कच्चा घर। टूटी-फूटी दीवारें। पास में बंधे जानवर। चूल्हा और लकड़ियां। खपरैल के नीचे बैठी खिलखिलाती छोटी बहन और मुस्कुराती मां। वहीं पास में खामोश बैठे पिता। यह घर है UPSC क्रैक करने वाले 24 साल के पवन कुमार का।
पवन की 239वीं रैंक आई है। पिता मुकेश कुमार मनरेगा मजदूर हैं। मां सुमन देवी खेतों में मजदूरी करती हैं। 3 बहने हैं। बड़ी बहन गोल्डी BA करने के बाद स्कूल में पढ़ाती है। दूसरी बहन सृष्टि BA कर रही है, जबकि छोटी बहन सोनिया सरकारी स्कूल से 12वीं की पढ़ाई कर रही है।
गैस कनेक्शन तो है, सिलेंडर भरवाने के पैसे नहीं
दैनिक भास्कर रिपोर्टर बुलंदशहर शहर मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर पवन के रघुनाथपुर गांव पहुंचा। गांव वालों से पूछने पर पवन के घर के बारे में पता चला। 200 मीटर आगे बढ़ने पर पवन के घर पहुंचे। यहां पवन की मां सुमन पशुओं को चारा डाल रही थीं। हमने उनसे पूछा कि पवन का घर कौन सा है? उन्होंने कहा कि बेटा यही है।
फिर हम घर के अंदर गए। घर की दीवारों टूटी थीं। हमने पूछा कि घर तो बरसात में टपकता होगा। उन्होंने कहा कि हां बेटा। घर में एक किनारे पर मिट्टी का चूल्हा था, जिसे देखकर लगा कि यहां गैस का चूल्हा नहीं होगा।
फिर हमने पवन की मां से इस बारे पूछा, तो उन्होंने बताया कि गैस कनेक्शन तो लिया था। मगर, सिलेंडर भरवाने के पैसे नहीं हैं। बेटी के साथ पास के जंगल से लकड़ी तोड़कर लाती हूं। इसके बाद खाना बनता है।
बेटे ने वो कर दिखाया, जिसका सपना देखा करते थे
बगल में पवन के पिता मुकेश कुमार बैठे थे। वह कहते हैं कि बेटा मजदूर हूं। घर भी किसी तरह से ही चल रहा है। घर चलाने के लिए पत्नी और बेटियों को भी काम करना पड़ता है। मगर मेरे बेटे ने वो कर दिखाया, जिसका हम सपना देखा करते थे।
पवन बोले- ऑनेस्टी रखें, एग्जाम टफ है, पर डटे रहें
इस बीच घर के लोगों ने पवन ने वीडियो कॉल पर बात कराई। पवन ने कहा- सिविल सर्विसेज टफ एग्जाम माना जाता है, मगर ऐसा नहीं कि ये इंपॉसिबल है। मैं इस कंडीशन में नहीं था कि इतनी महंगी कोचिंग अफोर्ड कर पाऊं, इसलिए सेल्फ स्टडी की। सिर्फ ऑप्शनल के लिए मैंने कोचिंग की थी। बाकी ज्यादातर खुद से पढ़ाई की।
मेरा तो यही मैसेज है कि आप सेल्फ स्टडी पर ध्यान दें। बाकी इंटरनेट पर काफी सोर्सेज हैं। आप वहां से हेल्प ले सकते हैं। बस अपने प्रोसेस में ऑनेस्टी रखें, एग्जाम टफ है, पर डटे रहें। आपको रिजल्ट जरूर मिलेगा।
बेटे ने जिंदगी बदल दी- पिता मुकेश
पवन से बात होने के बाद पिता कहते हैं- कई बार तो ऐसा लगा कि बेटे से कह दूं कि अब तैयारी छोड़कर कोई जॉब कर लो, तीन बहनों की शादी करनी है। तेरी मां कब तक काम करेगी। मगर फिर लगता कि एक बार और हिम्मत जुटाते हैं, शायद बेटा जिंदगी बदल दे। बेटे ने ऐसा कर दिखाया और आज हमारी जिंदगी बदल गई। यह कहते हुए वो भावुक हो गए।
8वीं तक गांव में, फिर 12वीं नवोदय विद्यालय से पास किया
पिता मुकेश कहते हैं कि पवन ने क्लास 8 तक की शिक्षा गांव के ही स्कूल से ली है। इसके बाद बुलंदशहर के जवाहर नवोदय विद्यालय बुकलाना में 9वीं क्लास में दाखिला लिया। 2017 में पवन ने नवोदय विद्यालय से ही इंटर पास किया।
इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से BA किया। फिर दिल्ली जाकर सिविल सर्विस की तैयारी शुरू कर दी। 2 साल कुछ विषयों की कोचिंग के बाद अधिकतर समय सेल्फ स्टडी में लगाया। इंटरनेट की मदद ली। 6 साल की कड़ी मेहनत के बाद उसे सफलता मिली।
