राजस्थान में भेड़-बकरियों की तरह मां-बाप बेच रहे बच्चे:मासूमों का सौदा करने वाले दलाल भास्कर के कैमरे पर एक्सपोज, पार्ट-1
जयपुर3 घंटे पहलेलेखक: विक्रम सिंह सोलंकी और रणवीर चौधरी
‘मुझे 500 भेड़-बकरियों के बाड़े में रातभर बंधक बनाकर रखते थे… दिन में 25-30 किलोमीटर पैदल चलाते थे…भागने की कोशिश करता तो गर्म सरिए से शरीर दाग देते…पैर इतने टेढ़े हो गए कि चल भी नहीं पाता था।’
इतना टॉर्चर सहने वाले 8 साल के गणेश को उसके शराबी पिता ने महज 18 हजार रुपए सालाना लेकर दलालों के हवाले कर दिया था। ये दर्द अकेले गणेश का नहीं बल्कि राजस्थान के उदयपुर, सिरोही, बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों के सैकड़ों गांवों के हजारों बच्चों का है। गांवों में बैठे दलाल गुजरात के फाइव स्टार होटलों, फैक्ट्रियों, फार्महाउस में नौकरी के नाम पर बच्चों की सौदेबाजी कर रहे हैं।
बिकने के बाद इन मासूमों से फैक्ट्री-खेतों में बंधक की तरह काम कराया जा रहा है। कई बच्चे जिंदगीभर लौट नहीं पाते। कुछ लौटते हैं, लेकिन दिव्यांग बनकर। कई मासूम बच्चियों को दरिंदगी का शिकार होना पड़ता है।
बच्चों की खरीद-फरोख्त का सच सामने लाने के लिए भास्कर रिपोर्टर उन गांवों में फैक्ट्री मालिक बनकर पहुंचे। ऐसे 4 दलालों को कैमरे पर बेनकाब किया, जो कमीशन के लालच में मासूमों की जिंदगी नर्क बना रहे हैं।
स्पेशल सीरीज के पहले एपिसोड में देखिए मासूम बच्चों की सौदेबाजी का पूरा सच…
खुलासे के लिए भा ऐप के रिपोर्टर ने फैक्ट्री मालिक बनकर उदयपुर और सिरोही जिले के कई गांवों में पड़ताल की। इस दौरान 4 एजेंटों से मुलाकात हुई। किसी को गुजरात में टेक्सटाइल फैक्ट्री तो किसी को होटल का मालिक बताया। एजेंट के सामने 7 से 15 साल के 15 से 20 बच्चे लीज पर खरीदने का ऑफर रखा। 5-6 लड़कियां खरीदने की भी बात की।
1. एजेंट मोतीलाल : बोला- एक साथ 500 बच्चों का सौदा करवा चुका हूं
उदयपुर के कोटड़ा और झाड़ोल के कई गांवों में गए। कई दिन पड़ताल के बाद एजेंट मोतीलाल से मोबाइल नंबरों (8003XXX433) पर बात हुई। लोकल भाषा में यहां एजेंट को ‘मेट’ बोलते हैं। मोतीलाल ने फोन पर बात होने के बाद उदयपुर से 80 किलोमीटर दूर दमाणा गांव में पहाड़ी पर बने अपने घर बुलाया।
एजेंट मोतीलाल से हिडन कैमरे में हुई बातचीत के कुछ अंश…
एजेंट : कहां से आए हो?
रिपोर्टर : सूरत से…वहां टेक्सटाइल फैक्ट्री है। 20-25 बच्चे चाहिए। सारे 15 साल से छोटे होने चाहिए।
एजेंट : मिल जाएंगे, कोई दिक्कत नहीं है।
रिपोर्टर : पहले हम बच्चे देखेंगे। सही लगा तो दो साल के लिए लीज पर लेंगे। क्या रेट और कमीशन रहेगा?
एजेंट : एक बच्चे के महीने के 11 हजार या साल के सवा लाख पड़ेंगे। हजार रुपए मेरा कमीशन (प्रतिमाह) रहेगा हर बच्चे पर।
रिपोर्टर : आप काम तो करवा पाएंगे?
