इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के वोटों और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) पर्चियों की 100% क्रॉस-चेकिंग की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ADR समेत अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से एडवोकेट प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायण और संजय हेगड़े पैरवी कर रहे हैं। प्रशांत भूषण एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की तरफ से पेश हुए। वहीं चुनाव आयोग की ओर से एडवोकेट मनिंदर सिंह मौजूद हैं।
एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कोर्ट के सामने एक रिपोर्ट पेश की। इसमें आरोप था कि केरल में मॉक पोलिंग के दौरान भाजपा को ज्यादा वोट जा रहे थे। इस पर कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील मनिंदर सिंह से पूछा कि ये कितना सही है। सिंह ने कहा कि ये खबरें पूरी तरह झूठी और बेबुनियाद हैं।
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मनिंदर सिंह: स्वतंत्र रूप से काम कर रहे एक्सपर्ट के साथ टेक्निकल एक्सपर्ट की कमेटी बनाई जाती है। वोटिंग खत्म होने के बाद मैचिंग की जाती है। अगर कोई मैच होता है तो वोटर टर्नआउट ऐप के अनुमान पर आधारित होता है।
जस्टिस खन्ना: इससे पता चलता है कि संसदीय समिति को भी जानकारी नहीं है।
मनिंदर सिंह: आप मैकेनिज्म पर विचार कर रहे हैं, वोटर टर्नआउट ऐप आपके सामने नहीं रखा गया। इसका EVM से कोई लेना-देना नहीं है।
जस्टिस दत्ता: अगर ये आपके लिए परेशानी खड़ी करता है, तो इसे इस्तेमाल क्यों करते रहें।
मनिंदर सिंह: चुनाव आयोग 1-2 साल पहले चुनाव की तैयारी शुरू कर देता है।
जस्टिस खन्ना: अगर एक वोटर को बैलट पेपर चाहिए और दूसरे को नहीं, तो आप इसे कैसे मैच करेंगे। तब तो इसका गलत इस्तेमाल होगा।
मनिंदर सिंह: इसकी जरूरत क्या है, EVM का प्रभाव भी देखिए।
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मनिंदर सिंह: हम पर कोई आरोप न लगे, यह तय करने के लिए साथ आना होगा। आप एक संवैधानिक संस्था से डील कर रहे हैं, यह गिनती नहीं हो सकता। बैलेट पेपर से वोटिंग करने की अपील, पीछे पलटकर जाने जैसी है। एक बार फैसला हो जाने के बाद किसी भी अपील पर विचार नहीं किया जा सकता। छेड़छाड़ संभव नहीं है। यह मैकेनिज्म पूरी तरह जांचा-परखा है।
जस्टिस खन्ना: पोलिंग बूथ पर मौजूद अधिकारी को क्या कह रहे हैं- प्रिसाइडिंग ऑफिसर और पोलिंग ऑफिसर।
जस्टिस दत्ता: 1 कमरे में 1 बूथ।
जस्टिस खन्ना: 50% में CCTV कैमरा है। उसकी लाइव स्ट्रीमिंग हो रही है। जिसे कैप्चर करके रिकॉर्ड में स्टोर किया जा रहा है। अगर 2 स्लिप गिरती हैं तो यह तुरंत कैप्चर होगा।
मनिंदर सिंह: हां।
जस्टिस खन्ना: पेपर स्लिप मशीन पर हावी हैं और इनमें कोई गड़बड़ी नहीं हुई है?
मनिंदर सिंह: 100 से ज्यादा शिकायतें हैं, इनमें कोई विसंगति नहीं मिली।
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जस्टिस खन्ना: आप जो हमें बता रहे हैं और जो सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है, उसके बीच कुछ फर्क दिखता है। इसे सुधारने की जरूरत है।
चुनाव अधिकारी: हमने कुछ नहीं छिपाया है।
जस्टिस खन्ना: वोटर्स का भरोसा बनाए रखना है। हम पूरे मैकेनिज्म के लिए इसे कैसे सुनिश्चित करते हैं?
