मुसलमान लव जिहाद करते हैं, ईसाई धर्म परिवर्तन:द्वारका के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती बोले- हर राज्य को यूपी जैसा कानून लाना चाहिए
जगदगुरु आदि शंकराचार्यजी ने भारत में चार मठों की स्थापना की। उनमें से एक शारदा मठ गुजरात के द्वारका में है। द्वारका मठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वतीजी अहमदाबाद के शिवानंद आश्रम में चातुर्मास बिताने आए हैं।
दैनिक सत्संग के बीच उन्होंने भास्कर से बातचीत की। पढ़ें प्रमुख अंश…
सवाल: यूपी में लव जिहाद बिल पास हुआ। इस बारे में क्या कहेंगे?
जवाब: यह बिल्कुल सही फैसला है। हर राज्य के मुख्यमंत्री को लव जिहाद के कानून का पालन कराना चाहिए। ईसाई धर्मान्तरण करवा रहे हैं। मुस्लिम अनुयायी भी लव जिहाद का सहारा लेकर हमारे युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। ये सब रुकना चाहिए। इसे रोकने के लिए सभा राज्यों को यूपी जैसा ही सख्त कानून बनाना चाहिए
सवाल: समाज में अराजकता के माहौल में सनातन धर्म की क्या भूमिका है?
जवाब: हिंदुओं, सनातन धर्मावलंबियों को धर्मग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। आने वाली पीढ़ी के बच्चों को सनातन धर्म, सनातन शास्त्रों की शिक्षा देनी चाहिए। इसके लिए हमारी शिक्षा प्रणाली में शिक्षा केन्द्रों (स्कूलों) में धार्मिक शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। धार्मिक शिक्षा पाठ्यक्रम का मूल हिस्सा होना चाहिए। हमारी शिक्षा का भारतीयकरण होना चाहिए। हमारी शिक्षा में देशभक्ति का संदेश शामिल होना चाहिए।
हमारे महापुरुषों ने आजादी और हमारे सनातन धर्म की रक्षा के लिए, हिंदुओं की रक्षा के लिए जो कुछ किया है, लोगों को इन महापुरुषों के चरित्र को बताना चाहिए।
सवाल: मुगलों ने भारत के मंदिरों और संस्कृति पर आक्रमण किया फिर भी सनातन धर्म अक्षुण्ण है, इसका रहस्य क्या है?
जवाब: क्योंकि यह सनातन है। सनातन परमात्मा द्वारा प्रतिपादित धर्म है। यह उनके द्वारा शासित सनातन धर्म है। सनातन शब्द का अर्थ है ‘जो शाश्वत है’। जो सदैव स्थिर रहता है। यह कभी नष्ट नहीं होगा। इसी को सनातन कहते हैं।
सवाल: अब अलग-अलग संप्रदाय हैं और उनकी शाखाएं बंटी हुई हैं, क्या इससे भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचेगा?
जवाब: सम्प्रदाय का अर्थ है, किसी महापुरुष द्वारा सनातन धर्म की एक विशेष विधि का निर्माण कर अपने अनुयायियों से उसका पालन कराना। भक्ति मार्ग में, उपासना मार्ग में किसी सनातन धर्म से, वेदों, शास्त्रों और पुराणों से शिक्षा लेकर उसके बताए मार्ग पर चलना। यही संप्रदाय है। किसी धर्म में कोई दोष नहीं है।
संप्रदाय को चलाने वालों की बुद्धि और मन में जब विकार आ जाते हैं तो वह पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने लगता है। इसी से नुकसान होता है और हम आपस में बंट जाते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।
सवाल: चातुर्मास के बैनर, होर्डिंग में अहमदाबाद को कर्णावती शहर लिखा हुआ है तो क्या अहमदाबाद का नाम कर्णावती होना चाहिए?
जवाब: यह शंकराचार्य मठ का फैसला नहीं है। यह तो अहमदाबाद के लोगों की ही मांग है। यहां के लोग ही चाहते हैं कि अहमदाबाद शहर का नाम कर्णावती रखा जाए।
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज का जन्म मध्यप्रदेश में हुआ
द्वारका शारदापीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज का जन्म 31 अगस्त 1958 को मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करकबेल के पास बरगी गांव में हुआ था। उनका सांसारिक नाम रमेश अवस्थी है। पिता का नाम आयुर्वेदरत्न पंडित विद्याधर अवस्थी और माता का नाम मानकुंवर देवी है। स्वामीजी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बरगी में पूरी की। बचपन से ही उनकी भगवान और संतों में अटूट आस्था थी।
सरस्वती महाराज ने संस्कृत की शिक्षा ज्योतिरिश्वर ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय जोतेश्वर में ली। उनके गुणों और रुचि को देखकर ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने उन्हें शंकराचार्यजी के सान्निध्य में काशी भेज दिया था, जहां उन्होंने 16 वर्ष तक व्याकरण, न्याय, वेद, वेदांत साहित्य सहित शिक्षा प्राप्त की।
अपने गुरुचरणों के प्रति अटूट आस्था को देखते हुए ब्रह्मलीन द्वारिका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने वर्ष 1977 में स्वामीजी को प्रयाग कुंभ में ब्रह्मचारी की दीक्षा दी और अपनी शक्ति एवं आशीर्वाद प्रदान करते हुए उन्हें सदानंद ब्रह्मचारी नाम दिया। उनकी कार्यकुशलता, निपुणता को देखकर शंकराचार्यजी महाराज ने उन्हें मठों के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी।
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती महाराज अस्पतालों, गुरुकुलों, अन्नक्षेत्रों और आश्रमों में मुफ्त सुविधाएं प्रदान करते हैं। वर्तमान में जगद्गुरु शंकराचार्यजी सदानंद सरस्वतीजी महाराज चातुर्मास करने के लिए अहमदाबाद आए हुए हैं और सैटेलाइट एरिया में इसरो के ऑफिस के सामने शिवानंद आश्रम में सत्संग कर रहे हैं।