एजेंट : टेंशन मत लो…मैंने पहले 500 बच्चों को 4 महीने के लिए गुजरात के पाटन भिजवाया था। कपास की तुड़ाई करवानी थी। उनकी मजदूरी में मेरा 30 रुपए प्रति बच्चा प्रतिदिन का कमीशन था। हम चार से पांच एजेंट ने मिलकर एक दिन में 500 बच्चों का इंतजाम कर दिया था। आपका काम तो मैं जल्दी करवा दूंगा।
(भरोसा दिलाने के लिए एजेंट ने फोन कर दो बच्चों को बुलाया)
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एजेंट मोतीलाल ने भास्कर रिपोर्टर को दो बच्चों (गाइडलाइन के अनुसार चेहरा छुपाया जा रहा है) से मिलवाया। दोनों की उम्र 10-12 साल के करीब थी।
एजेंट : देख लो, ये 8 से 10 साल उम्र के 2 बच्चे हैं। गुजरात चल लेंगे। चाहो तो सामने ही बात कर लो।
रिपोर्टर : हां, इसी उम्र के बच्चे दिखा दो। फिर डील फाइनल करेंगे।
एजेंट : पहले 8-10 बच्चे दिखा देता ह रणवीर चौधरी (चेक शर्ट में), मासूम बच्चा (बीच में) और एजेंट मोतीलाल।
आखिर बच्चों को दलाल क्या लालच देते हैं? किस मजबूरी का फायदा उठाते हैं? इन सवालों के जवाब जानना जरूरी था।
ऐसे में हमने एजेंट के सामने शर्त रखी कि पहले सभी बच्चों को देखेंगे, फिर ही डील करेंगे। डील कैंसिल होने के डर से दलाल हमें बच्चों के घरों तक ले जाने के लिए तैयार हो गया।
एजेंट हमें पहाड़ी रास्तों से कई किलोमीटर पैदल ही एक कच्चे मकान में ले गया। घर में मौजूद एक महिला से लोकल भाषा में परिचय करवाया। फिर बताया कि इनके घर में कमाने वाला कोई नहीं है। महिला के 4 बेटी हैं। एक की शादी हो चुकी है। तीन बेटियों में से एक बीमार है।
दो बेटियां गुजरात जाने को तैयार हैं। एक की उम्र 10 और दूसरी की 12 साल है। दोनों ने एजेंट के कहने पर हमारे सामने ही हामी भर दी। मां ने पैसों की जरूरत के चलते यह तक नहीं जानना च
एजेंट मोतीराम ने हमें दोनों बच्चियों की उम्र 10 से 12 साल के बीच बताई।
14 साल के बीमार बच्चे ने कहा- मैं ठीक होते ही चल लूंगा
इसके बाद एजेंट पास ही में दूसरी पहाड़ी पर ले गया। वहां कई कच्चे मकान थे। एक झोपड़ी में लेटे 14 साल के बच्चे से एजेंट ने बात की। कहा- ‘2 साल के लिए गुजरात लेकर जाएंगे, तुम तैयार हो क्या?’ बिना समय गंवाए उसने हां कर दी।
हमने पूछा- पहले कभी गए हो क्या? तब उसने बताया कि 8 साल की उम्र में अहमदाबाद गया था। वहां सरिए उठवाते थे। ज्यादा वजन उठाने के कारण बीमार पड़ने लगा तो मालिकों ने निकाल दिया। अभी तक ठीक नहीं हो पाया।पीलिया के कारण मा
एजेंट मोतीलाल ने झोपड़ी में लेटे एक नाबालिग बच्चे से मिलवाया। इस बच्चे की उम्र करीब 8 साल है।
एजेंट बोला- मैं ही इनका मालिक
एजेंट मोतीलाल हमें एक और मकान में लेकर गया। इस दौरान उसने बताया कि यहां लोग बच्चों को स्कूल के बजाय पैसा कमाने गुजरात भेज देते हैं। मकान में 7 साल के बच्चे की ओर इशारा करते हुए बोला- इसके दोनों बड़े भाई भी गुजरात हैं। ये भी चला जाएगा। देख लो, बाकी बच्चे भी इसी उम्र के उपलब्ध करवा दूंगा। हमने एजेंट से कहा- एक बार इनके मां-बाप से बात कर लेते हैं। इस पर एजेंट बोला- यहां सारे बच्चे मेरे ही भरोसे हैं। मैं जो कहूंगा, बच्चे वही करेंगे।
पुलिस की टेंशन मत लो, मैं यहां का नेता हूं : एजेंट मोतीलाल
