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मणिपुर में हिंसा से पहले 2480 अवैध प्रवासी मिले:CM बोले- सबसे ज्यादा चंदेल जिले में 1,165 पाए गए, हिंसा के बाद कैंपेन बंद हुआ

मणिपुर में हिंसा से पहले 2480 अवैध प्रवासियों का पता चला था। यह जानकारी रविवार (12 मई) को मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने दी। उन्होंने कहा कि पिछले साल 3 मई को हिंसा भड़कने के बाद अवैध प्रवासियों को पता लगाने का कैंपेन बंद कर दिया गया था। CM ने आगे कहा कि लगातार जंगलों की कटाई और अवैध अप्रवासियों द्वारा नए गांवों की स्थापना को लेकर सरकार चिंतित है।

CM ने बताया कि फरवरी 2023 में कैबिनेट बैठक के बाद एक कैबिनेट सब कमेटी का गठन किया गया था। इसमें दो कुकी मंत्रियों लेतपाओ हाओकिप और नेमचा किपगेन ने हिस्सा लिया था। हाओकिप को अवैध आप्रवासियों की पहचान करने वाली कमेटी का हेड बनाया गया था। इसी कमेटी ने 2,480 अवैध प्रवासियों का पता लगाया था।

आप्रवासियों की पहचान के लिए बायोमेट्रिक्स
CM ने बताया कि चंदेल क्षेत्र के दस गांवों में बायोमेट्रिक्स लिया गया था। इस दौरान 1,165 अवैध अप्रवासी पाए गए। वहीं, तेंगनौपाल जिले के 13 गांवों में 1,147 और चुराचांदपुर में 154 अवैध अप्रवासी पाए गए। इसके अलावा बाकी अवैध अप्रवासी कामजोंग जिले में पाए गए। इसमें कामजोंग जिले में आने वाले अतिरिक्त 5,457 अवैध आप्रवासियों को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि 5,173 लोगों के बायोमेट्रिक्स लिए गए हैं, जबकि 329 प्रवासी पड़ोसी देश में स्थिति ठीक होने के बाद वापस लौट गए।

ये तस्वीर मणिपुर में पिछले चार महीने से जारी हिंसा की अलग-अलग घटनाओं की है।

कार्रवाई: 11 गंभीर केस की जांच कर रही है CBI
मणिपुर हिंसा से जुड़े 11 गंभीर मामलों की जांच सीबीआई कर रही है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में मणिपुर सरकार ने कहा था कि इस हिंसा से जुड़े 5,995 मामले दर्ज हुए और 6,745 लोगों को हिरासत में लिया है।

हिंसा के बाद 65 हजार से ज्यादा लोगों ने घर छोड़ा
मणिपुर में अब तक 65 हजार से अधिक लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। 6 हजार मामले दर्ज हुए हैं और 144 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। राज्य में 36 हजार सुरक्षाकर्मी और 40 IPS तैनात किए गए हैं। पहाड़ी और घाटी दोनों जिलों में कुल 129 चौकियां स्थापित की गईं हैं।

इम्फाल वैली में मैतेई बहुल है, ऐसे में यहां रहने वाले कुकी लोग आसपास के पहाड़ी इलाकों में बने कैंप में रह रहे हैं, जहां उनके समुदाय के लोग बहुसंख्यक हैं। जबकि, पहाड़ी इलाकों के मैतेई लोग अपना घर छोड़कर इम्फाल वैली में बनाए गए कैंपों में रह रहे हैं।

4 पॉइंट्स में जानिए क्या है मणिपुर हिंसा की वजह…
मणिपुर की आबादी करीब 38 लाख है। यहां तीन प्रमुख समुदाय हैं- मैतेई, नगा और कुकी। मैतई ज्यादातर हिंदू हैं। नगा-कुकी ईसाई धर्म को मानते हैं। ST वर्ग में आते हैं। इनकी आबादी करीब 50% है। राज्य के करीब 10% इलाके में फैली इंफाल घाटी मैतेई समुदाय बहुल ही है। नगा-कुकी की आबादी करीब 34 प्रतिशत है। ये लोग राज्य के करीब 90% इलाके में रहते हैं।

कैसे शुरू हुआ विवाद: मैतेई समुदाय की मांग है कि उन्हें भी जनजाति का दर्जा दिया जाए। समुदाय ने इसके लिए मणिपुर हाई कोर्ट में याचिका लगाई। समुदाय की दलील थी कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हुआ था। उससे पहले उन्हें जनजाति का ही दर्जा मिला हुआ था। इसके बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से सिफारिश की कि मैतेई को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल किया जाए।

मैतेई का तर्क क्या है: मैतेई जनजाति वाले मानते हैं कि सालों पहले उनके राजाओं ने म्यांमार से कुकी काे युद्ध लड़ने के लिए बुलाया था। उसके बाद ये स्थायी निवासी हो गए। इन लोगों ने रोजगार के लिए जंगल काटे और अफीम की खेती करने लगे। इससे मणिपुर ड्रग तस्करी का ट्राएंगल बन गया है। यह सब खुलेआम हो रहा है। इन्होंने नागा लोगों से लड़ने के लिए आर्म्स ग्रुप बनाया।

नगा-कुकी विरोध में क्यों हैं: बाकी दोनों जनजाति मैतेई समुदाय को आरक्षण देने के विरोध में हैं। इनका कहना है कि राज्य की 60 में से 40 विधानसभा सीट पहले से मैतेई बहुल इंफाल घाटी में हैं। ऐसे में ST वर्ग में मैतेई को आरक्षण मिलने से उनके अधिकारों का बंटवारा होगा।

सियासी समीकरण क्या हैं: मणिपुर के 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई और 20 विधायक नगा-कुकी जनजाति से हैं। अब तक 12 CM में से दो ही जनजाति से रहे हैं।

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