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जिन्ना एम्बुलेंस में तड़पते रहे, माउंटबेटन को बम से उड़ाया:भारत का बंटवारा कराने वाले लोगों का हुआ बुरा हश्र; बंटवारे के किस्से, पार्ट-3

जिन्ना एम्बुलेंस में तड़पते रहे, माउंटबेटन को बम से उड़ाया:भारत का बंटवारा कराने वाले लोगों का हुआ बुरा हश्र; बंटवारे के किस्से, पार्ट-3

3 घंटे पहलेलेखक: धर्मेन्द्र चौहान

28 जनवरी 1933। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्र रहमत अली ने एक मसौदा तैयार किया। इसमें लिखा था कि अगर मुसलमानों को अपना अस्तित्व बचाकर रखना है तो अपना देश हिंदुओं से अलग कर लेना चाहिए। यहीं से पाकिस्तान का कॉन्सेप्ट आया।

रहमत अली की मुलाकात मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना से हुई तो उन्हें अपना मसौदा बताया। धीरे-धीरे ये कॉन्सेप्ट इतना पॉपुलर हुआ कि 1940 में मुस्लिम लीग ने अलग मुल्क ‘पाकिस्तान’ का प्रस्ताव रखा।

2 जून 1947 को भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने बंटवारे का प्लान पेश किया। ब्रिटेन के PM क्लेमेंट एटली ने इसे मंजूरी दी। साइरिल रेडक्लिफ ने बंटवारे की लकीर खींची। बंटवारे में शामिल इन शख्सियतों में कोई टीबी से तड़पकर मरा, कोई ब्लास्ट से। किसी की निमोनिया से मौत हुई, तो किसी को दफनाने के लिए चंदा करना पड़ा।

बंटवारे के किस्से सीरीज की आखिरी कड़ी में पढ़िए भारत-पाक विभाजन कराने वाले जिन्ना, माउंटबेटन, रहमत अली, रेडक्लिफ जैसे लोगों का बंटवारे के बाद क्या हुआ…

आखिरी दिन: पाक सरकार ने देश निकाला दिया, लोगों ने चंदा करके इंग्लैंड में दफनाया

  • ‘मुस्लिम अगेंस्ट द मुस्लिम लीग: क्रिटिक्स ऑफ द आइडिया ऑफ पाकिस्तान’ किताब के अनुसार जिन्ना के पाकिस्तान से चौधरी रहमत अली खुश नहीं थे। उन्होंने जिस पाकिस्तान की कल्पना की थी, उससे मौजूदा पाकिस्तान बहुत छोटा था। जब पाकिस्तान का निर्माण हो रहा था तब वो पूरे समय इंग्लैंड में ही रहे।
  • डोमिनिक लेपिएर और लैरी कॉलिंस ‘फ्रीडम एट मिटनाइट’ में लिखते हैं वह व्यक्ति जिसने पाकिस्तान का सपना पहली बार देखा था वह 14 अगस्त की रात कैम्ब्रिज के हम्बर स्टोन रोड स्थित घर में अकेला बैठा था।
  • 1948 में रहमत अली ने तय किया कि अब मैं अपने वतन पाकिस्तान जाकर रहूंगा। 6 अप्रैल 1948 को इंग्लैंड से सब कुछ बेचकर वे लाहौर पहुंचे। पाक आने के बाद से ही वे अधूरे पाकिस्तान के निर्माण पर जिन्ना के खिलाफ बेबाक बयान देने लगे। जिन्ना ने इस पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन PM लियाकत अली जरूर नाराज थे।
  • एक दिन रहमत अली ने जिन्ना को क्विज्लिंग-ए-आजम कहा यानी देशद्रोही या गद्दार ए आजम। इस पर सरकार ने उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली और उन्हें देश छोड़कर जाने के लिए कह दिया। रहमत अली अक्टूबर 1948 में खाली हाथ इंग्लैंड चले गए।
  • वे कर्ज लेकर अपना जीवन बिता रहे थे। कर्जदारों से बचने के लिए उन्होंने खुद को दिवालिया घोषित करवा दिया था। 3 फरवरी को उनकी मौत हो गई। जब लाश से बदबू आने लगी तो पता चला कि पाकिस्तान का कॉन्सेप्ट देने वाला गुमनामी में मर चुका है।
  • उन्हें दफनाने वाला कोई नहीं था तब 20 फरवरी 1951 को कैम्ब्रिज के इमैनुअल कॉलेज के मास्टर एडवर्ड वेलबोर्न ने अपने पूर्व छात्र के लिए कैम्ब्रिज के न्यू मार्केट रोड कब्रिस्तान में दफनाने का इंतजाम करवाया।