चुनाव अधिकारी: हम अक्सर पूछे जाने वाले सवालों का सेक्शन FAQ’s अपडेट करेंगे।
मनिंदर सिंह: हम पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं। उनका कोई मतलब नहीं, चुनाव कल से हैं।
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जस्टिस खन्ना: 2019 में ऐप में क्या खामियां थीं। क्या गलत जानकारी देता था।
चुनाव अधिकारी: इसमें जानकारी तुरंत अपडेट नहीं हो रही थी।
जस्टिस खन्ना: 17A में दर्ज वोट और मशीन में डाले गए वोट में कितना अंतर है।
चुनाव अधिकारी: 17C और मशीन में दर्ज वोटों के बीच कोई अंतर नहीं है।
जस्टिस खन्ना: मैं मान लूंगा कि 17A और 17C के बीच कोई अंतर नहीं है। आपके पास डेटा उपलब्ध है। नंबर की जांच अगले दिन होगी।
चुनाव अधिकारी: अगर इसे एक्सेस करने की कोई गलत कोशिश होती है, तो डिटेक्शन मॉडल बता देता है। जो इसके मैकेनिज्म में मौजूद है।
जस्टिस खन्ना: बिना तार के सिंबल अपलोडिंग कैसे की जाती है?
चुनाव अधिकारी: इसमें एक स्टैंडर्ड केबल है।
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चुनाव अधिकारी: 2019 में एल्गोरिदम में गलतियां थीं। अब हमने इसे अपडेट कर लिया है और ये सही ढंग से काम कर रहा है।
जस्टिस खन्ना: जो डेटा लिया गया है वह ऐप से मिला है। ये कैसे काम करता है।
चुनाव अधिकारी: इसे कोई भी प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकता है और वोटिंग परसेंट देख सकता है।
जस्टिस खन्ना: पोलिंग अफसर के लिए किसी भी वक्त तक वोट कितने पड़े ये नंबर देख पाना पॉसिबल है या उसे आखिर तक इंतजार करना पड़ेगा।
चुनाव अधिकारी: केवल कुल वोट्स देख सकते हैं।
लंच के बाद एक बार फिर सुनवाई शुरू
लंच के बाद एक बार फिर सुनवाई शुरू हुई।चुनाव आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने कंट्रोल यूनिट, वीवीपैट और बैलेट यूनिट के बीच वर्किंग प्रोसेस का चार्ट दिखाया।
चुनाव आयोग ने कहा- बार कोड से गिनती संभव नहीं
बेंच ने सवाल किया कि क्या बार कोड से काउंटिंग नहीं हो सकती है? चुनाव आयोग ने जवाब में कहा- पर्चियां छोटी और चिपचिपी होती हैं। इस इलेक्शन में बार कोड से गिनती नहीं की जा सकती है। जस्टिस खन्ना ने कहा- इस चुनाव की बात नहीं कर रहा हूं, क्या भविष्य में ये संभव है?
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याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वोटर्स को वीवीपैट स्लिप दी जानी चाहिए और वे इसे बैलट बॉक्स में डाल देंगे। वोटर्स की प्राइवेसी के चलते वोटिंग के अधिकार को किनारे नहीं किया जा सकता है।
इस पर जस्टिस खन्ना ने कहा- चुनाव आयोग हमें पूरी प्रक्रिया बताए। वीवीपैट की गिनती कैसे होती है, मैकेनिज्म क्या है, जिससे तय हो कि कोई छेड़छाड़ ना हो। आखिर विरोध क्यों हो रहा है?
चुनाव आयोग के वकील ने कहा- ये केवल आशंकाएं हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता कायम रहनी चाहिए, शक नहीं होना चाहिए कि ये होना चाहिए था और हुआ नहीं।
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जस्टिस खन्ना: 5 हजार से साढ़े सात हजार पर्चियों की गिनती होती है। इसमें 5 घंटे क्यों लगते हैं। बार कोड से काउंटिंग नहीं हो सकती है।
चुनाव अधिकारी: पर्चियां छोटी और चिपचिपी होती हैं। इस इलेक्शन में बार कोड से गिनती नहीं की जा सकती है।
जस्टिस खन्ना: इस चुनाव की बात नहीं कर रहा हूं, क्या भविष्य में ये संभव है?
