सेक्स स्कैंडल के दोषियों को उम्रकैद दिलाने वाली पीड़िताएं:बेटी को छिपाकर कोर्ट लाता था पिता; इंसाफ की लड़ाई के लिए नहीं की शादी
मैं पीड़िता नंबर- 4…मेरी उम्र तब 17 साल थी, जब इस गिरोह का शिकार बनी। मैं डिबेट में अच्छी थी। राजनीति में आना चाहती थी। आरोपी अनवर चिश्ती का राजनीतिक रसूख था। उसने मुझे पार्टी जॉइन करवाने का झांसा दिया। किसी बड़े नेता से मिलवाने के बहाने फार्म हाउस ले गया। मेरे साथ दरिंदगी की। न्यूड फोटो खींचे। फिर शुरू हुआ ब्लैकमेल करने का घिनौना
1992 में अजमेर सेक्स स्कैंडल की पीड़ित के ये बयान तब के हैं, जब इस मामले का खुलासा पहली बार हुआ था। कॉलेज व स्कूल की 100 से ज्यादा छात्राओं के साथ गैंगरेप व न्यूड फोटो खींचकर उन्हें ब्लैकमेल किया गया था।
पीड़ित नंबर-4 की तरह 30 पीड़िताएं सामने आईं और बयान दिए। लेकिन आरोपियों के रसूख ने इस कदर मजबूर कर दिया कि किसी पीड़ित ने नाम बदला, किसी ने बयान तो किसी ने शहर। पुलिस उन्हें गवाही देने के लिए बुलाने जाती तो कहा जाता- वो मर चुकी है। हालांकि, उनमें से 3 पीड़िताएं ऐसी थीं जो इंसाफ के लिए लड़ीं। एक बेटी को गवाही दिलाने खुद पिता साथ लाते।
बुधवार को 32 साल बाद देश के सबसे बड़े सेक्स स्कैंडल के 18 आरोपियों में से बाकी बचे 6 आरोपियों को सजा दिलाकर ही दम लिया। भास्कर ने इस मामले में केस ऑफिसर रहे तत्कालीन अजमेर दरगाह थानाधिकारी से बात कर जाना कि कैसे और किन मुश्किलों में पीड़िताओं को गुजरना पड़ा और कैसे उन्हें न्याय मिला।
कोरोना काल में पीड़िताओं को तलाशा, 40 गवाहों के बयान दर्ज करवाए
CI दलबीर सिंह ने बताया कि दरगाह पुलिस थाने में 20 दिसंबर 2020 को पोस्टिंग मिली। इसी दौरान तत्कालीन SP विकास शर्मा ने पीड़िताओं से संपर्क कर उनके बयान दर्ज कराने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके लिए अतिरिक्त 20 पुलिसकर्मियों का जाब्ता भी दिया गया।
दस पुलिसकर्मियों को पीड़िताओं के पते तलाशकर उन्हें समन तामिल कराने के लिए लगाया गया। कोरोना महामारी के कारण इसमें कुछ देरी भी हुई, लेकिन बावजूद इसके पुलिस करीब एक साल में 40 गवाहों के बयान दर्ज करवाए।
1992 में 100 से ज्यादा कॉलेज व स्कूल गर्ल्स के साथ गैंगरेप हुआ। न्यूड फोटो खींचकर उन्हें ब्लैकमेल करने का मामला उजागर हुआ था। तब इस मामले में आरोपियों के खिलाफ 30 पीड़िताएं सामने आईं थी। बाद में कुछ ने बयान बदल लिए। कोर्ट में ऑन रिकॉर्ड 16 पीड़िताएं हैं, लेकिन दोषियों को सजा दिलाने में 3 पीड़िताओं की गवाही महत्वपूर्ण रही। ऐसे में कोर्ट ने तीनों पीड़िताओं के बयान को ही बाकी सभी पीड़िताओं का बयान मानते हुए दर्ज किया।
आरोपियों को सजा दिलाने वाली 3 पीड़िताएं
पीड़ित नंबर-1: अभी तक नहीं की शादी
अजमेर ब्लैकमेल कांड की एक पीड़िता ने गिरोह और उसकी करतूतों के सामने आने के बाद भी अजमेर नहीं छोड़ा। न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए तक शादी नहीं की। तत्कालीन केस ऑफिसर दलबीर सिंह ने बताया कि उस पीड़िता के बयान इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए। उस पीड़िता ने कोर्ट में आरोपियों की सारी करतूतों के बारे में बयान दिए।
पुलिस के सुरक्षा का भरोसा दिलाने के बाद जब भी कोर्ट में बयान के लिए उन्हें ले जाया जाता, वो बेखौफ होकर जाती। पीड़ित ने इस बार एक-एक कर तीनों प्रमुख आरोपियों की कोर्ट में शिनाख्त की है। पीड़ित ने बताया कि कैसे आरोपी ने उसकी बहन का रेप करने की धमकी देकर डराया व धमकाया। वह एक बार गर्भवती भी हो गई थी। गर्भपात करने की कोशिश के बावजूद बच्चा नहीं गिरा। हालांकि, उसने मृत बच्चे को जन्म दिया था।
