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क्या जयपुर में किडनी-लिवर तस्करी गैंग के पीछे डॉ. हॉरर?:28 साल पहले राजस्थान से फैलाया नेटवर्क, 600 गरीब मजदूरों की बेची थी किडनी

बांग्लादेशी गरीब मजदूरों की किडनी-लीवर निकालकर अमीरों को लगाने के लिए एनओसी जारी करने वाली गैंग का हाल ही में खुलासा हुआ है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने जयपुर के सवाई मान सिंह (SMS) हॉस्पिटल के कर्मचारी गौरव सिंह और दो प्राइवेट हॉस्पिटल के कोऑर्डिनेटर के घर छापेमारी की। यहां से कई चौंकाने वाले दस्तावेज मिले। पता चला कि नेपाल, बांग्लादेश, क्यूबा, कंबोडिया जैसे देशों से मानव अंगों की तस्करी का खेल चल रहा है।

इस खुलासे के बाद पुलिस की निगाहें 28 साल पुराने किडनी-लीवर निकालने वाले देश के सबसे कुख्यात अपराधी डॉ. अमित कुमार उर्फ डॉ. हॉरर की गैंग पर टिक गई हैं। इसकी वजह दोनों के अपराध के तरीके का एक होना है।

राजस्थान में किडनी के अवैध प्रत्यारोपण का नेटवर्क अमित ने ही फैलाया था। वो फुटपाथ पर सोने वाले दिहाड़ी मजदूरों को 40-50 हजार का लालच देकर किडनी निकाल लेता था। लाखों रुपए में सौदा कर विदेशियों के ट्रांसप्लांट करता था। उसने 600 से अधिक लोगों की किडनी निकाल बेची थी।

भास्कर ने 28 साल पुराने केस की फाइलें खंगाली तो सामने आया कि कैसे एक डॉक्टर अपने जाल में फंसाकर किडनी निकालकर बेच देता था? संडे बिग स्टोरी में पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

जयपुर में एसीबी ने किडनी लीवर ट्रांसप्लांट करने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया था।

ACB ने जयपुर में पकड़ा गिरोह

एसीबी ने राजस्थान में अवैध रूप से किडनी प्रत्यारोपण के लिए फर्जी एनओसी जारी करने के मामले में 1 अप्रैल को एसएमएस हॉस्पिटल के सहायक प्रशासनिक अधिकारी गौरव सिंह और ईएचसीसी अस्पताल के कोऑर्डिनेटर अनिल जोशी को 70 हजार रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। अगले दिन सोमवार को फोर्टिस हॉस्पिटल के कोऑर्डिनेटर विनोद सिंह को गिरफ्तार किया था।

एसीबी ने तीनों आरोपियों के ठिकानों से 300 से ज्यादा एनओसी बरामद किए थे। ज्यादातर एनओसी नेपाल, बांग्लादेश, क्यूबा, कंबोडिया सहित विदेशों में रहने वाले मरीजों की हैं। उसके बाद पुलिस ने मामले में हॉस्पिटल के सर्जन और संबंधित लोगों से भी पूछताछ शुरू की।

जयपुर में निकाली गई बांग्लादेशी की किडनी

पूछताछ में सामने आया कि जयपुर के प्राइवेट हॉस्पिटल में बांग्लादेशी युवक की किडनी निकाली गई थी। ऑपरेशन कर उसे गुरुग्राम (गुड़गांव) के होटल में शिफ्ट कर दिया गया था। इसके बाद राजस्थान में ऑर्गन ट्रांसप्लांट के अवैध कारोबार की जांच के लिए जयपुर पुलिस कमिश्नरेट की स्पेशल टीम को गुरुग्राम भेजा गया।

वहां बांग्लादेशी डोनर ने खुलासा किया कि उनको ट्रांसप्लांट के लिए एक दलाल लेकर आया था। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय रैकेट के तार जयपुर और गुरुग्राम से जुड़ रहे हैं। पुलिस को 28 साल पहले 1996 में सुर्खियों में आए ‘किडनी कांड’ में कुख्यात डॉ. अमित के शामिल होने की आशंका है। दोनों का अपराध का तरीका एक जैसा ही है।

कौन है डॉ. अमित उर्फ हॉरर?

