पूर्व-राजपरिवार के बोले-मैं राज्यसभा सदस्य रहा, ज्यादा पसंद नहीं आया:मैंने इंदिरा को भी देखा, लेकिन मुझे अपना काम खुद करना और लोगों की सेवा करना बेहतर लगा
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में जोधपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य गज सिंह ने अपनी यादें और सबके पसंदीदा ‘बापजी’ बनने का सफर शेयर करते हुए कहा कि राजा की कोई जाति नहीं होती।
आजादी के बाद शाही परिवारों और चुनावी राजनीति के बीच संबंधों पर बातचीत करते हुआ कहा- मैं 1990 से 1992 तक संसद के ऊपरी सदन का सदस्य भी रहा। मेरे पिता पहले शाही सदस्य थे, जिन्होंने 1952 में चुनाव लड़ा और चुनावी राजनीति में शाही परिवारों के प्रवेश का विचार शुरू किया। उन्होंने सभी को इकट्ठा किया और कई सीटें हासिल की थी।
मेरे परिवार के सभी सदस्य किसी न किसी तरह राजनीति में शामिल हैं। हालांकि, मैंने खुद, राज्यसभा सांसद होने के बावजूद, इसे ज्यादा पसंद नहीं किया। मैंने इंदिरा गांधी को भी देखा, लेकिन मुझे लगा कि मेरे लिए अपना काम खुद करना और लोगों की सेवा करना बेहतर होगा
राइटर और कॉलमिस्ट शोभा डे ने ईरान के मुद्दे पर कहा- वहां जो हो रहा है, वह गलत है। महिलाओं और निर्दोषों के साथ जो हो रहा है, इसे देखकर हम आंखें बंद नहीं कर सकते। हमारा फर्ज है कि हम इसके खिलाफ प्रोटेस्ट करें। मैं सरकार या जियो पॉलिटिक्स की परवाह किए बगैर बोल रही हूं। शोभा डे ने यह बात जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में मीडिया से बातचीत में कही।
चेस ग्रैंडमास्टर विश्वनाथन आनंद ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते यूज पर कहा- मैं एआई से जवाब नहीं खोजता हूं। AI आपको आसानी से जवाब दे सकता है, लेकिन किसी भी समझने वाले के जवाब का लॉजिक क्या है, यह जानना जरूरी है। लाइटनिंग किड सेशन में विश्वनाथन आनंद ने चेस से लेकर अपने एटीट्यूड और गुस्से पर भी बात की।
इससे पहले JLF में दूसरे दिन की शुरुआत मॉर्निंग म्यूजिक में लोक गायिका भंवरी देवी की परफॉर्मेंस से हुई। वहीं, फ्रंट लॉन में आयोजित ‘असेंबलिंग इंडियाज कॉन्स्टिट्यूशन’ में कांग्रेस सांसद और राइटर शशि थरूर नहीं पहुंचे। उनका नाम स्पीकर्स की लिस्ट में था।
ग्रैंडमास्टर ने बच्चों से कहा- प्रैक्टिस बहुत जरूरी आज चारबाग में हुए पहले सेशन में ग्रैंडमास्टर ने बच्चों के साथ अपने एक्सपीरियंस शेयर किए। उन्होंने कहा- प्रैक्टिस करते रहना बेहद जरूरी है।
मैं भी बहुत गेम हारा हूं। जब मैं तीन गेम हार गया था। तब मैंने हार में ध्यान नहीं दिया, सिर्फ प्रैक्टिस को प्रायोरिटी दी। उन्होंने अपनी खिलाड़ी बनने की जर्नी भी शेयर की।
आनंद ने बताया कि पेरेंट्स का रोल भी करियर को शेप करने में बहुत बड़ा होता है। उनके जीवन में चेस उनकी मां के कारण आया। वे ही उन्हें लेकर हर टूर्नामेंट में जाती थीं।
आनंद ने चारबाग के सेशन में एआई की बढ़ती इंपॉर्टेंस पर भी बात की। उन्होंने कहा कि वे एआई से हर जवाब नहीं खोजते हैं। एआई के जवाब समझने में ही थकान होने लगती है।
महिला राइटर बोलीं- ट्रम्प लोकतंत्र के लिए खतरनाक सेशन ‘टू चीयर्स फॉर डेमोक्रेसी’ में अमेरिका में लोकतंत्र के मौजूदा हालात पर बात हुई। इसमें ‘वाट वुमन वांट: अंडरस्टैंडिंग द फीमेल वोटर इन मॉडर्न इंडिया’ की राइटर रूही तिवारी ने कहा- अमेरिका के विषय में हमेशा यह बात की जाती है कि इतने साल बाद भी वहां कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनी। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प लोकतंत्र के लिए जेंडर के सवाल से भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं।
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लाइव अपडेट्स
लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता चुप रहना सबसे सुरक्षित
- शोभा डे ने कहा कि इच्छा केवल निजी विषय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विषय भी है। सत्ता और समाज, दोनों मिलकर यह तय करते हैं कि कौन क्या चाहे, कैसे चाहे और किस हद तक चाहे।
- खासतौर पर महिलाओं की इच्छा को हमेशा नियंत्रित, दबाया और अपराधबोध से जोड़ा गया। शोभा डे ने कहा कि राजनीति जब शरीर और नैतिकता को नियंत्रित करने लगती है, तब सबसे पहले स्त्रियों की स्वतंत्रता पर असर पड़ता है।