आखिर दिन: जिन्ना को टीबी था, एम्बुलेंस में तड़पते रहे

  • मोहम्मद अली जिन्ना को बंटवारे से पहले ही टीबी हो गई थी। 5 सितंबर 1948 यानी बंटवारे से महज 1 साल बाद जिन्ना की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी। बलगम की जांच की गई तो पता चला कि निमोनिया भी हो गया है। उनकी सांस फूलने लगी थी। उस वक्त वो क्वेटा में थे।
  • उनकी बहन फातिमा लिखती हैं कि डॉक्टर ने मुझे बताया कि कायदे आजम कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। मैंने हिम्मत करके ये बात भाई को बताई। उन्होंने कहा मुझे कराची ले चलो मैं वहीं पैदा हुआ था, वहीं दफन होना चाहता हूं।
  • गवर्नर जनरल को फौरन विमान के इंतजाम का आदेश मिला। फ्लाइट में जिन्ना के साथ डॉक्टर मिस्त्री, नर्स डनहम और बहन फातिमा मौजूद थीं। दो घंटे की उड़ान के बाद सवा 4 बजे वो कराची एयरपोर्ट उतरे।
  • फातिमा लिखती हैं कि उस दिन एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव करने या सलामी देने के लिए कोई नहीं था। एयरपोर्ट पर पहले से तैयार आर्मी एम्बुलेंस में जिन (जिन्ना) को स्ट्रेचर पर लिटाया गया। उनके साथ नर्स डनहम और मैं थी।
  • एम्बुलेंस बहुत धीमी चल रही थी। दल के सदस्य दूसरी कारों में आगे चले गए थे। केवल डॉक्टर इलाही बक्श, डॉ. मिस्त्री और सैन्य सचिव गर्वनर जनरल की गाड़ी ही पीछे चल रही थी। बमुश्किल चार किलोमीटर में ही एम्बुलेंस हिचकोले खाने लगी और अचानक रुक गई।
  • फातिमा लिखती हैं, ‘मुझे बताया गया कि पेट्रोल खत्म हो गया है। वापस एम्बुलेंस में गई तो कायदे आजम ने हाथ हिलाकर पूछा, क्या हुआ? मैंने उनके कान में कहा कि एम्बुलेंस का इंजन खराब हो गया है। जिन्ना के ऊपर मक्खियां भिनभिना रही थीं।’
  • दूसरी एम्बुलेंस और गाड़ियां इतनी बड़ी नहीं थीं कि उसमें स्ट्रेचर आ पाए, इसलिए हम इंतजार कर रहे थे। हर पल जिन्ना को मौत के नजदीक ले जा रहा था। जहां एम्बुलेंस खड़ी थी, वहां रिफ्यूजियों की सैकड़ों झोपड़ियां थीं। इनमें से किसी को खबर नहीं थी कि जिसने इन्हें भारत से लाकर यहां बसा दिया है वो जिन्ना इस एम्बुलेंस में हैं।
  • घंटे भर बाद एक दूसरी एम्बुलेंस आई और जिन्ना को लेकर गवर्नर जनरल हाउस की तरफ बढ़ी। डॉक्टर इलाही ने फातिमा को बताया कि हमने हवाई जहाज से क्वेटा से कराची का सफर दो घंटे में तय किया है। इधर कराची में ही एयरपोर्ट से गवर्नर जनरल हाउस की दूरी दो घंटे में तय की है।
  • जिन्ना को गर्वनर जनरल हाउस लाया गया। उन्होंने थोड़ी देर आराम किया। फिर आंखें खोलीं और फातिमा को अपने पास बुलाने का इशारा किया। जैसे ही फातिमा उनके मुंह के पास अपने कान ले गईं, जिन्ना ने आखिरी शब्द कहे… फाती खुदा हाफिज।

