कसाई की टिप पर मारा गया बुरहान वानी:वाजपेयी लाहौर में थे और पाक सेना कारगिल में; मोदी सरकार में कितना बदला कश्मीर
श्रीनगर से करीब 50 किमी दूर त्राल कस्बे से सटा एक गांव है शरीफाबाद। यहीं का 22 साल का हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी कश्मीर में पोस्टर बॉय बन चुका था। बुरहान ने बंदूक के साथ ग्लैमर को जोड़ा। उसके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते थे। उसने दर्जनों युवाओं को हिज्बुल में रिक्रूट किया। सेना उसे बुरी तरह खोज रही थी।
7 जुलाई 2016 की शाम आर्मी कैंप में खबर आई कि बुरहान कोकरनाग के पास बमडूरा गांव के एक मकान में हो सकता है। एक लोकल मुखबिर को पास के कसाई ने बताया कि उस मकान में ‘दावत’ के लिए यहीं से ढेर सारा मीट गया है। घर के मालिक ने भी एक रिश्तेदार से फोन पर कहा कि ‘मुसीबत’ आई हुई है।
पूरी तरह से कन्फर्म होने के बाद आर्मी ने 100 जवानों और पुलिस SOG के 35-36 जवानों के साथ मिलकर कोकरनाग इलाके में डबल लेयर का घेरा डाल लिया। बुरहान वानी के साथ आतंकी सरताज और परवेज भी थे। उन्होंने तय किया कि वो घेरा तोड़कर भागने का चांस लेंगे, क्योंकि घर पर ब्लास्ट किया जा सकता है।
सरताज और बुरहान तेजी से आगे बढ़े और अंधाधुंध फायरिंग करने लगे। जवाबी फायरिंग में सबसे पहले बुरहान को गोली लगी। कुछ ही समय में सरताज और परवेज भी मारे गए। महज 15 मिनट में ऑपरेशन पूरा हो गया। बुरहान के एनकाउंटर ने कश्मीर की आग को फिर कुरेद दिया।
‘कश्मीर की कहानी’ सीरीज के पांचवे और आखिरी एपिसोड में वाजपेयी से लेकर मोदी तक; कश्मीर में हुई बड़ी हलचल के किस्से और आगे का रास्ता…
भारत ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। इसके बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किया। अब भारत-पाक दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्र थे। हम मित्र बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं, इस विचारधारा को मानने वाले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कश्मीर का समाधान और पाकिस्तान से शांति वार्ता चाहते थे।
चार महीने बाद ही सितंबर में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ यूनाइटेड नेशन्स की बैठक के लिए न्यूयॉर्क पहुंचे। यहां दोनों एक मेज पर थे। यहीं पर लाहौर बस यात्रा की बुनियाद पड़ी। वाजपेयी 19 फरवरी 1999 बस से लाहौर गए थे। यह दिल्ली-लाहौर की पहली यात्रा थी। यहां कश्मीर और दोनों देशों में शांति के लिए मशहूर लाहौर समझौता हुआ।
नवाज बोले कागजों से कश्मीर नहीं मिलेगा, हमें कब्जा करना होगा इसके तीन महीने बाद ही 17 मई 1999 को इस्लामाबाद से कुछ मील की दूरी पर इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के ओझरी कैंप ऑफिस में एक प्लान की प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश की गई। मीटिंग में चीफ ऑफ जनरल स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान ने प्रधानमंत्री से कहा कि ‘सर, आप इतिहास में कश्मीर के मुक्तिदाता कहलाएंगे।’
दरअसल, ये प्लान कारिगल में घुसपैठ करके कश्मीर पर कब्जे का था।
