साल 1984, दिसंबर का महीना। आधी रात का वक्त था। दिल्ली में पीएम राजीव गांधी ने कांग्रेस के बड़े नेता एच.आर भारद्वाज को अपने आवास पर बुलाया। भारद्वाज वहां पहुंचे तो सामने एक शख्स बैठे हुए थे। राजीव ने भारद्वाज से पूछा, इन्हें जानते हो? भारद्वाज ने कहा कि यह तो एक्टर हैं लेकिन मैं इनके पिता को जानता हूं। सामने बैठे वो शख्स थे…अमिताभ बच्चन।
राजीव ने कहा- इलाहाबाद सीट से ये चुनाव लड़ेंगे। भारद्वाज हैरान हो गए। अमिताभ ने नामांकन खत्म होने से 24 घंटे पहले नॉमिनेशन किया। रैलियां की। एक बार तो विरोधी प्रत्याशी के मंच पर पहुंचे और उनका पैर छू लिया। वहां खड़े होकर कह दिया कि वोट मुझे ही दीजिएगा।
नतीजे आए तो अमिताभ इतने बड़े अंतर से जीते कि इलाहाबाद का वह रिकॉर्ड आज भी नहीं टूटा। 4 हजार से ज्यादा बैलट पेपर पर अमिताभ के नाम के आगे लिपिस्टिक के निशान थे। लेकिन 3 साल बाद ही उन्होंने राजनीति से हार मान ली। सत्ता छोड़कर वापस बॉलीवुड में लौट गए।
भास्कर की स्पेशल सीरीज चुनावी किस्सा में आज कहानी अमिताभ बच्चन के इकलौते चुनाव की…
राजीव गांधी ने अमिताभ को बुलाया और चुनाव लड़ने के लिए कहा
40 साल पहले…31 अक्टूबर 1984 की सुबह। पीएम इंदिरा गांधी को सुरक्षाकर्मियों ने गोलियों से भून दिया। उनकी मौत के बाद कांग्रेस पार्टी सकते में आ गई। देश में नेतृत्व संकट खड़ा हो गया। फैसला हुआ कि इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी को पीएम बनाया जाए। एक महीने बाद 8वां लोकसभा चुनाव होने वाला था।
इंदिरा की मौत के बाद देश में सहानुभूति की लहर थी। कांग्रेस को पता था कि उनकी पार्टी जीत सकती है। लेकिन इलाहाबाद सीट पर मामला फंसा था। वहां कांग्रेस के दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा अब लोकदल के टिकट से कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले थे। बहुगुणा उस वक्त राजनीति में बड़ा नाम थे। इसलिए उनके सामने मैदान में किसे उतरा जाए। इस पर पार्टी में चर्चाएं होने लगीं।
नाम सामने आया केपी तिवारी का। इंदिरा गांधी के पीएम रहते यूपी में कांग्रेस की हालत बहुत अच्छी नहीं थी। इसलिए इंदिरा ने खुद मौत से दो महीने पहले पार्टी को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी वीपी सिंह को सौंपी थी। ऐसे में यूपी में प्रत्याशियों को चुनने में सबसे ज्यादा दखल वीपी सिंह का ही था। केपी तिवारी, वीपी सिंह के बहुत खास थे। इसलिए इलाहाबाद में उन्हें कांग्रेस की तरफ से टिकट दिया गया।
चुनाव की तैयारियां शुरू हो गईं। लेकिन राजीव के मन में एक अलग ही प्लान चल रहा था। उन्होंने एक दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एचआर भारद्वाज को अपने आवास 1 अकबर रोड पर बुलाया। भारद्वाज वहां पहुंचे तो वीपी सिंह पहले से मौजूद थे। उन्हें नजरअंदाज करते हुए राजीव, भारद्वाज को लेकर कमरे में चले गए।
वहां अमिताभ बच्चन बैठे हुए थे। राजीव ने भारद्वाज से पूछा कि क्या वो इन्हें जानते हैं। भारद्वाज ने कहा कि यह तो एक्टर हैं। राजीव ने दोनों की पहचान करवाई। बातचीत हुई।
अमिताभ ने कहा मुझे तो पॉलिटिक्स का ‘P’ भी नहीं पता
कुछ वक्त बातचीत के बाद राजीव ने अमिताभ के सामने इलाहाबाद से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रख दिया। पहले तो अमिताभ को इस बात पर भरोसा ही नहीं हुआ लेकिन जब बात सही निकली तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया। अमिताभ ने राजीव से बोला कि मैं कैसे चुनाव लड़ सकता हूं। मुझे तो पॉलिटिक्स का ‘P’ भी नहीं पता।