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चुनाव अधिकारी: चुनाव के बाद मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम में जाती हैं। कैंडिडेट्स की मौजूदगी में इसे सील किया जाता है। कैंडिडेट्स की मौजूदगी में ही इसे गिनती के दिन खोला जाता है। सभी कैंडिडेट्स को 17C की कॉपी दी जाती है। काउंटिंग रूम में राउंड वाइज काउंटिंग की जाती है। मशीन में 2000 वोट स्टोर होते हैं।
जस्टिस खन्ना: आपका प्रिंटर तो सिर्फ 1500 प्रिंट ले सकता है। क्या ये संभव है कि एक आदमी को 2 वोट मिल जाएं।
चुनाव अधिकारी: ये संभव नहीं है।
जस्टिस खन्ना: गलतियां संभव हैं।
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जस्टिस खन्ना: आम आदमी कैसे पता करेगा कि वोट डाला जा चुका है?
चुनाव अधिकारी: हम इसके लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं, डेमोन्ट्रेशन भी होता है।
जस्टिस खन्ना: हम वोटिंग के बाद एक रजिस्टर साइन करते हैं। क्या ऐसी कोई व्यवस्था है कि रजिस्टर में दिए नंबर से कितने वोट दिए गए हैं, इसका मिलान हो।
चुनाव अधिकारी: सुविधा के हिसाब से इसे किया जाता है। चुनाव अधिकारी टोटल का बटन दबा सकता है।
जस्टिस खन्ना: मान लीजिए 17ए और 17सी में कोई गड़बड़ी हो। ऐसा कितनी बार होता है।
चुनाव अधिकारी: इनबिल्ट करेक्शन होता है।
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जस्टिस खन्ना: कितने स्ट्रॉन्ग रूम रहते हैं।
चुनाव अधिकारी: लोकसभा चुनाव के लिए 8 और विधानसभा के लिए 1-2
जस्टिस खन्ना: एक मिनट में कितने वोट डाले जा सकते हैं?
चुनाव अधिकारी: आमतौर पर 4 से कम वोट।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा: केरला में मॉकपोल के दौरान EVMs में भाजपा के फेवर में ज्यादा वोट रिकॉर्ड किए जाने का आरोप लगाया गया था, उसे भी देखिए।
चुनाव अधिकारी: ये खबर पूरी तरह गलत है।
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चुनाव अधिकारी: मशीनों को लोकसभा क्षेत्रों में भेजा जाता है। कोई भी अवैध यूनिट नहीं जोड़ी जा सकती है। ये केवल अपनी यूनिट को पहचानती हैं।
जस्टिस खन्ना: तो मैन्युफैक्चरर ये नहीं जानता है कि कौन सा बटन किस पार्टी को दिया गया है।
चुनाव अधिकारी: हां, इसके अलावा यह भी कि कौन सी मशीन किस लोकसभा क्षेत्र में भेजी जा रही है।
जस्टिस खन्ना: तो स्टोरेज इलेक्शन प्रोसेस शुरू होने के पहले ही हो जाती है।
चुनाव अधिकारी: हां, और स्ट्रॉन्ग रूम, जहां मशीनें होती हैं, उन्हें अकेले कोई नहीं खोल सकता है। 100 फीसदी मशीनें मॉक टेस्ट पास करती हैं। कैंडिडेट्स कोई भी 5 मशीनें चुन सकता है। ये प्रक्रिया चुनाव के दिन फिर दोहराई जाती है। वीवीपैट स्लिप निकाली जाती हैं और गिनी जाती हैं और इनका मिलान होता है। हर मशीन की पेपर सील अलग होती है। मशीन जब लाई जाती है तो सील नंबर चेक किए जा सकते हैं।
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जस्टिस खन्ना: आपके पास कितनी वीवीपैट मशीने हैं? करीब 2 करोड़। ये ईवीएम के बराबर नहीं हैं? आप प्रोग्राम मेमोरी को दोबारा नहीं बना सकते हैं।
चुनाव अधिकारी: नहीं, ये चिप में जाती है, जिसे बदला नहीं जा सकता है।
जस्टिस खन्ना: अगर कैंडिडेट सॉफ्टवेयर मैन्युफैक्चरिंग पर सवाल उठाता है तो?
