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बद्रीनाथ से जोशीमठ पहुंची शंकराचार्य की गद्दी:सप्त बद्री में से एक हैं ‘नरसिंह बद्री’, 6 महीने तक यहीं होगी शीतकालीन पूजा

बद्रीनाथ से जोशीमठ पहुंची शंकराचार्य की गद्दी:सप्त बद्री में से एक हैं ‘नरसिंह बद्री’, 6 महीने तक यहीं होगी शीतकालीन पूजा

चमोली53 मिनट पहले
मंदिर में पहुंचती शंकराचार्य की गद्दी।

उत्तराखंड के चमोली में स्थित बद्रीनाथ के कपाट मंगलवार को बंद होने के बाद जोशीमठ के लिए निकली आदि शंकराचार्य की गद्दी नरसिंह मंदिर में पहुंच गई है। इस 60 किलोमीटर की यात्रा के दौरान बीते कल गद्दी पांडुकेश्वर में रात्री विश्राम के लिए रुकी थी, जहां से गद्दी आज सुबह ही रवाना हुई और दोपहर में नरसिंह मंदिर में पहुंच गई। मंदिर में पहुंचते ही यहां पर गद्दी का फूलों की वर्षा से स्वागत किया गया। गद्दी यात्रा मार्ग पर भी भक्तों की भारी भीड़ दिखी।

बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल अमरनाथ नंबूदरी की मौजूदगी में धार्मिक अनुष्ठानों के बीच गद्दी को नरसिंह मंदिर के पास स्थित मठ आंगन शंकराचार्य गद्दी स्थल में विराजित किया गया। अब 6 महीने तक इसी मंदिर में भगवान बद्री की शीतकालीन पूजा होगी।

बद्रीनाथ धाम में रावल ही बद्रीनारायण की पूजा करते थे लेकिन नरसिंह मंदिर में स्थानीय पुजारी ही प्रतिदिन पूजा अर्चना करेंगे।

गद्दी के नरसिंह मंदिर पहुंचने के 4 PHOTOS देखें…

अब नरसिंह मंदिर के बारे में जानिए…

सप्त बद्री में से एक है नरसिंह बद्री

चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित नरसिंह मंदिर उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के चौथे अवतार, भगवान नरसिंह को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान नरसिंह ने अपने भक्त प्रह्लाद की हिरण्यकश्यप से रक्षा के लिए उग्र रूप धारण किया। ऐतिहासिक रूप से ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य के शासनकाल में हुई थी। नरसिंह मंदिर सप्त बद्री में से एक है और इसे ‘नरसिंह बद्री’ के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर से जुड़ी है एक पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार, मूर्ति की दाहिनी भुजा समय के साथ क्षीण होती जा रही है। कहा जाता है कि जब यह पूरी तरह टूट जाएगी, तब नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और वर्तमान बद्रीनाथ धाम का मार्ग स्थायी रूप से बंद हो जाएगा। इसके बाद भगवान बद्रीनारायण भविष्य बद्री में दर्शन देंगे।

भगवान बद्री की शीतकालीन गद्दी, नरसिंह मंदिर।

भगवान नरसिंह की चमत्कारी मूर्ति विराजमान

नरसिंह मंदिर हिमालयी शास्त्रीय शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पत्थर और लकड़ी से निर्मित है और क्षेत्र की कठोर सर्दियों और बर्फबारी का सामना कर सकता है। गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन इसके अंदर भगवान नरसिंह की भव्य और चमत्कारी मूर्ति स्थापित है। मंदिर की दीवारें जटिल नक्काशी और पौराणिक कथाओं से सुसज्जित हैं। आसपास का शांत और प्राकृतिक वातावरण आगंतुकों को आध्यात्मिक अनुभव का एहसास कराता है।

शांत रूप में पूजे जाते हैं नरसिंह

मंदिर में स्थापित मूर्ति शालीग्राम पत्थर से बनी 10 इंच ऊंची है। यह पद्मासन मुद्रा में विराजमान है और शांत स्वरूप प्रस्तुत करती है, जो भगवान के उग्र रूप के विपरीत है। मान्यता है कि मूर्ति के दर्शन से दुख, दर्द और शत्रु बाधाओं का नाश होता है। मूर्ति की दाहिनी भुजा से जुड़ी भविष्यवाणी इसे और विशेष बनाती है।

अब जानिए मंदिर तक कैसे पहुंचे…

नरसिंह मंदिर तक पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, और वहां से जोशीमठ लगभग 280 किलोमीटर दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जहां से सड़क मार्ग के जरिए लगभग 8–9 घंटे में मंदिर पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग घुमावदार है, लेकिन दृश्य मनमोहक हैं। सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी है, क्योंकि इस दौरान मंदिर में भगवान बद्रीनाथ की शीतकालीन गद्दी होती है और हिमालय की बर्फ से ढकी सुंदरता का अनुभव मिलता है।

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