लेकिन राजीव ने उन्हें बहुत समझाया तो वो चुनाव लड़ने के लिए राजी हो गए। वजह थी गांधी और बच्चन परिवार के बीच गहरी दोस्ती। अमिताभ की मां तेजी बच्चन, राजीव की मां इंदिरा गांधी की अच्छी दोस्त थीं। दोस्ती भी इतनी गहरी कि साल 1968 में जब सोनिया गांधी इटली से भारत घूमने आई थीं तो वह बच्चन परिवार के साथ ही रुकी थीं।
दोनों परिवारों की यह दोस्ती उनके बच्चों ने भी निभाई। जब अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन राज्यसभा के लिए नामित हुए तो उनका पूरा परिवार दिल्ली आ गया। वहां अमिताभ की दोस्ती राजीव से हुई। इसी दोस्ती के नाते राजीव ने अमिताभ के सामने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। हाल ही में इंदिरा गांधी की हत्या भी हुई थी। इसलिए अपने दोस्त राजीव को सहारा देने के लिए अमिताभ ने हां कर दी। वो चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए।
केपी तिवारी को हटाकर अमिताभ का नाम दिया गया
राजीव, अमिताभ और भारद्वाज पूरी बातचीत के बाद कमरे से निकलकर विजिटिंग रूम पहुंचे। वहां वीपी सिंह बैठे हुए थे। राजीव ने इलाहाबाद से अमिताभ को प्रत्याशी बनाने का पूरा मामला उनके सामने रखा। इस बात से वीपी सिंह कुछ परेशान नजर आए। हालांकि, उन्होंने खुद को संभालते हुए बस इतना कहा, ‘कोई समस्या नहीं है। हम लोग केपी तिवारी को बदल देंगे।’
रातों रात केपी तिवारी को यूपी कैबिनेट में शामिल किया गया। अगली सुबह उन्होंने शपथ भी ले ली। अब अमिताभ के लिए रास्ता साफ हो गया था। कांग्रेस पार्टी ने तय किया कि अभी अमिताभ के चुनाव लड़ने की बात आखिर तक किसी को नहीं बताएंगे।
अमिताभ को इलाहाबाद ले गए, 24 घंटे पहले नामांकन
कांग्रेस में अमिताभ के नाम को राज रखने की रणनीति बनी। यूपी में चुनावी रणनीति देख रहे अरुण नेहरू ने पूरा प्लान बनाया। वह अमिताभ और जया बच्चन को लेकर लखनऊ पहुंचे। दोनों को एयरपोर्ट से सीधे सीएम आवास ले जाया गया। वहां तय हुआ की उन्हें सबसे छुपते-छुपाते इलाहाबाद ले जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। अमिताभ इलाहाबाद पहुंचे।
चुनाव के लिए पर्चा दाखिल करने का आखिरी दिन था। शाम 4 बजे तक पर्चा भर सकते थे। अमिताभ वहां साढ़े 3 बजे पहुंचे और पर्चा भरकर सबको हैरान कर दिया। अब यूपी की राजनीति के पुराने खिलाड़ी बहुगुणा की टक्कर सदी के सुपरस्टार से होने वाली थी। लेकिन बहुगुणा भी पीछे नहीं हटे उन्होंने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी। इधर, अमिताभ के भी रोड शो शुरू हो गए।
रोड शो हुआ तो लड़कियों ने अमिताभ के ऊपर दुपट्टे फेंके
नामांकन के अगले दिन…अमिताभ का रोड शो हुआ। उनका काफिला आनंद भवन से कटरा होते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचा। उनकी एक झलक के लिए हॉस्टल और आसपास की लड़कियों की भीड़ उमड़ पड़ी। लड़कियों ने उनके ऊपर अपने दुपट्टे फेंकने शुरू कर दिए। कांग्रेस के एक नेता ने उन दुपट्टों को भी गिना था। कुल 1785 दुपट्टे थे।