मुकेश कहते हैं, “हमारे पास शुरू से ही इतना पैसा नहीं था कि चार बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकूं। लेकिन हमारे बच्चों में पढ़ने की ललक थी। पवन घर में सबसे बड़ा था, वह शुरू से ही कहता था कि पापा मैं पढ़ लिखकर कुछ अलग या बड़ा करूंगा। आप बस मेरी हिम्मत बने रहना।
बेटा प्रयागराज गया तो देने को पैसे नहीं थे
मुकेश बताते हैं, बेटा जब प्रयागराज गया तो हमारे पास उसे देने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन उसकी मां और दोनों बहनों ने मिलकर उत्साह बढ़ाया और पैसों का इंतजाम किया। पवन की पढ़ाई की लगन को देखते हुए हमने हिम्मत नहीं हारी। हम जैसे-तैसे मेहनत करके पैसे भेजते रहे। इस तरह पवन ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कंप्लीट की। उसके बाद वह दिल्ली चला गया।
वह बताते हैं, दिल्ली में सभी कोचिंग बहुत महंगी थीं। मेरे बेटे ने कम पैसों वाली कोई कोचिंग तलाश की। हमें तो उसका नाम भी नहीं पता था। दो साल तक उसने तैयारी की, मगर उसका सिलेक्शन नहीं हुआ। इस दौरान कई बार मैंने सोचा कि बेटे से कह दूं कि कोई छोटी मोटी नौकरी जॉइन कर ले, जिससे परिवार का खर्चा चलने लगे। मुझे बेटे के साथ-साथ बड़ी हो रही बेटियों की भी चिंता थी, इसलिए मन डरा रहता था।
बहनों ने मजदूरी कर दिलाया सेकेंड हैंड स्मार्ट फोन
मुकेश कहते हैं, छोटी बेटी ने मुझसे कहा कि पापा भैया को पढ़ने से नहीं रोकना है। एक दिन वो जरूर ऐसा करेगा कि हमारे पूरे परिवार की जिंदगी सुधर जाएगी। मेरी बेटी बहुत हिम्मत वाली है।
बड़ी बेटी गोल्डी कहती है, भैया ने कोचिंग छोड़ दी, वह खुद ही तैयारी करने लगे। उनके पास मोबाइल खरीदने के पैसे नहीं थे। हम सबने मेहनत करके भैया के लिए 2500 रुपए का सेकेंड हैंड एंड्रॉयड फोन खरीदा। भैया उसी मोबाइल से तैयारी करते थे।
14-15 घंटे पढ़ाई करते थे भैया
गोल्डी बताती हैं, बिजली का कनेक्शन तो है पर गांव में अक्सर बिजली कट जाती है। इसलिए मोबाइल को चार्ज करके बाहर से भी कई बार लाना पड़ता था। हमारे घर में कोई भी आधुनिक सुविधा नहीं है। छत भी तिरपाल और पॉलीथिन की है। वह कहती हैं कि भैया 14 से 15 घंटे पढ़ाई करते थे।
होश संभालने के बाद ज्यादातर समय वह बाहर ही रहे। पहले इलाहाबाद फिर दिल्ली। दिल्ली से हमारा घर नजदीक है। भैया घर बहुत कम आते थे। जब हम लोग शिकायत करते तो कहते थे, जितना समय घर आने जाने में लगाऊंगा उतने में कुछ देर पढ़ाई करूंगा।
इसके अलावा वह कहते थे कि घर आऊंगा तो परिवार की हालत देखकर काम करने का मन करने लगता है। इससे मैं अपने लक्ष्य से भटक जाऊंगा। इसलिए जब कुछ बन जाऊंगा, तभी परिवार के साथ खुशियां मनाऊंगा। आज वो दिन आ गया है।”
बारिश के सीजन में पवन की किताबें भी भीग जाती थी
पिता मुकेश बताते हैं, “मेरा घर जर्जर हो गया है। हर साल बरसात में घर का तिरपाल चेंज करना पड़ता है। कई बार गर्मियों में तिरपाल फट जाता है। बारिश के सीजन में कई बार पवन की किताबें भी भीग जाया करती थीं। लेकिन हम सब हंसकर एक दूसरे का सहारा बनकर परिवार को आगे बढ़ा रहे थे। ये उम्मीद थी कि बेटा एक दिन कुछ न कुछ कर जरूर लेगा। इतना बड़ा अफसर बन जाएगा, ये विश्वास ही नहीं हो पा रहा है।