मोतीलाल से पूछा कि बच्चों को गुजरात कैसे लाओगे? इस पर उसने कहा- पुलिस की टेंशन मत लो। मैं बच्चों को आपकी बताई लोकेशन पर छोड़ जाऊंगा। यहां कोई समस्या होती है तो समझौते के लिए मुझे ही थाने बुलाते हैं। मैं यहां का नेता हूं। वैसे भी यहां पुलिस ज्यादा नहीं आती है। लोग पुलिस पर हमला कर देते हैं।
एजेंट मोतीलाल बोला- फैक्ट्री तक सभी बच्चों को भिजवाने की जिम्मेदारी मेरी है। बच्चों को लीज की डील के अनुसार रखना होगा। महीना होते ही बच्चों की मजदूरी लेने मैं खुद गुजरात आऊंगा। सारा पैसा कैश में लूंगा। बाद में अपने हिसाब से उनके घरवालों को पैसा देता रहूंगा।
2. एजेंट बंशीलाल : बोला- हर बच्चे पर 500 रुपए मेरा कमीशन
पड़ताल के दौरान ही एक और एजेंट बंशीलाल का पता चला। एजेंट बंशीलाल से फोन नंबर 982XXX485 पर बात की। उसने उदयपुर के इंडस्ट्रियल एरिया सुखेर में फैक्ट्री के पास बुलाया। वह यहां इवेंट में खाना बनाने वाली फैक्ट्री में काम करता है। लेबर का ठेकेदार है।
एजेंट बंशीलाल से हिडन कैमरे में रिकॉर्ड हुई बातचीत के अंश…
रिपोर्टर : सूरत से आए हैं। लीज पर 15 से 20 बच्चे चाहिए।
एजेंट : पहले बताओ पैसे कितने दोगे?
रिपोर्टर : रेट बताओ, उस हिसाब से तय कर लेंगे।
एजेंट : एक बच्चे के महीने के 10 से 12 हजार लगेंगे। बच्चे तो 15 से 20 अरेंज कर दूंगा। यहां फैक्ट्री में कुछ बच्चे
फैक्ट्री के बाहर दलाल से बातचीत करते हुए।
रिपोर्टर : एक बच्चे पर 2 साल लीज के लिए कितना पैसा देना होगा और तुम्हारा कमीशन?
एजेंट : एक लड़के या लड़की के हर महीने 12 हजार रुपए देने होंगे। मेरा हर बच्चे पर 500 रुपए कमीशन रहेगा।
(हमने सौदा असली दिखाने के लिए एजेंट से थोड़ा पैसा कम करने को कहा)
एजेंट : आप तो प्रति बच्चा 12 हजार दे देना। उसी में मेरा कमीशन हो जाएगा।
फैक्ट्री के बाहर 15 साल के दो बच्चे दिखाए
एजेंट बंशीलाल हमें फैक्ट्री के बाहर ले गया, जहां वो खुद काम करता है। उसने फैक्ट्री के अंदर से तीन बच्चे बुलाए। उनमें से दो बच्चे 15 साल और एक 18 साल का था। और, बच्चे दिखाने को कहा तो बोला- मेरे गांव चले जाओ। वहां मेरा भाई आपको 10 से 12 साल के 15-20 बच्चे दिखा देगा। आपको पसंद आ जाए तो मुझे बता देना। इसके बाद आगे की डील कर लेंगे।
3. एजेंट अर्जुनराम : बोला- पहले भी कई बार सप्लाई कर चुका हूं
सिरोही और आबूरोड में भास्कर रिपोर्टर एक हफ्ते तक मांकरोड़ा, ईसरा, मांडवाड़ा खालसा, नितोड़ा, भावरी और स्वरूपगंज के आस-पास के गांवों में घूमे। यहां एजेंट के सक्रिय होने की पुख्ता सूचना थी। केर गांव में दाखिल हुए तो 17-18 साल के बच्चे ने एजेंट अर्जुनराम के बारे में बताया। थोड़ी देर में अर्जुनराम खुद वहां पहुंच गया। उसने बताया कि वो गुजरात के अंकलेश्वर में काम करता है। कई बच्चे सप्लाई कर चुका है।
रिपोर्टर : 15 से 20 बच्चे चाहिए फैक्ट्री के लिए। उम्र ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
एजेंट : 10 साल के बच्चे 7 हजार महीने के रेट में मिल जाएंगे। 15 साल वाले 8 हजार महीने में मिलेंगे।
रिपोर्टर : बच्चे दिखाओ, फिर ही डील करेंगे।
