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सांवलिया सेठ के चढ़ावे का रिकॉर्ड टूटा, ₹51 करोड़ आए:भक्तों ने 1 किलो से ज्यादा सोना, 207 किलो से ज्यादा चांदी दान की

सांवलिया सेठ के चढ़ावे का रिकॉर्ड टूटा, ₹51 करोड़ आए:भक्तों ने 1 किलो से ज्यादा सोना, 207 किलो से ज्यादा चांदी दान की

चित्तौड़गढ़40 मिनट पहले
सांवलियाजी के चढ़ावे की गिनती 19 नवंबर से शुरू हुई थी।

चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) के कृष्णधाम श्रीसांवलियाजी सेठ मंदिर को दान में मिली राशि ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। गुरुवार को हुए छठे और आखिरी राउंड में गिनती पूरी हुई। इसी के साथ सभी राउंड के नकद चढ़ावे, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के रुपए जोड़कर कुल 51 करोड़ 27 लाख 30 हजार 112 रुपए चढ़ावा आया। मंदिर इतिहास में यह पहली बार है, जब भंडार ने 51 करोड़ का आंकड़ा पार किया है।

इस बार न सिर्फ नकद बल्कि ऑनलाइन माध्यमों से भी भक्तों ने बड़ी श्रद्धा दिखाई। ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से कुल 10 करोड़ 52 लाख 89 हजार 569 रुपए मिले। यह पैसा पिछले सालों की तुलना में काफी ज्यादा है। नकद गिनती के साथ-साथ गुरुवार को सोना-चांदी का तौल भी किया गया।

इसमें कुल 207 किलो 793 ग्राम चांदी और कुल 1204 ग्राम 04 मिलीग्राम सोना प्राप्त हुआ। इसमें भंडार से 86.200 किलो चांदी, भेंट कक्ष से 121.593 किलो चांदी, भंडार से 985 ग्राम सोना, भेंट कक्ष से 219 ग्राम 400 मिलीग्राम सोना मिला ।

तस्वीर, मंदिर की है। यहां लोग बैठकर नोट को गिनते हैं। इसमें पुलिस भी मौजूद रहती है।

19 नवंबर को भंडार खोला, भक्तों में उत्साह बढ़ा श्री सांवलियाजी मंदिर का भंडार 19 नवंबर को खोला गया था। इसके बाद लगातार भंडार की गिनती की गई। सुबह से शाम तक नोटों, सिक्कों और पर्चियों की गिनती चलती रही। मंदिर परिसर में पूरे समय भक्तों की भीड़ बनी रही। सभी राउंड की गिनती ट्रस्ट, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्थाओं की मौजूदगी में की गई।

सांवलिया जी में भक्तों का विश्वास बढ़ता जा रहा है। यह राशि श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था को दिखाती है।

अब जानिए- हर राउंड में कितनी नकदी मिली…

  • पहले राउंड में मिले बारह करोड़ पैंतीस लाख रुपए: इस बार भंडार 19 नवंबर को खोला गया था। इसी दिन पहले राउंड की गिनती की गई। पहले ही राउंड में 12 करोड़ 35 लाख रुपए निकले थे। इसे देखकर साफ अंदाजा हो गया था कि इस साल दान राशि पिछले सालों के मुकाबले काफी ज्यादा रहने वाली है।
  • दूसरे राउंड में मिले आठ करोड़ चौवन लाख रुपए: 20 नवंबर को अमावस्या होने के कारण गिनती रोक दी गई थी। उसके बाद 21 नवंबर को दूसरा राउंड शुरू हुआ। इस राउंड में 8 करोड़ 54 लाख रुपए प्राप्त हुए। यह राशि श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था को दिखाती है।
  • तीसरे राउंड में सात करोड़ आठ लाख अस्सी हजार आए: 22 और 23 नवंबर को भीड़ बहुत ज्यादा होने की वजह से गिनती रोक दी गई थी। 24 नवंबर को जब तीसरा राउंड किया गया, तो इसमें 7 करोड़ 8 लाख 80 हजार रुपए निकले।
  • चौथे राउंड में आठ करोड़ पंद्रह लाख की राशि निकली: चौथे राउंड की गिनती में 8 करोड़ 15 लाख 80 हजार रुपए मिले। यहीं से यह बिल्कुल पक्का हो गया कि मंदिर की दान राशि अब नया रिकॉर्ड बनाएगी। मंदिर मंडल के सदस्य पवन तिवारी ने बताया कि श्रद्धालुओं का बढ़ता विश्वास ही इस उपलब्धि की सबसे बड़ी वजह है।
  • पांचवें राउंड के बाद आंकड़ा चालीस करोड़ पार पहुंचा: 26 नवंबर को हुए पांचवें राउंड में निकले 4 करोड़ 19 लाख 79 हजार रुपए जोड़ने के बाद कुल राशि 40 करोड़ 33 लाख 39 हजार तक पहुंच गई।
  • छठा राउंड: अंतिम राउंड में 41 लाख 01 हजार 543 रुपए प्राप्त हुए।

ग्राफिक में समझिए सांवलिया सेठ मंदिर का इतिहास

चबूतरे पर होती थी मूर्तियों की पूजा

40 साल तक बागुंड के प्राकट्य स्थल पर ही एक चबूतरे पर तीनों मूर्तियों की पूजा की जाती रही। इसके बाद फिर भादसोड़ा के ग्रामीण एक मूर्ति को अपने गांव ले आए और एक केलुपोश मकान में स्थापित कर दिया। वहीं, एक मूर्ति मंडफिया लाई गई थी। तंवर बताते हैं- इन्हीं मूर्तियों में से एक मूर्ति के सीने पर पैर का निशान था। मान्यता है कि यह भृगु ऋषि के पैर हैं।

अब पढ़िए- भृगु ऋषि से जुड़ी मान्यता इस मूर्ति पर जो चरण चिन्ह है, उसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, एक बार सभी ऋषियों ने मिलकर एक यज्ञ किया। विचार किया कि इस यज्ञ का फल ब्रह्मा, विष्णु या महेश, इनमें से किसे दिया जाए।

निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया। वे सबसे पहले भगवान विष्णु के पास पहुंचे, जो उस समय निंद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।

भृगु ऋषि को यह लगा कि भगवान विष्णु उन्हें देखकर भी सोने का बहाना कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु के सीने पर लात मार दी।

भगवान तुरंत उठे और ऋषि के पैर पकड़ लिए, क्षमा मांगते हुए बोले– मेरा शरीर कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं आई? भगवान की यह विनम्रता और सहनशीलता देखकर भृगु ऋषि ने उन्हें त्रिदेवों में श्रेष्ठ माना और यज्ञ का फल उन्हें ही समर्पित किया।

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