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CJI गवई बोले- न्यायिक आतंकवाद से बचें:कोर्ट को नहीं लांघनी चाहिए अपनी सीमाएं; भारतीय संविधान दबे-कुचलों को ऊपर उठाने का काम करता है

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने कहा कि भारत का संविधान सिर्फ अधिकार नहीं देता, बल्कि समाज के पिछड़े और दबे-कुचले वर्गों को ऊपर उठाने का काम भी करता है। उन्होंने यह बात ऑक्सफोर्ड यूनियन में एक प्रोग्राम के दौरान कही।

CJI ने कहा कि देश में ज्यूडिशियल एक्टिविज्म की भूमिका बनी रहेगी, लेकिन इसे इतना नहीं बढ़ाना चाहिए कि यह न्यायिक आतंकवाद का रूप ले ले।

उन्होंने कहा;-

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न्यायिक सक्रियता जरूरी है, लेकिन यह इस हद तक नहीं होनी चाहिए कि यह न्यायिक आतंकवाद का रूप ले ले। कई बार ऐसा होता है कि न्यायपालिका ऐसे क्षेत्रों में घुस जाती है, जहां उसे नहीं जाना चाहिए।

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CJI के संबोधन की 2 बड़ी बातें…

1. न्यायपालिका को मर्यादा में रहकर हस्तक्षेप करना चाहिए CJI गवई ने कहा कि जब विधायिका और कार्यपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल रहती हैं, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। लेकिन इस हस्तक्षेप की सीमा और मर्यादा होनी चाहिए।

2. भारत में कई दशक तक छुआछूत रहा भारत में कई दशक पहले लाखों नागरिकों को अछूत कहा जाता था। उन्हें अशुद्ध बताया जाता था। कहा जाता था कि वे इस जाति के नहीं हैं। उन्हें बताया जाता था कि वे अपनी बात खुद नहीं कह सकते। लेकिन आज हम यहां हैं, जहां उन्हीं लोगों से संबंधित एक व्यक्ति देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर आसीन होकर खुलकर बोल रहा है।

CJI गवई बोले- जज जमीनी हकीकत नजरअंदाज नहीं कर सकते

CJI बीआर गवई ने 17 मई को कहा कि जज जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के सम्मान समारोह में बोल रहे थे। इस दौरान CJI गवई ने सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उनका जवाब देने में जजों की भूमिका पर जोर दिया।

CJI गवई ने कहा कि आज की न्यायपालिका मानवीय अनुभवों की जटिलताओं को नजरअंदाज करते हुए कानूनी मामलों को सख्त काले और सफेद शब्दों में देखने का जोखिम नहीं उठा सकती।

सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका में लोगों से दूरी रखना असरदार नहीं है। उन्होंने इस धारणा को खारिज कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को लोगों से जुड़ने से बचना चाहिए।

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