महाराष्ट्र का रहने वाला डॉक्टर अमित रावत (बीएएमएस) मुंबई में अवैध किडनी प्रत्यारोपण के मामले में पहली बार पकड़ा गया था। जमानत पर बाहर आने के बाद 1995 में उसने जयपुर को शरणस्थली बनाया था। शहर में कदम रखते ही डॉ. अमित ने अपने भाई डॉ. जीवन (बीएचएमएस) के साथ मिलकर अवैध किडनी प्रत्यारोपण का खेल शुरू कर दिया था।

उसके पास महज बीएएमएस (अयुर्वेद) की डिग्री थी, सर्जरी से प्रशिक्षित नहीं होने के बावजूद किडनी ट्रांसप्लांट करता था। उस दौर में उसने जिनकी किडनी बदली, उनमें से कई की मौत हो गई। इसी कारण वह डॉ. हॉरर के नाम से कुख्यात था।

डॉ. अमित के पास महज बीएएमएस (अयुर्वेद) की डिग्री थी। फिर भी गैरकानूनी तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट करता था।

डॉ. अमित ने दो दशक पहले जयपुर में आंध्र प्रदेश निवासियों की किडनी निकालकर सऊदी अरब निवासी दो शेखों को प्रत्यारोपित कर दी थी। इस काम को सोडाला थाना क्षेत्र में एक आरोपी सुरेश गुप्ता के प्राइवेट नर्सिंग होम में अंजाम दिया गया था। मामला वर्ष 1995 में तब खुला था, जब किडनी डोनर हसन और रामलू को पैसे देने की बजाय डरा-धमकाकर भगा दिया गया। वो गरीब मजदूर थे। व्यथित होकर दोनों ने 20-11-95 को सोडाला थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी।

लोगों ने बेटी की शादी के लिए बेची किडनी

चाय बेचने वाले आंध्र प्रदेश निवासी रामलू को बड़ी लड़की की शादी करनी थी। रुपए नहीं होने के कारण रामलू परेशान चल रहा था। दलाल के जरिए वह डॉ. अमित से मिला। उसे किडनी के एवज में 45 हजार रुपए देने की डील कर ली।

इसी तरह एसएमएस हॉस्पिटल में भर्ती आंध्र प्रदेश निवासी सलीम खां और हुसैन को बहन की शादी के लिए पैसों की जरूरत थी। उसे भी अमित ने किडनी के बदले 45-45 हजार रुपए ऑफर किए। लेकिन किडनी निकालने के बाद भी भुगतान नहीं किया।

डोनर के शरीर से किडनी निकालने का काम अमित प्राइवेट क्लिनिक पर ही करता था। फिर उसे विदेशियों के शरीर में ट्रांसप्लांट करता था।

रिपोर्ट में बताया कि जयपुर स्थित सुरेश गुप्ता के नर्सिंग होम में उनकी किडनी निकाल ली गई। मामले में अमित कुमार, उसके भाई जीवन, मुंबई के एक डॉक्टर बसंत फाड़िया, डॉ. गुप्ता, और एक नर्स सीमा सईद नामजद थे। इसके बाद पुलिस अमित को पकड़कर लाई। जमानत पर बाहर आने के बाद वह कनाडा भाग गया। फिर जब सीबीआई ने जांच की तो खुलासा हुआ कि उसने किडनी के 600 से अधिक अवैध प्रत्यारोपण किए हैं।

उसके खिलाफ अवैध तरीके से अंग प्रत्यारोपण, हत्या के प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र के 49 से ज्यादा आपराधिक मामले देश भर के कई थानों में दर्ज किए गए। आधे दशक तक जेल में रहा। कोई भी जेल उसे लंबे समय तक नहीं रोक पाई। दो वर्ष पहले ही उसे देहरादून कोर्ट ने जमानत दी है। तब से वह बाहर बताया जा रहा है। यही कारण है कि जयपुर पुलिस का शक डॉ. अमित के ही नेटवर्क पर फिर से गहरा गया है।