चुनाव अधिकारी: इसे पब्लिकली नहीं दिखाया जा सकता है।
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जस्टिस खन्ना: सॉफ्टवेयर इलेक्शन कमीशन मुहैया कराता है, क्या कोई लॉकिंग मैकेनिज्म है? लैपटॉप रिटर्निंग अफसर इस्तेमाल करता है, क्या ये सुरक्षित है? क्या लैपटॉप के इस्तेमाल पर कोई प्रतिबंध है?
चुनाव अधिकारी: नहीं, लेकिन इसे अलग रखा जाता है।
जस्टिस खन्ना: अगर SLUs सुरक्षित है तो हम जानते हैं कि कोई भी बदलाव नहीं किया जा सकता है। फ्लैश मेमोरी फीड करने के बाद कोई दस्तखत लिए जाते हैं?
चुनाव अधिकारी: हां लोडिंग के बाद वीवीपैट प्रिंट की कमांड देता है, हम यह निश्चित करते हैं कि सही निशान लोड किए गए हैं। रिटर्निंग अफसर और कैंडिडेट दस्तखत करते हैं।
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जस्टिस खन्ना: अच्छा तो चुनाव से 7 दिन पहले आप कैंडिडेट्स की मौजूदगी में इमेज वीवीपैट की फ्लैश मेमोरी में अपलोड करते हैं। एक बार अपलोड किए जाने के बाद इसे बदला नहीं जा सकता है, क्योंकि ये किसी कम्प्यूटर या लैपटॉप से नहीं जुड़ी होती है। कितनी SLUs बनाई जाती हैं।
चुनाव अधिकारी: आमतौर पर हर क्षेत्र में एक, ये नतीजे आने तक रिटर्निंग अफसर की निगरानी में रहती हैं।
जस्टिस खन्ना: छेड़छाड़ ना हो इसके लिए क्या ये सीलबंद रहती है?
चुनाव अधिकारी: अभी यह व्यवस्था नहीं है।
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जस्टिस खन्ना: निश्चित तौर पर प्रिंटर में कोई सॉफ्टवेयर होगा।
चुनाव अधिकारी: हर PAT में 4 मेगाबाइट की फ्लैश मेमोरी होती है, जिसमें सिम्बल स्टोर रहते हैं। रिटर्निंग अफसर इलेक्ट्रॉनिक बैलट बॉक्स तैयार करता है। इसे सिंबल लोडिंग यूनिट में अपलोड किया जाता है। ये सीरियल नंबर, कैंडिडेट का नाम और सिंबल बताता है। कुछ भी पहले से लोड नहीं होता है। इसमें डेटा नहीं है, ये इमेज फॉरमेट है।
जस्टिस खन्ना: निश्चित तौर पर इमेज भी कोई फाइल होती होगी? आप इसे लोगों को कैसे बताते हैं?
चुनाव अधिकारी: हां ये FAQs के रूप में पब्लिक प्लेटफॉर्म पर है।
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जस्टिस खन्ना: 3 चीजें हैं जो सभी कंट्रोल यूनिट में अपलोड होती हैं?
चुनाव अधिकारी: कंट्रोल यूनिट वीवीपैट को कमांड देती है कि बटन नंबर 3 से जुड़ी जानकारी प्रिंट कर दी जाए। स्लिप कटकर वीवीपैट से जुड़े सीलबंद बक्से में गिरती है, जो वीवीपैट से ही जुड़ा होता है। मतदाता ये स्लिप 7 सेकेंड तक देख सकता है। वीवीपैट कंट्रोल यूनिट तक सिग्नल भेजती है। वीवीपैट केवल कंट्रोल यूनिट से कम्युनिकेट करती है। सबकुछ कंट्रोल यूनिट में जमा रहता है।
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जस्टिस खन्ना: आप कह रहे हैं कि वीवीपैट केवल प्रिंटर है। चुनाव निशान का डेटा किस यूनिट में अपलोड होता है?