(एजेंट कुछ देर इंतजार के बाद वो 6-7 बच्चे लाया। इनकी उम्र 8-10 साल थी। अर्जुनराम के इशारा करने पर सारे बच्चे चलने को तैयार हो गए।)
(दलाल अर्जुनराम ने हमें और बच्चे दिखाने के लिए दूसरे गांव भेजा। बताया कि केर से करीब 5 किलोमीटर आगे सड़क किनारे एक ढाबे के पास कुछ बच्चे बैठे मिल जाएंगे। मैं फोन कर देता हूं उन्हें।)
होटल मालिक ने मारपीट की तो लौटे
दलाल के बताए पते पर हम वहां पहुंचे। कई बच्चे वहां बैठे हुए थे। 8 साल के एक बच्चे ने बताया- माता-पिता की कुछ साल पहले मौत हो गई थी। अब मैं और मेरा भाई काम करके ही गुजारा कर रहे हैं। दोनों दलालों के भरोसे हैं। दलाल के कहने पर करीब दो साल पहले गुजरात में एक होटल पर काम करने गए थे। वहां होटल मालिक की मारपीट से परेशान होकर लौट आए।
हमने बच्चे को बताया कि गुजरात के पालनपुर में फैक्ट्री में दो साल तक काम करने के लिए ले जाना है, तो उसने पूछा- पैसे कितने मिलेंगे? ज्यादा पैसे मिलने की बात सुनते ही चलने के लिए तैयार हो गया। अपने बड़े भाई को बुलाकर लाया। वह बच्चा भी जाने को तैयार था।
यह जगह केर गांव से करीब 5 किलोमीटर आगे सिरोही की ओर जाने वाली सड़क पर है। एजेंट अर्जुनराम के बताए अनुसार इस ठिकाने पर हमारी मुलाकात 4-5 बच्चों से हुई।
4. एजेंट आकाश : बोला- अर्जुनराम फर्जी है, मैं असली हूं, मुझसे डील करोगे तो मैं ज्यादा बच्चे अरेंज कर दूंगा
केर गांव में दलाल अर्जुनराम ने जब हमें बच्चे दिखाए तो उसी समय गांव के चौक के पास एक और दलाल आकाश खुद हमारे पास आया। उसने इशारा करके हमें साइड में चलकर बात करने के लिए कहा।
दलाल आकाश : कहां से आए हो?
रिपोर्टर : हम सूरत से आए हैं। फैक्ट्री मालिक हैं। लीज पर 10 से 15 बच्चे खरीदने हैं।
एजेंट आकाश : आप लोग एजेंट अर्जुन से मिलकर आए हो, वो फर्जी है, मेरे से डील करो…वो बच्चों की व्यवस्था नहीं कर पाएगा।
रिपोर्टर : तुम कर पाओगे, क्या कमीशन लोगे?
एजेंट आकाश : अर्जुन कम रेट में ज्यादा छोटी उम्र के बच्चे लेकर आ जाएगा। मैं 15 बच्चों की व्यवस्था कर दूंगा। प्रति बच्चा कमीशन 2 हजार रुपए लूंगा।
(दलाल हमें अपने घर लेकर गया और वहां कुछ बच्चों से मिलवाया। उन बच्चों की उम्र महज 10 से 12 साल थी।)
रेस्क्यू करने वाले ‘मास्टर’ ने बताई हकीकत
खबर की शुरुआत में आपने जिस गणेश (8) की दर्दनाक कहानी पढ़ी, उसे रेस्क्यू करने वाले सरकारी टीचर दुर्गाराम चौधरी ने बताया कि बच्चे के पिता को शराब की लत थी। इसी कारण से पत्नी छोड़कर चली गई। शराबी पिता ने गणेश और उसके बड़े भाई रमेश, दोनों को पाली जिले के वालाली निवासी भगाराम को 1500 रुपए महीना (सालाना 18 हजार रुपए) लीज पर बेच दिया। भगाराम ने तीन साल के रुपए एडवांस दिए और दोनों बच्चों को अपने साथ ले गया था।
भगाराम ने वादा किया था कि वो बच्चों से केवल घर का काम करवाएगा। उन्हें स्कूल भी भेजेगा। लेकिन उसने बड़े बेटे रमेश (10) को अपने जीजा को आगे बेच दिया। गणेश को अपनी 500 भेड़-बकरियों को चराने का जिम्मा सौंप दिया। काम नहीं करने पर उसके साथ मारपीट करता। खाने में उसे हरी मिर्च, प्याज और सूखी रोटी देत को बताया कि उसे भेड़-बकरियों को लेकर 25-30 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। इससे दोनों पैर टेढ़े हो गए। आज भी चलने में दिक्कत आती है। एक बार भागने की कोशिश की तो भगाराम ने पहले पीटा, फिर लोहे के गर्म सरिये से पैर और गले पर दाग दिया। एक सप्ताह तक हर रात हाथ-पैर बांधकर भेड़-बकरियों के पास रखा।