विदेश मंत्री सरताज अजीज ने PM से कहा कि ये लाहौर समझौते का उल्लंघन है। तब नवाज शरीफ ने कहा कि हम कागजों से कभी कश्मीर नहीं पा सकते, हमें ये करना होगा। ये वो ही नवाज शरीफ थे, जिन्होंने तीन महीने पहले ही भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ शांति के लिए दिल्ली-लाहौर बस शुरू की थी। एक तरफ नवाज दोस्ती के लिए गले मिल रहे थे और दूसरी तरफ उसी दोस्त की पीठ पर ‘फतह-ए-कश्मीर’ का खिताब पाने के लिए छुरा घोंप रहे थे।
8 मई 1999 को कारगिल की आजम चौकी पर पाकिस्तान के करीब 12 जवानों ने कब्जा कर लिया था। इसके बाद वो आगे बढ़ते ही रहे। भारत के सैनिकों ने जांबाजी से लड़ा और 26 जुलाई 1999 तक भारत में घुस आए पाक सैनिक मारे गए या तो भाग खड़े हुए। युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई थी।
पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर दिया। पाकिस्तान अलग-थलग पड़ा था। ऐसे में एक दिन भारत की तरफ से मुशर्रफ को शांति वार्ता का प्रस्ताव आया। मुशर्रफ अपनी छवि सुधारना चाहते थे। उन्होंने तुरंत इसे लपक लिया। इस तरह 14 से 16 जुलाई 2001 तक आगरा में शिखर सम्मेलन की शुरुआत हुई।
मुशर्रफ छवि बदलने आए थे, लेकिन कश्मीर को लेकर अपना अड़ियल रुख नहीं बदल पाए। बात कश्मीर को लेकर ही बिगड़ी।
भारत में पाकिस्तान के राजदूत रहे अजय बिसारिया अपनी किताब “एंगर मैनेजमेंट: द ट्रबल्ड डिप्लोमेटिक रिलेशनशिप बिटविन इंडिया एंड पाकिस्तान’ में लिखते हैं कि शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन मुशर्रफ ने नाश्ते पर देश के प्रमुख समाचार पत्रों और टीवी नेटवर्क के संपादकों के साथ मुलाकात की। उन्होंने कहा कि कश्मीर में जिन लोगों ने हथियार उठाए हैं वो आतंकी नहीं फ्रीडम फाइटर हैं। उन्होंने कहा कि कश्मीर में आतंकवाद के कारण जो हिंसा हो रही है वो वहां के लोगों की आजादी के लिए लड़ाई है। ये सब लाइव चल रहा था।
‘जनरल साहब आपका व्यवहार ठीक नहीं है’ वाजपेयी मुशर्रफ की आवभगत दोस्त की तरह कर रहे थे। वाजपेयी को पता ही नहीं था कि मीटिंग रूम के बाहर मुशर्रफ क्या एजेंडा चला रहे हैं। बिसारिया लिखते हैं कि ‘मुशर्रफ और वाजपेयी बात कर थे। तभी मैंने एक कागज उन्हों सौंप दिया और कहा कि कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। मेरे कमरे से बाहर जाने के बाद वाजपेयी ने उस कागज को देखा और फिर उसे मुशर्रफ को पढ़कर सुनाया।’
वाजयेपी ने खीझते हुए कहा कि जनरल साहब आपके व्यवहार से शांति वार्ता में कोई मदद नहीं मिल रही है। भारत ने भी कहा कि कश्मीर मसले पर कोई समझौता नहीं करेगा। मुशर्रफ समझ गए कि बात नहीं बनेगी। इसके बाद वे आगरा शिखर सम्मेलन काे अधूरा छोड़कर पाकिस्तान चले गए। वाजपेयी के दौर में कश्मीर सामान्य हो रहा था।
BJP सरकार के बाद दस साल तक UPA सरकार रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कश्मीर को लेकर वाजपेयी जैसे कोई ठोस कदम शांति वार्ता के लिए नहीं उठाए गए। 2014 में नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने एक बड़ा कदम उठाया।
वे 25 दिसंबर 2015 अफगानिस्तान के दौरे पर थे। उन्हें तय कार्यक्रम के मुताबिक काबुल से सीधे दिल्ली लैंड करना था। दोपहर ठीक 1:31 बजे मोदी ने ट्वीट किया कि मैं लाहौर में पाकिस्तान के PM नवाज शरीफ से मिलने वाला हूं। इस खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। 11 साल बाद भारत का कोई PM पाकिस्तान जा रहा था।
