मद्रास हाईकोर्ट ने ईशा फाउंडेशन के फाउंडर और आध्यात्मिक गुरु सद्गुरू जग्गी वासुदेव से पूछा कि जब उन्होंने अपनी बेटी की शादी कर दी है, तो दूसरों की बेटियों को सिर मुंडवाने और सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यासियों की तरह रहने के लिए क्यों प्रोत्साहित कर रहे हैं।
दरअसल, कोयंबटूर में तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर एस कामराज ने ईशा फाउंडेशन के खिलाफ याचिका लगाई है। उनका आरोप है कि उनकी दो बेटियों- गीता कामराज उर्फ मां माथी (42 साल) और लता कामराज उर्फ मां मायू (39 साल) को ईशा योग सेंटर में कैद में रखा गया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईशा फाउंडेशन ने उनकी बेटियों का ब्रेनवॉश किया, जिसके कारण वे संन्यासी बन गईं। उनकी बेटियों को कुछ खाना और दवा दी जा रही है, जिससे उनकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो गई है।
जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस वी शिवगणनम की बेंच ने पुलिस को मामले की जांच करने और ईशा फाउंडेशन से जुड़े सभी मामलों की एक लिस्ट संकलित करने का निर्देश दिया है।
ईशा फाउंडेशन के खिलाफ आरोप का पूरा मामला पढ़िए…
पिता बोले- बेटियां मिलने से भी इनकार कर रहीं, जिंदगी नर्क बन गई है एस कामराज ने हाईकोर्ट में अपनी याचिका में बताया कि उनकी बड़ी बेटी गीता यूके के एक यूनिवर्सिटी से एम.टेक ग्रेजुएट है। उसे 2004 में उसी यूनिवर्सिटी में लगभग ₹1 लाख के वेतन पर नौकरी मिली थी। उसने 2008 में अपने तलाक के बाद ईशा फाउंडेशन में योग क्लासेज में भाग लेना शुरू किया।
जल्द ही गीता की छोटी बहन लता भी उसके साथ ईशा फाउंडेशन में रहने लगी। दोनों बहनों ने अपना नाम बदल लिया और अब माता-पिता से मिलने से भी इनकार कर रही हैं। माता-पिता ने दावा किया कि जब से बेटियों उन्हें छोड़ा है, उनका जीवन नर्क बन गया है। कामराज ने अपनी बेटियों को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश करने की मांग की थी।
बेटियां बोलीं- हम अपनी मर्जी से फाउंडेशन में रह रहे
सोमवार, 30 सितंबर को दोनों युवतियां कोर्ट में पेश हुईं। दोनों ने कहा कि वे अपनी मर्जी से ईशा फाउंडेशन में रह रही हैं। उन्हें कैद में नहीं रखा गया है। ईशा फाउंडेशन ने भी दावा किया कि महिलाएं स्वेच्छा से उनके साथ रही हैं।
फाउंडेशन ने कहा कि वयस्क व्यक्तियों को अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता और ज्ञान है। हम शादी या संन्यासी बनने पर जोर नहीं देते हैं, क्योंकि ये लोगों का व्यक्तिगत मामला है। ईशा योग सेंटर में ऐसे हजारों लोग आते हैं, जो संन्यासी नहीं हैं। साथ ही कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने ब्रह्मचर्य या संन्यासी बनना स्वीकार कर लिया है।
फाउंडेशन ने तर्क दिया कि अदालत मामले का दायरा नहीं बढ़ा सकती। हालांकि, अदालत ने मामले की जांच करने का फैसला किया क्योंकि जस्टिस ने मामले के बारे में कुछ संदेह उठाए।
हाईकोर्ट बोला- अदालत किसी के पक्ष या खिलाफ में नहीं द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस सुब्रमण्यम ने ईशा फाउंडेशन से कहा कि आप नहीं समझेंगे क्योंकि आप एक खास पार्टी के लिए पेश हो रहे हैं। यह अदालत न तो किसी के पक्ष में है और न ही किसी के खिलाफ है। हम केवल याचिकाकर्ता के साथ न्याय करना चाहते हैं।
