प्रमोद कृष्णम का आरोप-राहुल राममंदिर पर फैसला पलटना चाहते हैं:करीबियों से कहा था- सरकार बनी तो शाहबानो केस की तर्ज पर एक्शन लेंगे
पूर्व कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया है कि वह राम मंदिर पर फैसला पलटना चाहते हैं। सोमवार को यूपी के संभल में न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में उन्होंने कहा- जब राम मंदिर का फैसला आया तो राहुल गांधी ने अपने करीबियों के साथ बैठक की थी। उसमें राहुल ने कहा था- कांग्रेस की सरकार बनने के बाद वह एक सुपर पावर कमेटी बनाएंगे। यह कमेटी राम मंदिर के फैसले को वैसे ही पलट देगी, जैसे राजीव गांधी ने शाह बानो के फैसले को पलट दिया था।
प्रमोद कृष्णम ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और उनकी टीम देश को किसी न किसी बहाने से तोड़ना चाहती है। मैं कांग्रेस में 32 साल से ज्यादा समय तक रहा हूं। पहले की कांग्रेस और वर्तमान कांग्रेस में काफी फर्क है।
राहुल की टीम- देश को जाति, धर्म और भाषा के नाम पर बांट रही
प्रमोद कृष्णम ने कहा- कांग्रेस पार्टी की जब स्थापना हुई थी तो देशभक्त नेता थे। उस वक्त की कांग्रेस ने देश को जोड़ने का काम किया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने भारत को जोड़ने का काम किया। वर्तमान कांग्रेस देश को तोड़ना चाहती है। राहुल गांधी और उनकी टीम देश को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर तोड़ने में जुटी हुई है। इसलिए वह गलत बयानबाजी कर रहे हैं।
मंदिर जाने से कोई हिंदू नहीं हो जाता
प्रमोद कृष्णम ने कहा- मंदिर जाने से कोई हिंदू नहीं बन जाता या सिर्फ मस्जिद में जाने से कोई मुसलमान नहीं बन जाता। जो ईसा मसीह में विश्वास नहीं करता, वह ईसाई नहीं हो सकता। उसी तरह, जो भगवान राम से नफरत करता है, वह हिंदू नहीं हो सकता।
दुनिया जानती है कि राम मंदिर निर्माण को रोकने के प्रयासों ने सनातन धर्म में विश्वास करने वालों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। इस तथ्य पर कोई पर्दा नहीं है कि भगवान राम से कौन प्यार करता है या कौन नफरत करता है।
कृष्णम ने कांग्रेस से दो बार लड़ा लोकसभा चुनाव
प्रमोद कृष्णम (59) संभल के गांव ऐचोड़ा कम्बोह के रहने वाले हैं। फिलहाल गाजियाबाद और दिल्ली में रहते हैं। कांग्रेस ने साल 2014 में संभल और 2019 में लखनऊ से प्रत्याशी बनाया था। संभल में 2014 में मोदी लहर में मात्र 16034 वोट मिले थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रमोद कृष्णम को लखनऊ लोकसभा सीट से 1 लाख 80 हजार 11 वोट मिले।
क्या है शाह बानो केस
शाह बानो का निकाह इंदौर के एक वकील मोहम्मद अहमद खान से हुआ था। इस निकाह के करीब 14 साल बाद अहमद खान ने दूसरा निकाह कर लिया। 1978 में अहमद खान ने शाह बानो को तीन बार तलाक (ट्रिपल तलाक) बोलकर तलाक दे दिया और घर से बेदखल कर दिया। तब खान ने शाह बानो से वादा किया कि वो गुजारा भत्ता के तौर पर हर महीने उसे 200 रुपए देगा, लेकिन कुछ ही महीनों बाद वो इससे मुकर गया।
मामला इंदौर की एक अदालत में पहुंचा और शाह बानो ने गुजारा भत्ता के लिए 500 रुपए महीने की मांग की। पेशे से वकील अहमद खान ने कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला दिया और कहा कि वह गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। कोर्ट ने इस दलील को तो खारिज कर दिया, लेकिन शाह बानो को महज 20 रुपए प्रतिमाह का गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया। यह काफी कम था।
इसके बाद 62 साल की शाह बानो ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने 1980 में अपना फैसला सुनाया और गुजारा भत्ता की रकम को 20 रुपए से बढ़ाकर 179 रुपए प्रतिमाह कर दिया। इस फैसले के खिलाफ शाह बानो के पति अहमद खान ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
1985 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को सही करार देते हुए शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल बताकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया।
1986 में राजीव गांधी सरकार मुस्लिम महिला (अधिकार और तलाक संरक्षण) विधेयक लेकर आई। इससे सुप्रीम कोर्ट का फैसला शून्य हो गया। इसके बाद विवाह के मामले में फिर से शरियत कानून को लागू कर दिया गया।