- शोभा डे ने कहा- इच्छा कोई बाहरी या गंदी चीज नहीं है, बल्कि यह एक स्वाभाविक मानवीय भावना है। समस्या तब पैदा होती है, जब समाज इसे शर्म से ढक देता है। लड़कियों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि उनकी इच्छा खतरनाक है। उन्हें अपने शरीर से माफी मांगनी चाहिए और चुप रहना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।
- उन्होंने कहा कि तकनीक के दौर में युवा एक-दूसरे के बेहद पास होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। सब मोबाइल फोन में खोए रहते हैं। आंखों का संपर्क, संवाद और संवेदनशीलता कम होती जा रही है। कोविड के बाद यह दूरी और गहरी हुई है, जिससे रिश्तों की भाषा और भी उलझ गई है।
शोभा डे बोले- दुख होता है बदलाव नहीं आया
शोभा डे ने सत्र में कहा- कभी-कभी मुझे यह सोचकर बहुत दुख होता है कि जिस रफ्तार से हमें उम्मीद थी कि चीजें बदलेंगी। युवा पुरुष महिलाओं की इच्छाओं, उनकी अपेक्षाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होंगे, लेकिन वह बदलाव आया ही नहीं। बस उससे पूछ लो, भगवान के लिए। कोई पूछता ही नहीं।
‘शर्म’ जैसे शब्द बचपन से ही लड़कियों के मासूम दिमाग में बैठा दिए जाते हैं: शोभा डे
राइटर शोभा डे ने कहा- तकनीक के बढ़ते असर के बीच युवा पीढ़ी रिश्तों के असली मतलब, आत्मसम्मान और अपने शरीर और भावनाओं को समझने से दूर होती जा रही है। खास तौर पर लड़कियों को बचपन से ही अपने शरीर और इच्छाओं को लेकर शर्म करना सिखाया जाता है। ‘शर्म’ जैसे शब्द मासूम दिमाग में बैठा दिए जाते हैं, जिससे लड़कियां अपने विचार और भावनाएं दबाने लगती हैं।
शोभा डे ने इस बात से असहमति जताई कि पिछले 50 साल में महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
शोभा डे ने कहा- सबसे बड़ा बदलाव ये है कि आज महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा खुलकर अपनी बात रख रही हैं। सोशल मीडिया ने छोटे शहरों और गांवों की महिलाओं को भी मंच दिया है।
शिक्षा को महिला सशक्तीकरण की सबसे मजबूत नींव बताया, लेकिन ये भी माना कि कई परिवार आज भी बेटियों को पढ़ाने के बाद शादी और घर तक ही सीमित कर देते हैं। आज भारत में महिलाएं सेना, वायुसेना, कॉमर्शियल पायलट, प्रशासन और कॉरपोरेट जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। अब विमान में ये जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि पायलट महिला है, ये सामान्य बात हो गई है।
शोभा डे ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों के लिए कानून तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी जानकारी और आर्थिक स्वतंत्रता की कमी एक बड़ी समस्या है।
जब तक महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगी, तब तक वह अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का साहस नहीं कर पाएगी।
शोभा डे बोलीं- बॉलीवुड में काम प्रतिभा के आधार पर मिलता है
- ऑस्कर विनर म्यूजिक डायरेक्टर एआर रहमान के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए शोभा डे ने कहा- वे बॉलीवुड में सांप्रदायिक भावना को लेकर किसी भी नकारात्मक सोच से सहमत नहीं हैं। बॉलीवुड में काम प्रतिभा के आधार पर मिलता है।
- उन्होंने कहा- मुझे अगली पीढ़ी से काफी उम्मीदें हैं। महिलाओं में जबरदस्त सहन शक्ति और क्षमता है। इसे कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।
- दरअसल, रहमान ने फिल्म रामायण के लिए म्यूजिक तैयार करने को लेकर कहा था कि रामायण मानवीय मूल्यों और आदर्शों की कहानी है। धर्म से परे ज्ञान हर जगह मिलता है। इस प्रोजेक्ट को लेकर उनके मुस्लिम नाम की वजह से उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं हुई।
गज सिंह बोले- मेरे पिता पहले शाही सदस्य थे, जिन्होंने 1952 में चुनाव लड़ा
गज सिंह ने आजादी के बाद शाही परिवारों और चुनावी राजनीति के बीच संबंधों पर बातचीत करते हुए गज सिंह ने कहा- मैं 1990 से 1992 तक संसद के ऊपरी सदन का सदस्य भी रहा। मेरे पिता पहले शाही सदस्य थे, जिन्होंने 1952 में चुनाव लड़ा और चुनावी राजनीति में शाही परिवारों के प्रवेश का विचार शुरू किया। उन्होंने सभी को इकट्ठा किया और कई सीटें हासिल की थी।
मेरे परिवार के सभी सदस्य किसी न किसी तरह राजनीति में शामिल हैं। हालांकि, मैंने खुद राज्यसभा सांसद होने के बावजूद इसे ज्यादा पसंद नहीं किया। मैंने इंदिरा गांधी को भी देखा। लेकिन मुझे लगा कि मेरे लिए अपने काम खुद करना और लोगों की सेवा करना बेहतर होगा।