चुनाव अधिकारी: मैं इलेक्शन की प्लानिंग देखता हूं। यहां जो भी कह रहा हूं वो बिना अथॉरिटी के कह रहा हूं। बैलट यूनिट केवल ये बताती है कि बटन नंबर 3 दबाया गया है। बैलट यूनिट को कैंडिडेट का पता नहीं है। कुछ भी कंट्रोल यूनिट में लोड नहीं होता है।
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मनिंदर सिंह: केवल आशंकाएं हैं और कुछ नहीं।
जस्टिस दत्ता: यह चुनावी प्रक्रिया है। इसकी पवित्रता कायम रहनी चाहिए, किसी को भी शक नहीं होना चाहिए कि ये होना चाहिए था और हुआ नहीं।
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(इलेक्शन कमीशन की ओर से वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह….इसके पहले सभी दलीलें याचिककर्ताओं की ओर से थीं)
जस्टिस खन्ना: मिस्टर सिंह (इलेक्शन कमीशन के वकील), हमें पूरी प्रक्रिया बताइए, वीवीपैट की गिनती कैसे होती है, किस स्टेज पर कैंडिडेट का प्रतिनिधि, वो मैकेनिज्म क्या है, जिससे तय हो कि कोई छेड़छाड़ ना हो। ये लोग पार्लियामेंट्री कमेटी की रिपोर्ट पर भरोसा कर रहे हैं, हमें इस पर स्पष्टीकरण चाहिए। आखिर विरोध क्यों हो रहा है।
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एक अन्य वकील ने कहा: इंजीनियर्स के पास मशीनों का इनडायरेक्ट एक्सेस होता है और वे चुनाव आयोग के प्रति जिम्मेदार नहीं होते हैं। जो भी इस प्रक्रिया में शामिल हो, उसकी इलेक्शन कमीशन के प्रति जवाबदेही होनी चाहिए।
जस्टिस खन्ना: इलेक्शन कमीशन जिम्मेदारियों से मुंह नहीं छिपा रहा है। अगर कुछ गलत होता है तो इलेक्शन कमीशन जिम्मेदार है। अगर उन्हें अपग्रेड करना है तो वे करेंगे।
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एडवोकेट हेगडे: 14 से 18 राउंड के बीच सभी वोट इलेक्ट्रॉनिकली गिने जाते हैं। यह प्रक्रिया दोपहर 2 बजे तक खत्म हो जाती है। हर टेबल पर 3 चुनाव अधिकारी होते हैं। आपके पास 250 लोग होते हैं, जो तेजी से वीवीपैट की गिनती कर सकते हैं। इसमें 13 दिन नहीं लगेंगे। गिनती तुरंत होगी, जांच में वक्त लिया जा सकता है। इसके बाद मिलान किया जा सकता है, इससे वोटिंग प्रक्रिया की विश्वसनीयता और बढ़ जाएगी। इस पर भी ध्यान दीजिए कि आज इसके लिए क्या व्यवस्था है।
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जस्टिस खन्ना: आप जो कह रहे हैं, उसके वास्तविक नतीजों का आपको पता होना चाहिए।
एडवोकेट पाशा: वोटर्स को वीवीपैट स्लिप दी जानी चाहिए और वे इसे बैलट बॉक्स में डाल देंगे।
जस्टिस खन्ना: इससे वोटर्स की निजता प्रभावित नहीं होगी?
एडवोकेट पाशा: यहां वोटर्स की प्राइवेसी के चलते वोटिंग के अधिकार को किनारे नहीं किया जा सकता है।
प्रशांत भूषण: अगर वो इस स्टेज पर वीवीपैट का शीशा नहीं बदल सकते हैं तो कम से कम लाइट तो पूरे टाइम जली रहने दी जाए, ताकि मैं देख सकूं कि स्लिप कटकर गिर गई है। इससे निजता भी नहीं प्रभावित होगी। ये भी एक रास्ता है।
एडवोकेट संजय हेगडे: 12 लाख स्लिप की गिनती होगी। आज भी देखा जाए तो ये गिनती कैसे होगी? ये काम हर लोकसभा क्षेत्र में साथ-साथ किया जाएगा।
16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण की दलीलें और जजों को जवाब
