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का पता दर्ज था। इससे साफ हो गया कि लड़के वाले रुपए देकर लड़की खरीद कर शादी करने आए हैं।
मौके पर हंगामे के बाद नाबालिग की शादी नहीं हो सकी। राजेश्वरी ने बताया- शादी जब तय हुई, तो हमें भी लगा कि बगल का मामला है। आने-जाने में दिक्कत नहीं होगी। इसलिए हमने शादी के लिए हामी भर दी थी।
बातचीत के दौरान हमें पता चला कि राजेश्वरी के परिवार वाले दूसरे के खेतों में काम कर घर का खर्च चलाते हैं। रुपए का लालच देकर परिवार को बरगलाया गया, जिसकी वजह से वे लोग बेटी की शादी करने को तैयार हो गए।
अब हमारे सामने सवाल था कि मानव तस्कर नेपाल से लड़कियों को अपने साथ आने के लिए कैसे राजी कर लेते हैं?
3 तरीकों से लड़कियों को जाल में फंसाते हैं…
1- नेपाली लड़कियों को प्यार के जाल में फंसा कर बॉर्डर पार कराया जाता है
कृष्णनगर पीआरसी पर तैनात हैं काउंसलर ऊषा आचार्य। वह बताती हैं- ज्यादातर लड़कियां 18 से 25 साल के बीच की होती हैं। गांव से आती हैं। सभी सोशल मीडिया से लड़कों से जुड़ती हैं। उन्हें प्यार में फंसाया जाता है। शहर की चकाचौंध दिखा कर बॉर्डर पार कराया जाता है। इनमें से कुछ मामले लव जिहाद के होते हैं। लड़का मुस्लिम होता है, लड़की हिंदू।
बॉर्डर क्रॉस कराने के बाद इनमें से कुछ से शादी कर ली जाती है, तो कुछ को रेड लाइट एरिया में बेच दिया जाता है। इन लड़कियों को पहले उनके इलाके से लड़के ले जाया करते थे, लेकिन अब चलन बदल गया है। अब लड़कियों को सीधे बॉर्डर पर बुलाया जाता है। उनका प्रेमी बॉर्डर इस पार रहता है। अगर लड़की पकड़ ली गई, तो लड़का भाग जाता है। इसलिए ज्यादातर मामलों में लड़के पकड़ में नहीं आ पाते।
2- नौकरी दिलाने के बहाने लड़कियों को फंसाते हैं
नेपाल में ठीक-ठाक पढ़ाई के बावजूद लड़कियों को नौकरी नहीं मिलती। इसका फायदा मानव तस्कर उठाते हैं। वे उन्हें नौकरी का लालच देते हैं। नौकरी में भी इन्हें नेटवर्क मार्केटिंग का लालच दिया जाता है। गैंग अपने लोगों से पढ़ी-लिखी लड़कियों की वीडियो कॉल पर बातचीत कराता है। लड़कियों को बताया जाता है कि नेटवर्क मार्केटिंग से वह भी अच्छा खासा-पैसा कमा सकती हैं। फिर शहरों की चकाचौंध के वीडियो भेजे जाते हैं। ये सब देखकर लड़कियां आसानी से उनके झांसे में आ जाती हैं।
3- परिवार से खरीदी जाती हैं लड़कियां
नेपाल में गरीबी की वजह से कई परिवार ऐसे हैं, जो मजदूरी के नाम पर अपने नाबालिग बच्चों तक को ठेकेदारों को बेच देते हैं। इसके एवज में उन्हें कुछ रुपए दिए जाते हैं। ठेकेदार लड़कों और बच्चों को कभी ईंट-भट्ठों पर, तो कभी ढाबों पर मोटी रकम लेकर बेच देते हैं। या फिर ठेके पर उनसे बालश्रम करवाते हैं। यही नहीं, उनका शारीरिक शोषण भी किया जाता है।
तस्करों का पूरा सिंडिकेट
अब हम मानव तस्करी के इस जाल को समझने के लिए बढ़नी से करीब 150 किमी दूर गोरखपुर मानव सेवा संस्थान ‘सेवा’ के निदेशक राजेश मणि के पास पहुंचे। राजेश मणि बताते हैं- हम साल 2000 से नेपाल सीमा पर SSB के साथ मानव तस्करी को रोकने का काम कर रहे हैं। जहां तक तस्करी की बात है तो सिर्फ नेपाल से ही नहीं, इंटरस्टेट मानव तस्करी भी हो रही है। मानव तस्करी एक संगठित अपराध है। इसका पूरा सिंडिकेट होता है। बॉर्डर पर या देश में जो भी तस्कर पकड़े जाते हैं, वे सिर्फ कैरियर होते हैं। ज्यादातर मामलों में सरगना नहीं पकड़ा जाता। जिसकी वजह से यह संगठित अपराध फल-फूल रहा है। वह बताते हैं कि अगर नेपाल से कोई एक लड़की को भारत लाना है, तो कम से कम 5 से 6 लोग कैरियर का काम करते हैं।
सबसे पहले कैरियर का काम होता है, लड़की को मोटिवेट करना। उसके परिवार को भरोसा दिलाया जाता है कि लड़की भारत या खाड़ी देश में काम करने जाएगी, तो उनके घर की गरीबी दूर हो जाएगी। जैसे ही लड़की और उसका परिवार तैयार होता है, उसे दूसरे कैरियर के साथ काठमांडू भेज दिया जाता है। वहां तीसरे कैरियर के हवाले कर दिया जाता है। वहां से चौथा कैरियर उन्हें बॉर्डर के गांव तक लाता है। आगे काम पांचवां कैरियर संभालता है और वह बॉर्डर क्रॉस कराता है। फिर वहां से लड़की भारत के बड़े शहरों में भेज दी जाती है।
कैसे बच जाते हैं तस्कर
बॉर्डर पर काम कर रहे NGO के सदस्यों का कहना है, अगर मानव तस्करी का कोई मामला आता है तो हम लोग लोकल पुलिस को कार्रवाई के लिए देते हैं। क्योंकि, हम कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते। कई बार जो बॉर्डर पार कराने आते हैं, उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई होकर रह जाती है। कई बार कार्रवाई नहीं भी होती है। ऐसे में इस सिंडिकेट के बड़े सरगना तक पहुंचने की कोशिश नहीं होती, जिससे ये कानून से बच जाते हैं।