आखिर दिन: बोट पर ब्लास्ट में माउंटबेटन समेत पूरा परिवार खत्म

  • सोमवार 27 अगस्त 1979 को कई दिनों की बारिश के बाद माउंटबेटन और उनके परिवार के कुछ लोग आयरलैंड में काउंटी स्लिगो में छुटि्टयां मनाने गए थे। वे सुबह 11.30 बजे अपनी 29 फुट लंबी शैडो नामक नाव से निकले।
  • उनके साथ बेटी पैट्रिशिया और उसके फिल्म निर्माता पति जॉन, जॉन की मां डोरेन नैचबुल, लेडी ब्रेबोर्न और पैट्रिशिया के 14 वर्षीय जुड़वां बच्चों निकोलस और टिमोथी के साथ 15 वर्षीय नौकर पॉल मैक्सवेल था। दो जासूस गार्ड भी परिवार की निगरानी कर रहे थे।
  • बोट को आगे बढ़े 15 मिनट ही हुए थे कि अचानक एक बम ब्लास्ट हुआ। ये बम आयरिश रिपब्लिकन आर्मी यानी IRA के दो विद्रोहियों ने लगाया था। IRA आयरलैंड के उनके अभियान को दबाए जाने से नाराज था और राज परिवार को सबक सिखाना चाहता था। इस ब्लास्ट में माउंटबेटन सहित सभी लोगों की मौत हो गई। इस मामले में IRA थॉमस मैकमोहन (उम्र 31) और फ्रांसिस मैकगर्ल (उम्र 24) को गिरफ्तार किया गया।
  • माउंटबेटन पर लिखी किताब ‘देयर लाइव्स एंड लव्स’ के राइटर एंड्रयू लोनी लिखते हैं कि उनकी बोट पर 22 किलो विस्फोटक रखा गया था। ब्लास्ट इतना भयानक था कि बोट के चीथड़े उड़ गए।
  • पैट्रिक हॉलैंड नामक एक आयरिश पेशेवर अपराधी ने दावा किया था कि जेल में आरोपी मैकमोहन ने उसे बताया था कि उसने दूसरों को बचाने के लिए माउंटबेटन की हत्या का दोष अपने ऊपर ले लिया था। माउंटबेटन की हत्या वास्तव में ब्रिटिश खुफिया एजेंसी ने करवाई थी। माउंटबेटन के निधन पर भारत में सात दिन का शोक रखा गया था।

आखिरी दिन: 78 साल की उम्र में अपने घर में मौत

  • भारत से लौटने के बाद सिरिल रेडक्लिफ BBC से भी जुड़े रहे। 1957 में साइप्रस संकट के उभरने पर उन्हें साइप्रस में संवैधानिक आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने साइप्रस के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने में मदद की।
  • 1956 से, उन्होंने कई सरकारी जांचों के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उनकी कोई संतान नहीं थी। 1 अप्रैल 1977 को 78 साल की उम्र में उनकी सामान्य मौत हो गई।

आखिरी दिन: स्टेज पर गोली मारी गई, आज तक हत्या का रहस्य नहीं सुलझा

  • पाकिस्तान के आजाद होते ही कट्‌टरपंथी ताकतों ने पैर जमाने शुरू कर दिए। लियाकत जानते थे कि कट्‌टरपंथियों को सीधे नहीं काबू कर पाएंगे। उन्होंने संविधान सभा में एक प्रस्ताव पेश किया। इसके अनुसार धार्मिक दलों पर कई पाबंदियां लगने वाली थीं। कट्‌टर पंथी अपने PM से बेहद नाराज थे।
  • लियाकत अली 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी के ईस्ट इंडिया कंपनी गार्डन में मुस्लिम सिटी लीग की सार्वजनिक बैठक में भाग लेने पहुंचे। उन्होंने बोलना शुरू किया। पहला शब्द कहा “बिरादरान-ए-इस्लाम” तभी सभा में बैठा एक युवक खड़ा हुआ। इसने पठानी सूट और पगड़ी बांधी हुई थी। उसने अपनी पॉइंट 38 रिवॉल्वर से गोलियां बरसानी शुरू कीं।
  • दो गोली PM लियाकत अली के सीने में धंस गई और तीसरी सीना चीरते हुए बाहर निकल गई। PM वहीं गिर पड़े और उनकी मौत हो गई।
  • सुरक्षाकर्मियों ने हमलावर को फौरन गोली मार दी। उसकी शिनाख्त सईद अकबर के रूप में हुई। पुलिस ने बताया कि वो अफगान नागरिक था। कई जांचें हो चुकी हैं, लेकिन ये आज तक पता नहीं चल पाया कि पाकिस्तान के पहले पीएम की हत्या के पीछे किसका हाथ था?

ग्राफिक्सः अंकित द्विवेदी

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