पीड़ित नंबर-2: बॉयफ्रेंड ने गर्लफ्रेंड के सामने ही रेप किया
अजमेर ब्लैकमेल कांड की पीड़िताओं में एक लड़की ऐसी भी थी, जिसका बॉयफ्रेंड गिरोह में शामिल था। वो उसके सामने ही गिरोह के झांसे में आई लड़कियों के साथ रेप करता था। इस बात का उसने विरोध भी किया था।
कोर्ट में गवाही देने वाली पीड़िता नंबर-2 को अपने बॉयफ्रेंड के अन्य लड़कियों के साथ जबरन संबंध बनाने और उन्हें ब्लैकमेल करने के बारे में पता चला तो उसने अपने भाई के साथ मिलकर उसकी जमकर पिटाई कर दी थी। इसमें उसका हाथ टूट गया था।
इसको लेकर आरोपी ने पीड़ित और उसके भाई के खिलाफ केस भी दर्ज कराया था। यही केस पुलिस के लिए मजबूत कड़ी भी साबित हुआ। पुलिस ने इस घटना को ब्लैकमेल कांड से जोड़कर पेश किया। पीड़ित नंबर-2 की गवाही कराई। जिससे आरोपियों का दोष साबित होने में मदद मिली।
पीड़ित नंबर-3 : पिता-पुत्री ने दिखाई हिम्मत
आरोपियों की संदिग्ध गतिविधियों और उनकी पहचान करने में एक पिता-पुत्री की गवाही भी महत्वपूर्ण साबित हुई। स्कैंडल के आरोपी अक्सर दरगाह बाजार की एक पार्किंग के पास ही पीड़ित लड़कियों को अपने साथ लेकर जाते थे। उसी बाजार में एक पीड़ित का पिता भी नौकरी करता था। आरोपियों ने उसकी बेटी को भी अपना शिकार बनाया था।
पीड़ित इस कांड के सामने आने के बाद अजमेर छोड़कर चले गए थे। वे इस बारे में बात नहीं करना चाहते थे। बेटी का चार्जशीट में नाम था, लेकिन गवाहों की लिस्ट में नाम नहीं था। वे इतने खौफ में थे कि किसी भी सूरत में गवाही देने को तैयार नहीं थे।
तत्कालीन CI दलबीर सिंह ने बताया कि पुलिस ने पिता-पुत्री का नाम व पहचान उजागर नहीं करने का भरोसा दिलाया। इसके बाद ही वह गवाही देने को तैयार हुए। कोर्ट में आरोपियों को पहचाना और उनके खिलाफ गवाही दी। उनकी पहचान उजागर नहीं हो, इसलिए पिता और बेटी को छिपाकर ही कोर्ट तक लाया जाता था।
इन पीड़िताओं के अलावा भी पुलिस ने कई अन्य पीड़ित महिलाओं से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने गवाही देने से मना कर दिया। एक पीड़ित का नाम बदलकर पंजाब में शादी कर दी गई। पुलिस ने जब उसके भाई से संपर्क कर पीड़ित से गवाही देने को कहा तो उसने मना कर दिया।
पुलिस गोपनीय तरीके से पहुंचाती थी कोर्ट
पुलिस इंस्पेक्टर दलबीर सिंह बताते हैं कि इस केस से जुड़ी पीड़िताओं में सामाजिक डर इतना था कि वे पुलिस के बार-बार समन तामिल कराने के बाद भी कोर्ट में पेश होने के लिए तैयार नहीं थीं। पीड़िताओं का घर तलाशने के बाद जब पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे तो कुछ परिजनों ने पुलिसकर्मी से झूठ कहा कि पीड़ित की माैत हो गई है।
वहीं कुछ ने यह तक कह दिया था कि- हम इतने प्रताड़ित हो चुकी हैं कि दोबारा घर आए तो आत्महत्या कर लेंगे। पीड़िताएं नहीं चाहती थी कि उनके ससुराल या बच्चों को उनके अतीत में हुए इस घिनौने कांड के बारे में कुछ पता चले।
ऐसे में पुलिस ने पीड़िताओं और उनके परिजन की काउंसलिंग की और उन्हें भरोसा दिलाया। उनके बयान कराने के लिए पुलिस ने उन्हें अजमेर सीमा से पहले ही जीप में बैठाकर बहुत ही गोपनीय तरीके से सीधा कोर्ट पहुंचाया। कोर्ट में भी उन्हें इस तरह ले जाया जाता था, जिससे किसी को भी इनके बारे में भनक न लग सके।
केस सामने आने के बाद छोड़ा अजमेर
