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बूथ वाइज डेटा अपलोड की मांग वाली याचिका खारिज:सुप्रीम कोर्ट बोला- 5 फेज की वोटिंग हो चुकी, चुनाव आयोग के लिए मैनपावर जुटाना मुश्किल

सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी वेबसाइट पर वोटर टर्नआउट अपलोड करने वाली याचिका पर चुनाव आयोग को कोई भी निर्देश देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 5 फेज हो चुके हैं, दो चरण बाकी हैं। ऐसे में डेटा अपलोडिंग के लिए मैनपावर जुटाना चुनाव आयोग के लिए मुश्किल है।

सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की वेकेशन बेंच ने की। NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने याचिका में इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) की वेबसाइट पर फॉर्म 17सी डेटा अपलोड करने और बूथ वाइज वोटिंग डेटा अपलोड करने की मांग की थी।

याचिका में यह भी कहा गया था कि कोर्ट निर्देश दे कि मतदान के 48 घंटे के भीतर चुनाव आयोग वोटिंग प्रतिशत का डेटा बूथ वाइज अपनी वेबसाइट पर अपलोड करे।

आयोग ने कोर्ट से कहा था- इससे अव्यवस्था फैल सकती है
22 मई की सुनवाई में आयोग ने NGO की मांग का विरोध किया था। SC में दाखिल एफिडेविट में कहा था कि फॉर्म 17सी (हर मतदान केंद्र पर डाले गए वोटों का रिकॉर्ड) के आधार पर वोटिंग डेटा का खुलासा करने से मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा होगा, क्योंकि इसमें बैलेट पेपर की गिनती भी शामिल होगी।

ऐसा कोई कानून नहीं है, जिसके आधार पर सभी मतदान केंद्रों का फाइनल वोटिंग डेटा जारी करने के लिए कहा जा सके। फॉर्म 17सी केवल पोलिंग एजेंट को दे सकते हैं। इसे किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को देने की अनुमति नहीं है।’ फॉर्म 17सी वह प्रमाण पत्र है, जिसे पीठासीन अधिकारी सभी प्रत्याशियों को प्रमाणित करके देता है।

आयोग ने कहा था कि कई बार जीत-हार का अंतर नजदीकी होता है। आम वोटर फॉर्म 17सी के अनुसार बूथ पर पड़े कुल वोटों और बैलेट पेपर को आसानी से नहीं समझ सकते। ऐसे में इसका इस्तेमाल गलत तरीके से चुनावी प्रक्रिया पर कलंक लगाने के लिए किया जा सकता है, जिससे मौजूदा चुनाव में अव्यवस्था फैल सकती है।’

चुनाव आयोग पर वोटिंग पर्सेंट देर से जारी करने का आरोप
दरअसल, NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई है। इसमें वोटिंग के 48 घंटे के भीतर सभी बूथ का फाइनल डेटा आयोग के वेबसाइट पर जारी करने की मांग की गई है।

NGO ने चुनाव आयोग पर लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों में वोटिंग पर्सेंट जारी करने में देरी का आरोप लगाया। याचिका में कहा गया कि पहले तो डेटा जारी करने में देरी हुई। इसके बाद शुरुआती डेटा के मुकाबले फाइनल डेटा में वोटिंग पर्सेंट काफी बढ़ गया।

याचिका के मुताबिक, चुनाव आयोग ने 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के 11 दिन बाद और 26 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के चार दिन बाद 30 अप्रैल को फाइनल वोटिंग पर्सेंट जारी किया था। इसमें वोटिंग के दिन जारी शुरुआती आंकड़े के मुकाबले वोटिंग पर्सेंट लगभग 5-6 प्रतिशत ज्यादा था।

चुनाव आयोग बोला- चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा करने का अभियान चल रहा
सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को NGO की याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग से एक हफ्ते में जवाब मांगा था। बुधवार (22 मई) को आयोग ने कहा, ‘चुनाव प्रक्रिया को लेकर भ्रामक दावों और निराधार आरोपों से संदेह पैदा करने का अभियान चल रहा है। इसे समझना होगा। सच सामने आने तक नुकसान हो चुका होगा। ADR कानूनी अधिकार का दावा कर रहा है लेकिन ऐसा कानून है ही नहीं।’

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