शाम 4 बजकर 52 मिनट पर इंडियन एयरफोर्स का विमान लाहौर एयरपोर्ट पर उतरा। पहले से मौजूद पाकिस्तान के PM नवाज शरीफ ने मोदी को गले लगाया और कहा- ‘आखिरकार आप आ ही गए।’
कुछ ही कदमों की दूरी पर पाकिस्तानी सेना का एक हेलिकॉप्टर खड़ा था। मोदी उसी हेलिकॉप्टर में बैठे। उनके साथ नवाज शरीफ, अजित डोभाल और एस जयशंकर भी थे। इससे पहले भारत का कोई प्रधानमंत्री, पाकिस्तानी सेना के हेलिकॉप्टर में नहीं बैठा था।
मोदी नवाज के घर रायविंड पहुंचे, जहां उनकी पोती की शादी थी। मोदी ने नवाज की पोती को आशीर्वाद दिया। नवाज की मां के चरण छुए। शाम 6:30 बजे मोदी ने शरीफ और उनके परिवार को अलविदा कहा और हेलिकॉप्टर से वापस हवाई अड्डे पहुंचे। 7:30 बजे विमान लाहौर से भारत के लिए रवाना हुआ और सकुशल मोदी पहुंच गए।
भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में सुधार में मोदी का यह बड़ा कदम माना गया, लेकिन जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर आतंकवादी हमला हुआ। इससे भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत फिर रुक गई।
कश्मीर में BJP और PDP की गठबंधन सरकार बनी, लेकिन प्रयोग फेल रहा 2015 में ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए। कुल 87 सीटों में से PDP को 28, BJP को 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिलीं। किसी के पास बहुमत नहीं था। ऐसे में BJP ने पहल की। कश्मीर में शांति और राज्य को स्थिर सरकार देने के लिए BJP ने PDP के साथ गठबंधन किया। मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बनाए थे और डिप्टी CM BJP के निर्मल सिंह को मिला। 7 जनवरी 2016 सईद के निधन के बाद महबूबा मुफ्ती CM बनीं।
महबूबा का फोकस कश्मीर पर था और भाजपा चाहती थी कि जम्मू पर भी ध्यान दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था। CM BJP को कॉन्फिडेंस में लिए बिना पत्थरबाजों को रिहा करने, बक्करवालों को सरकारी जमीन से विस्थापित न करने और धार्मिक संगठनों को वित्तीय सहायता दे रही थीं। आतंकी घटनाएं रुक नहीं रही थीं। इससे BJP को लगने लगा कि उसका नाम खराब हो रहा है।
कठुआ में आठ साल की बच्ची की रेप और हत्या के बाद जम्मू में BJP की जमीन हिलने लगी थी। अगले ही साल 2019 में लोकसभा चुनाव थे। BJP का कश्मीर में प्रयोग विफल रहा और उसने जून 2018 में समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई। कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।
देश में लोकसभा चुनाव का माहौल बना हुआ था। दुनियाभर में वेलेंटाइन डे की धूम थी। उस दिन पुलवामा के लेथपोरा में CRPF जवानों के काफिले पर आतंकी हमला हुआ, जिसमें 40 जवान मारे गए। जम्मू-कश्मीर में तब तैनात रहे IPS ऑफिसर दानेशा राणा अपनी किताब ‘एज फॉर एज द सैफरन फील्ड द पुलवामा कॉन्सपिरेंसी’ में लिखते हैं कि यूनिट को केवल 10 किलोमीटर 262 से 272 मील के तक के पत्थरों की दूरी तय करनी थी। दोपहर पौने दो बजे बजे विस्फोटक से लदी कार ईको कार को लेकर आतंकी आदिल और शाकिर रवाना हुए।’
कार आदिल चला रहा था। वे तीन बजकर दस मिनट पर हाईवे पहुंच गए। थोड़ी देर में उन्हें एक लाल झंडे वाला वाहन नजर आया। वे समझ गए कि काफिला आने वाला है। आदिल ने अपनी कैसियो डिजिटल घड़ी निकाली और शाकिर को दे दी। उसने कहा कि उम्मीद है, यह घड़ी मेरी आखिरी याद होगी। घड़ी में समय दोपहर 3 बजे दिखा रहा था। शाकिर ने घड़ी ली। आदिल को अंतिम विदाई दी और कार से बाहर आ गया। वह बंजर केसर के खेत से होते हुए अपने घर की ओर तेजी से चलने लगा। दोपहर तीन बजकर पांच मिनट पर आदिल ने ईको कार की चाबी घुमाई। धीरे-धीरे हाईवे की तरफ चलने लगा।