पिछले साल जुलाई में कोटड़ा में काम करने वाली आशा सहयोगिनी लीला को इसकी भनक लगी तो उन्होंने रेस्क्यू टीम को बताया। इसके बाद गणेश को रेस्क्यू करवाया गया। फिर गणेश के बड़े भाई रमेश को भी पाली के एक गांव से आजाद करवाया।
गणेश को रेस्क्यू करने गई टीम ने पाया कि जबरन 25-30 किलोमीटर पैदल चलाने से उसके घुटने अंदर की तरफ मुड़ गए थे। पैरों के पंजे भी टेढ़े हो गए थे।
एजेंट बच्चों को फाइव स्टार होटल में काम दिलाने का सपना दिखाकर बेचते हैं
दुर्गाराम चौधरी बताया कि एजेंट बच्चों को फाइव स्टार होटल में काम करने, हर महीने अच्छी सैलरी और लजीज खाना खिलाने का झांसा देते हैं। दो वक्त की रोटी को तरसते ये बच्चे अच्छे खाने के लालच में आ जाते हैं। वहां जाने के बाद अधिकतर बच्चे वापस घरवालों से बात तक नहीं कर पाते हैं। उन्होंने बताया कि जब रेस्क्यू किए गए सैकड़ों बच्चों की काउंसलिंग की गई तो कई डरावनी बातें सामने आईं।
फैक्ट्रियों में बंधक बनाकर 12-12 घंटे करवाते हैं काम
गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा, भरूच, अंकलेश्वर में सबसे ज्यादा केमिकल इंडस्ट्री हैं। वहां काम करने के लिए राजस्थान के आदिवासी इलाकों से बच्चों को दो से तीन साल के लीज पर ले जाया जाता है।
लीज पर सौदा होने के बाद उन बच्चों को गुलामों की तरह वहां रखा जाता है। फैक्ट्री से बाहर ही नहीं आने दिया जाता। कई जगह बच्चों को एक समय का खाना मिलता है।
कई बच्चे तो अपनी याददाश्त तक खो देते हैं। महीनों तक बच्चे एक ही ड्रेस में काम करते हैं।
चूड़ी-नगीने के काम में सबसे ज्यादा बच्चों का इस्तेमाल होता है। बंद कमरों में बच्चों को बंधक बनाकर 12 से 18 घंटे चूड़ियां बनवाते हैं। चूड़ियां बनाते समय निकलने वाले धुएं से टीबी और नगीने लगाने काम से आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है।
गुजरात में कपास, चीकू, तंबाकू और अनार जैसी फसलों की बुवाई-तुड़ाई के लिए सस्ते मजदूर के तौर सबसे ज्यादा बच्चे राजस्थान से गुजरात भेजे जाते हैं। खासतौर से बच्चियों को ऐसे खेतों-फार्महाउस के मालिकों लीज पर बेचा जाता है। जहां उनके साथ दरिंदगी होती है।
इस तरह से जीपों में लादकर बच्चों को गुजरात भेजा जाता है। यह फुटेज हमें रेस्क्यू करने वाले दुर्गाराम चौधरी ने उपलब्ध करवाए हैं।
इस तरह से जीपों में लादकर बच्चों को गुजरात भेजा जाता है। यह फुटेज हमें रेस्क्यू करने वाले दुर्गाराम चौधरी ने उपलब्ध करवाए हैं।
जीपों में लादकर रात के अंधेरे में बच्चों की तस्करी
दुर्गाराम चौधरी ने बताया कि गुजरात के बॉर्डर से सटे गांवों में सक्रिय एजेंट डील होने के बाद खुद बच्चों को वहां पहुंचाते हैं। एजेंट बच्चों को जीपों में भरकर रात के अंधेरे में गांवों से होते हुए बॉर्डर पार करवाते हैं। गुजरात में फसल की बुवाई और कटाई के समय तो हर दिन कई जीप रोज जाती हैं।
