लाशों को गिनने वाले आंखों देखी:शवों को छूकर देखा जिंदा तो नहीं, आंकड़ा सामने आने पर सरकार की नींद खुली
मंगलवार दोपहर 2 बजे। दोस्त का फोन आया। बोला-हाथरस के फुलरई गांव में भोले बाबा के सत्संग में भगदड़ मची है क्या? मैंने कहा- अभी ऐसी जानकारी नहीं। पता करता हूं। मैंने अफसरों को कॉल किया। उन्हें भी जानकारी नहीं थी। खबर 3 बजे कन्फर्म हुई। 3.15 बजे लखनऊ डेस्क को सूचना देकर खबर ब्रेक की।
तुरंत हाथरस सिटी से 40 किलोमीटर दूर फुलरई गांव के लिए रवाना हुआ। रास्ते में अफसरों से बात करते हुए घटना की जानकारी लेता रहा, लेकिन लोग भगदड़ को हल्के में ले रहे थे। इतनी मौत देख डॉक्टर भी कुछ बोलने को तैयार नहीं थे। कितनी मौतें हुईं यह जानने के लिए भटकता रहा। जिम्मेदारों से पूछता रहा, लेकिन किसी ने मुंह नहीं खोला।
कोई रास्ता नहीं दिखा, तो मैंने हिम्मत कर एक-एक शवों को गिनना शुरू किया। बहुत मुश्किल था। मैंने 95 शवों को गिना। इतनी मौत का यह आंकड़ा सबसे पहले भास्कर ने ब्रेक किया। तब जाकर प्रशासन से लेकर सरकार तक की नींद
लोडर में भरकर लाशें ले जाई गईं
मैंने अपनी गाड़ी CHC की तरफ मोड़ दी। अभी CHC से 400 मीटर दूर ही था, तभी बगल से एक लोडर गुजरा। उसमें लाशों के बीच महिला बैठी थी। एक अचेत महिला की हथेली को सहला रही थी। ये मंजर देखकर मैं समझ गया कि हादसा बहुत बड़ा है। CHC पहुंचा तो वहां भारी भीड़ दिखी। चारों तरफ चीख-पुकार मची थी।
गाड़ी से उतर कर CHC की तरफ बढ़ा तो कुछ समझ ही नहीं आया। चारों तरफ जमीन पर केवल लोग पड़े थे। थोड़ा आगे बढ़ा तो पता चला कि इनमें से ज्यादातर मर चुके हैं। जो जिंदा थे, उनकी हालत भी गंभीर थी।
इन लाशों के बीच कुछ लोग इधर-उधर भाग रहे थे। चीखते-चिल्लाते अपनों की पहचान में लगे थे। वहां कई लोगों से बात करने की कोशिश की, लेकिन कुछ बता नहीं पाया। मैं CHC के अंदर गया। वहां बिजली कटने से अंधेरा था। वहां एक ही डॉक्टर थे, जो केवल घायलों की एंट्री भर कर पा रहे थे।
लोग इस कदर घायल थे कि उनका CHC में इलाज संभव नहीं था। इलाज न मिलने से लोग दम तोड़ रहे थे। कुछ को वहां से हायर सेंटर रेफर किया गया।
लाश गिनते-गिनते मेरी आंखों से आंसू निकल आए
वहां डॉक्टर से मौत का आंकड़ा पूछा तो बता नहीं पाए। इसके बाद खुद लाशों को गिनने लगा। CHC के अंदर और बाहर एक-एक कर 30 मिनट में 95 लाशें गिन डाली। लाशों को छूकर देखा कहीं कोई जिंदा तो नहीं।
किसी का सिर कुचला था, तो किसी का चेहरा खून से लाल था। ये सब देख आंखों में आंसू आ गए। किसी तरह खुद को संभाला और मृतकों की काउंटिंग कर लखनऊ हेड ऑफिस को रिपोर्ट दी।
ऐसा दृश्य मैंने आज तक नहीं देखा था और न कभी देखना चाहूंगा। हर तरफ चीख-पुकार थी। इनमें ज्यादातर लाशें लावारिस थीं।
सत्संग स्थल पर लोग बोले- भागो नहीं तो मारे जाओगे
वहां से मैं सत्संग स्थल के लिए निकला। सत्संग स्थल पहुंच कर अंदर की तरफ बढ़ा। वहां हर तरफ अफरा-तफरी मची थी। कोई अपनों को खोज रहा था तो कोई जान बचाकर भागता दिखा। पवन कुमार नाम के एक युवक से पूछा कि क्या हुआ? तो उसने कहा- जल्दी भागो, नहीं तो कुचले जाओगे, भीड़ में न जाओ नहीं तो जिंदा नहीं बचोगे। मैं अपनी मां और बच्चों को खोज रहा हूं, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चल रहा है।
आगे बढ़ते-बढ़ते मैं भी उसी भीड़ में खो गया। मुझे सिर्फ चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। वहां भी हर तरफ लोग जमीन पर पड़े थे। कोई अपने बच्चों तो कोई अपनी मां-बाप और भाई को गले से लगाकर चीख रहा था। हर कदम पर लाशें बिछी पड़ी थीं।
अभी पुलिस-प्रशासन का कोई नजर नहीं आ रहा था। एकसाथ इतनी मौतें मैंने अपने 30 साल के पत्रकारिता करियर में कभी नहीं देखीं। यूपी में कभी ऐसा सुना भी नहीं था। कोई कुछ बता नहीं पा रहा था कि आखिर कितने लोगों की जान गई है। सबके सामने कोई अपना पड़ा था।
शव ले जाने से रोका तो लोग बोले- हमें मुआवजा नहीं चाहिए
कोई कार्यक्रम के आयोजकों को गुस्से में गाली दे रहा था तो कोई प्रशासन की व्यवस्था को कोस रहा था। यहां लोग गम और गुस्से में डूबे हुए थे। लाशों से लिपटकर रोने वाले लोग बदहवास थे। कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था। कुछ कर्मचारी जरूर शवों की गिनती करने की औपचारिक पूरी कर रहे थे।
इस दौरान कुछ मृतकों के परिजन आ गए और वह शवों को ले जाने लगे। प्रशासनिक कर्मचारियों ने उन्हें रोका। कहा- शवों का पोस्टमॉर्टम होने के बाद ही घर ले जाएं। लेकिन परिजन रोते हुए यह बोल रहे थे कि उनका अब सब कुछ उजड़ गया। पोस्टमॉर्टम से क्या हो जाएगा। हमें मुआवजा नहीं चाहिए।
CHC से 3 घंटे बाद लाशों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा
घटनास्थल पर चारों तरफ लाशें बिखरी पड़ी थीं। करीब एक घंटे बाद अधिकारियों का आना शुरू हुआ। CHC से 3 घंटे बाद इन लाशों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजने का सिलसिला शुरू हुआ। वहां मौजूद हर किसी की आंख में आंसू थे। लाश से लिपट कर रोते बदहवास परिजन को लोग दिलासा दे रहे थे।
क्यों मची भगदड़?
सत्संग के बाद भोले बाबा जब निकला, तो चरण रज लेने के लिए महिलाएं टूट पड़ीं। भीड़ हटाने के लिए वॉलंटियर्स ने वाटर कैनन का उपयोग किया। बचने के लिए भीड़ इधर-उधर भागने लगी और भगदड़ मच गई। लोग एक-दूसरे को रौंदते हुए आगे बढ़ने लगे।