आदिल ने देखा कि कई CRPF के जवान खिड़कियों से बाहर झांक रहे हैं। हाईवे की सुरक्षा करने वाले ASI मोहनलाल कार काे रोकने के लिए पीछा कर रहे थे। इससे पहले कि कोई पूरी तरह से समझ पाता आदिल ने अपनी आंखें बंद कर लीं और ट्रिगर दबा दिया। काले धुएं के बादल के बीच एक बड़ी आग की गेंद उठी। ASI मोहन लाल भी वहीं शहीद हो गए। धमाका 10 किलोमीटर दूर तक सुना जा सकता था। इस हमले में CRPF के 40 जवान शहीद हुए। शाम 4.03 बजे, श्रीनगर के मीडिया हाउस ग्लोबल न्यूज सर्विस के संपादक को जैश के पाकिस्तान स्थित प्रवक्ता मोहम्मद हुसैन का एक व्हाट्सएप मैसेज मिला। उसमें जिसमें लेथपोरा में आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली गई थी। जब मैसेज को ट्रेस किया तो उसका IP पाकिस्तान के रावलपिंडी का निकला।
सबको लगा सरकार 35A हटाएगी, मोदी सरकार ने 370 हटा दिया जम्मू-कश्मीर में कोई भी फैसला लागू करने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेना जरूरी है। BJP-PDP सरकार गिरने के बाद से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था। इस कारण केंद्र को कोई भी फैसला लेने के लिए राज्यपाल की सहमति लेना थी। पत्रकार अनुराधा भसीन अपनी किताब ‘द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर ऑफ्टर आर्टिकल 370’ में लिखती हैं कि 2 अगस्त को आतंकी हमले के मद्देनजर अचानक अमरनाथ यात्रा पर रोक लगा दी गई। टूरिस्टों से कहा गया कि वे तुरंत जम्मू-कश्मीर छोड़ दें। 4 अगस्त को राज्य में इंटरनेट बंद कर दिया गया। स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया गया था।
सोशल मीडिया में अफवाह चल रही थी कि सरकार आर्टिकल 35A हटाने जा रही है। 370 के तहत आर्टिकल 35A एक विशेष प्रावधान था, जो जम्मू और कश्मीर राज्य को कुछ विशेष अधिकार और स्वायत्तता प्रदान करता था। इसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार के पास यह अधिकार था कि वह तय कर सके कि राज्य का स्थायी निवासी कौन होगा। स्थायी निवासियों को राज्य में संपत्ति खरीदने, सरकारी नौकरी पाने, और अन्य सामाजिक लाभ पाने का विशेष अधिकार था। दूसरे राज्यों के नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति नहीं खरीद सकते थे और न ही सरकारी नौकरियों या अन्य लाभों के पात्र थे। इसके अलावा अगर राज्य की किसी महिला ने राज्य के बाहर के व्यक्ति से शादी की तो वह और उसके बच्चे स्थायी निवासी के अधिकार खो देते थे। इस अफवाह के बाद कश्मीर के लोग राशन भरने लगे।
सरकार की मंशा कुछ और ही उसने 35A की जगह उसकी जड़ 370 को ही खत्म कर दिया। 5 अगस्त को गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में धारा 370 खत्म करने का बिल पेश किया। ये भी प्रस्ताव रखा कि लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा न होकर नेशनल टेरेटरी होगी। इस तरह एक दिन में ही शोर-शराबे के बीच जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हमेशा के लिए हट गई।
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