वारदात के तरीके एक समान हैं…

1) डॉ. अमित के खिलाफ हुई जांच रिकॉर्ड में दर्ज है कि वह जयपुर में सर्जरी करता था। डोनर की किडनी निकालकर गुड़गांव में शिफ्ट कर देता था। हाल में हुए खुलासे में भी यही सामने आया है। जयपुर के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में बांग्लादेशी युवक की किडनी निकाली गई। फिर उसे गुरुग्राम के होटल में शिफ्ट कर दिया गया।

2) डॉ. अमित ने तुर्की (अब तुर्किये) के 3 नागरिकों की किडनी ट्रांसप्लांट की थी, जिनकी क्रमशः वर्ष 2003, 2004 और 2005 में मौत हो गई थी। मुकदमा दर्ज होने के बाद फरीदाबाद पुलिस की जांच में सामने आया कि उन्हें काफी समय तक 5 स्टार होटल में रखा जा रहा था। इनका प्री और पोस्ट ट्रीटमेंट तो फोर्टिस एस्कॉट्‌र्स हॉस्पिटल (दिल्ली) में हुआ, लेकिन किडनी डॉ. अमित ने मकान नंबर 4374, सेक्टर 23, गुड़गांव में स्थित एक क्लिनिक पर ट्रांसप्लांट की थी।

वर्तमान में जो नेटवर्क पकड़ा गया है, उसमें भी ऐसा ही है। किडनी डोनर और जिसे किडनी लगाई गई, दोनों ही बांग्लादेशी हैं। दोनों को ही गुरुग्राम के किसी होटल में ठहराया गया था। जयपुर में अवैध तरीके से एनओसी प्राप्त कर किडनी बदली गई। बाद में दोनों को फिर से गुरुग्राम शिफ्ट कर दिया गया।

जयपुर के सोडाला थाने में दर्ज 1995 की एफआईआर से संबंधित पेपर।

3) डॉ. अमित और उसका भाई जीवन जयपुर के कई नामी-गिरामी डॉक्टरों के संपर्क थे। जयपुर में डॉ. उपेंद्र अग्रवाल (एमबीबीएस) दलालों के नेटवर्क के जरिए डॉ. अमित को किडनी डोनर उपलब्ध करवाता था। हाल ही में पकड़े गए किडनी रैकेट में भी डॉक्टरों और नामी सर्जन की शह पर डोनर उपलब्ध करवाए जाते थे। ये डॉक्टर अवैध रूप से किडनी प्रत्यारोपण करने वाले गिरोह के संपर्क में थे। डोनर और क्लाइंट अरेंज करने में उनका नाम सामने आया है।

4) डॉ. अमित ऐसा डोनर ढूंढता था जो गरीब हो, पैसों की सख्त जरूरत हो और पैसा नहीं देने पर विरोध नहीं करे। वर्तमान में सामने आए गिरोह के तार गरीब देशों में शुमार बांग्लादेश, नेपाल से जुड़े हैं। एसएमएस हॉस्पिटल के कर्मचारी गौरव सिंह, प्राइवेट हॉस्पिटल के कोऑर्डिनेटर के कब्जे से जो एनओसी मिली हैं, वो भी ज्यादातर नेपाल, बांग्लादेश, क्यूबा, कंबोडिया के डोनर की हैं।

डॉ. अमित के भाई डॉ. जीवन भी इस रैकेट में उसका साथी था।

5) सीबीआई चार्जशीट के मुताबिक, डॉ. अमित और उसके सहयोगियों के खातों में विदेशों से ट्रांजेक्शन की डिटेल मिली थी। वर्तमान में सक्रिय गिरोह के तार बांग्लादेश और नेपाल से जुड़े बताए जा रहे हैं। पुलिस इस मामले में डॉक्टर, डोनर से लेकर मरीजों के विदेशों में स्थित बैंक खातों के बारे में पता लगा रही है। ताकि लेन-देन के बारे में पुख्ता जानकारी प्राप्त की जा सके।