अमिताभ के काफिले में उनके साथ पत्नी जया बच्चन और भाई अजिताभ भी थे, लेकिन सबकी निगाहें बस अमिताभ पर टिकी थीं। इसी बीच हॉस्टल से भागती आई कुछ लड़कियों ने अमिताभ का नाम चिल्लाना शुरू कर दिया। उन्होंने अमिताभ की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया। वो सबका हाथ छूते हुए आगे बढ़ गए। लेकिन दुपट्टा फेंकना मानो एक ट्रेंड बन गया। चुनाव प्रचार के लिए अमिताभ जहां जाते लड़कियां उन पर दुपट्टा फेंकती थीं।
बहुगुणा ने अपनी रैली में अमिताभ को नचनिया बुलाया
इलाहाबाद में जब-जब अमिताभ के रोड शो होते उनके पीछे युवाओं का हुजूम उमड़ पड़ता। इन सबके बीच बहुगुणा को अपनी रणनीति कमजोर होती नजर आने लगी। उन्होंने भी अमिताभ के खिलाफ कमर कस ली और प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने रैलियों में कई बार अमिताभ को नचनिया बुलाया। उनके खिलाफ ‘सरल नहीं संसद में आना, मारो ठुमके गाओ गाना’ और ‘दम नहीं है पंजे में लंबू फंसा शिकंजे में’ जैसे नारे भी लगवाए गए।
परेड ग्राउंड पर बहुगुणा की सभा चल रही थी। उसी के सामने से अमिताभ का जुलूस निकलना। जुलूस में इतना शोर होने लगा कि बहुगुणा भाषण देते-देते चुप हो गए। अमिताभ ने बहुगुणा को देखा तो तुरंत अपनी जीप से नीचे उतर गए। उन्होंने बहुगुणा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया तो वो हैरान रह गए। उन्होंने अमिताभ से कहा कि तुम जीत जाओगे, लेकिन यहां आए हो तो कुछ बोलकर जाओ।
बहुगुणा के कहने पर अमिताभ मंच पर सामने आए लेकिन उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यहां क्या बोलें। वह कुछ देर शांत रहे, जनता की तरफ देखा और कहा, ‘आप लोग हमें वोट दीजिएगा।’ यह सुनकर बहुगुणा अमिताभ को देखते रह गए।
4 हजार बैलट पेपर पर अमिताभ के नाम के आगे लिपस्टिक के निशान थे
रैलियों का सिलसिला खत्म हुआ। वोटिंग हुई। काउंटिंग शुरू हुई। एक के बाद एक बैलट बॉक्स खुल रहे थे। वोटों की गिनती चालू थी। इसी बीच मतगणना अधिकारी को कुछ बैलेट पेपर्स पर अमिताभ के नाम के आगे लिपस्टिक के निशान दिखे। रात 10 बजे तक चली काउंटिंग में करीब 4 हजार बैलेट पेपर ऐसे मिले जिनमें लिपस्टिक लगी हुई थी। इलेक्शन कमीशन ने ऐसे सभी बैलट पेपर्स को रद्द कर दिया। 4 हजार वोट बर्बाद हो गए।
…लेकिन इतने वोट बर्बाद होने के बावजूद अमिताभ को 68.21% वोट मिले। उन्होंने अपने विरोधी बहुगुणा को 1 लाख 87 हजार 795 वोटों से हरा दिया। इलाहाबाद में यह एक ऐसी ऐतिहासिक जीत थी जिसका रिकॉर्ड आज तक नहीं टूटा है। अमिताभ की इस जीत से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई और बहुगुणा का राजनीतिक करियर खत्म हो गया।
अमिताभ का राजनीतिक करियर बस 3 साल का था
अमिताभ की जीत हुई लेकिन राजनीतिक गलियारे में उनकी पारी ज्यादा लंबी नहीं चली। साल 1987 में बोफोर्स घोटाले के मामले में अमिताभ के भाई अजिताभ पर आरोप लगे। इसी वजह से अमिताभ ने एक सांसद और राजनेता के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राजनीति छोड़ दी और आज तक वापसी नहीं की।
अमिताभ ने 2014 में अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘राजनीति में कदम रखना एक गलती थी। मैं भावनाओं में बहकर मैदान में उतर गया लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि राजनीतिक क्षेत्र में भावनाएं वास्तविकता से बहुत अलग हैं। इसलिए मैंने हार मान ली।’
सोर्स: नीरजा चौधरी की किताब ‘हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’।
सिद्धार्थ श्रीवास्तव की किताब, ‘अमिताभ-अ पर्सनालिटी’।
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