ब्लैकमेल कांड उजागर होने के बाद अधिकांश लड़कियों और उनके परिजन ने अजमेर छोड़ दिया था। इसके बाद वे कहां गायब हो गईं। इसके बारे में किसी को ज्यादा जानकारी नहीं है। अधिकांश पीड़ित सरकारी कर्मचारियों के मध्यम वर्गीय परिवारों से थीं। कुछ पीड़िताओं ने नाम बदल लिए, जिससे पुलिस के लिए उन पर नजर रखना और फिर गवाही दिलाने के लिए लाना लगभग असंभव सा हो गया था।
पुलिसकर्मी को देखकर डर जाती थी पीड़िताएं
आमतौर पर अपराधी पुलिसकर्मी को देखकर सहम या डर जाते हैं, लेकिन अजमेर ब्लैकमेल कांड ने पीड़िताओं को इतना डरा दिया गया था कि वे पुलिस को घर देखकर ही डर जाती थी। कोर्ट के बार-बार बुलाने से वे परेशान हो चुकी थीं।
कानून के जानकारों की मानें तो आरोपियों की मौजूदगी में पीड़ित की गवाही दर्ज होती है। इस केस में आरोपी भी 15 से ज्यादा थे। ऐसे में जब भी इस केस से जुड़ा कोई आरोपी पकड़ा जाता था तो पीड़ित को गवाही के लिए बुलाया जाता था। पीड़िताओं के परिवार लंबी कानूनी लड़ाई से परेशान हो चुके थे।
गैस सिलेंडर से नेता बनाने तक का झांसा
ब्लैकमेल कांड के दोषी उस दौर में खुली जीप, एंबेसडर और फिएट कारों में घूमते थे। इनके पास राजनीतिक रसूख था। दोषियों ने एक नाबालिग छात्रा को नेता बनाने के सपने दिखाकर दुष्कर्म किया। वहीं कुछ को टेलीफोन और गैस सिलेंडर देने का झांसा देकर रेप किया गया। उस समय गैस सिलेंडर मिलना एक बड़ी बात थी। जिसका फायदा उठाया गया। रेप के दौरान गिरोह के दूसरे साथी इन लड़कियों के फोटो लेते थे, जिससे उन्हें ब्लैकमेल किया जा सके।
पुलिस के अनुसार एक छात्रा से शुरू हुए ब्लैकमेल कांड ने एक के बाद एक कई छात्राओं को अपना शिकार बना लिया। पुलिस जांच में अजमेर के एक बंगले, फार्म हाउस और पोल्ट्री फॉर्म के अंदर दिए गए प्रलोभन, यौन शोषण और ब्लैकमेल की कई कहानियां सामने आईं।
रिटायर्ड पुलिसकर्मियों की वीडियो कॉन्फ्रेंस से हुई गवाही
अजमेर ब्लैकमेल कांड 1992 में सामने आया। 3 मई 1992 को केस दर्ज होने से कोर्ट में ट्रायल चलने के दौरान कई पुलिसकर्मी और जांच अधिकारी रिटायर्ड हो गए। कुछ बुजुर्ग होने के कारण बार-बार कोर्ट आने से बचना चाह रहे थे। इसीलिए गवाही देने नहीं आ रहे थे। ऐसे में कोर्ट ने रिटायर्ड पुलिसकर्मियों पूर्व IPS हरिप्रसाद शर्मा और रमेश तिवाड़ी के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रिकॉर्ड किए थे।
18 आरोपियों में से 9 को पहले सुनाई जा चुकी सजा
- इन 4 को उम्रकैद हुई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल की सजा में बदला: इशरत अली, अनवर चिश्ती, मोइजुल्लाह पुत्तन इलाहबादी, शम्सुद्दीन उर्फ माराडोना। इन्हें 2003 में सजा हुई थी, ये सभी रिहा हो चुके हैं।
- इन 4 को उम्रकैद हुई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने बरी किया: परवेज अंसारी, महेश लुधानी, हरीश तोलानी, कैलाश सोनी। इन्हें लोअर कोर्ट ने 1998 में उम्र कैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इन्हें दोषमुक्त कर दिया था। वहीं, नौवे आरोपी फारुख चिश्ती को लोअर कोर्ट ने 2007 में उम्र कैद की सजा सुनाई थी। 2013 में उसे भुगती हुई सजा पर ही हाईकोर्ट ने रिहा कर दिया था। इस तरह नौ आरोपियों को सजा सुनाई जा चुकी थी।
- एक सुसाइड कर चुका: पुरुषोत्तम उर्फ बबली 1994 में केस चलने के दौरान सुसाइड कर चुका है। वह जमानत पर बाहर आया था। जहूर चिश्ती पर कुकर्म का केस चला, उसे 1997 में रिहा कर दिया गया।
- बुधवार को इन 6 को सुनाई गई सजा: सोहिल गनी, नफीस चिश्ती, जमीर हुसैन, सलीम चिश्ती, इकबाल भाटी, नसीम उर्फ टारजन।
- एक आरोपी अभी भी फरार: अल्माश महाराज अभी फरार है, इसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया हुआ है।