जयपुर पुलिस कमिश्नर बीजू जॉर्ज जोसेफ कहते हैं- किडनी निकालने का अवैध कारोबार चल रहा था। गुरुग्राम से इसका कनेक्शन सामने आया है। शहर में दो दशक पहले अमित कुमार नामक व्यक्ति ने अवैध रूप से किडनी ट्रांसप्लांट की वारदात अंजाम दिया था। पुलिस की ओर से उनके बारे में पता लगाया जा रहा है। ताकि रैकेट की कार्यशैली का मिलान किया जा सके।

डॉ. अमित दलालों के जरिए गरीब मजदूरों को पैसों का लालच देकर किडनी डोनेशन के लिए तैयार करता था

डॉ. अमित की गैंग का ये था डोनर ढूंढने का तरीका

डॉ. अमित के गुर्गे मंदिरों के बाहर, पुलों के नीचे और झुग्गियों के आसपास भिखारियों, रिक्शा चालकों और प्रवासी मजदूरों को अपने जाल में फंसाते थे। तीन सौ से एक हजार डॉलर के बीच पैसा देने की डील कर किडनी देने के लिए तैयार कर लेते थे। इस गैंग की अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, विदेशी वाणिज्य दूतावास और टैक्सी ड्राइवरों तक भी पहुंच थी। गैंग से जुड़े लोग उन्हें प्रति ग्राहक अच्छा कमीशन देने की पेशकश करके अपने धंधे में शामिल कर लेते थे।

जयपुर से जमानत के बाद भागा कनाडा, लौटकर फिर शुरू किया रैकेट

जयपुर में 1996 में गिरफ्तारी के बाद वह जमानत पर बाहर आकर कनाडा भाग गया था। फिर वर्ष 1999 के आसपास भारत लौटा और अपने भाई जीवन की मदद से गुड़गांव (अब गुरुग्राम) में प्राइवेट हॉस्पिटल शुरू किया। वहां भी अवैध किडनी प्रत्यारोपण करने लगा।

किडनी रैकेट के संचालन की जानकारी मिलने पर दिल्ली पुलिस ने वर्ष 2000 में अमित को और जयपुर से डोनर भेजने वाले डॉ. उपेंद्र को गिरफ्तार कर लिया। रैकेट के आधिकारिक तौर पर खुलासा होने से पहले ही अमित ने एक एएसआई को 19.85 लाख रुपए की रिश्वत देकर उपेंद्र को छुड़वा लिया ताकि राज नहीं खुल जाए। वर्ष 2008 में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई।

किडनी रैकेट के मास्टरमाइंड अमित को हिमाचल प्रदेश पुलिस ने 2017 में आखिरी बार गिरफ्तार किया था। अब उस मामले में वह जमानत पर बाहर है।

गिरफ्तारी के लिए विदेश मंत्री को करनी पड़ी थी नेपाल के पीएम से बात

एक सप्ताह की लंबी धरपकड़ के बाद, सीबीआई ने अमित को नेपाल के एक सुदूर वन्यजीव रिसॉर्ट में पकड़ा था। बताया जाता है तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए सीधे नेपाल के प्रधानमंत्री जीपी कोइराला को फोन किया था। अप्रैल 2008 में सीबीआई ने अमित, उसके भाई जीवन, डॉ. उपेंद्र अग्रवाल, एक नर्स, एक एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और एक ड्राइवर सहित छह अन्य के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था।

वर्ष 2013 में सीबीआई कोर्ट ने अमित, उपेंद्र और तीन अन्य को दोषी ठहराया। कानूनी खामियों का फायदा उठाकर अमित फिर से बाहर आया। वर्ष 2016 में एक बार फिर अमित का घिनौना चेहरा सामने आया। फिर पकड़ा गया और एक बार फिर जमानत पर बाहर है।

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