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केंद्र और कोस्ट गार्ड को सुप्रीम कोर्ट की फटकार:कहा- महिलाओं को स्थायी कमीशन दें, वर्ना हम देंगे; नारी शक्ति की बातें अमल में लाएं

सुप्रीम कोर्ट कोस्ट गार्ड से निकाली गई शॉर्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर प्रियंका त्यागी की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय कोस्ट गार्ड (ICG) को एक महिला अफसर को नौकरी से निकालने के लिए फटकार लगाई। कोस्ट गार्ड ने महिला अफसर प्रियंका त्यागी को 2021 में शॉर्ट सर्विस कमीशन ऑफिसर के रूप में निकाल दिया था। कोर्ट ने कोस्ट गार्ड से कहा कि महिला अफसर को फिर से फोर्स में शामिल करना चाहिए।

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन न देने के कोस्ट गार्ड के फैसले की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने आर्मी, एयरफोर्स और नेवी में महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन दिए जाने को लेकर अपने ही फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि ये भेदभाव खत्म होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि हमें इस मामले में पथ प्रदर्शक बनना होगा और देश के साथ चलना होगा। पहले महिलाएं वकालत नहीं कर सकती थीं, फायटर पायलट्स नहीं बन सकती थीं। लैंगिक समानता लाने की राह में जो रुकावटें आ रही हैं, उन्हें हमें दूर करना ही होगा।

कोर्ट का आदेश- जिस पद से बर्खास्त किया, उसी पर फिर से नौकरी दें
कोर्ट ने कोस्ट गार्ड से कहा कि क्या आप महिला अफसरों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं? आप प्रियंका त्यागी को उसी पद पर फिर से नौकरी दें, जिस पद से उन्हें 2023 में बर्खास्त किया गया था। आगे के आदेश आने तक याचिकाकर्ता को उसकी योग्यता के अनुसार सही पोस्टिंग दी जाए।

कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेंडिंग पड़ी प्रियंका त्यागी की याचिका को अपने पास ट्रांसफर कर लिया। याचिकाकर्ता ने कोस्ट गार्ड में शॉर्ट सर्विस कमीशन वाली महिला अफसरों के लिए परमानेंट कमीशन की मांग की है।

कोर्ट बोला- आर्मी, एयरफोर्स, नेवी की कोस्ट गार्ड से तुलना गलत नहीं
कोस्ट गार्ड की तरफ से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने तर्क दिया कि कोस्ट गार्ड की तुलना आर्मी, एयरफोर्स और नेवी से करना गलत होगा। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। CJI ने कहा कि हम पहले ही आर्मी, नेवी और एयरफोर्स में परमानेंट कमीशन के मामले में अपना फैसला दे चुके हैं। अफसोस की बात है कि भारतीय कोस्ट गार्ड इससे अछूता रह गया। देखिए, महिलाओं को कोस्ट गार्ड जॉइन करने के लिए कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि वे जेंडर इक्वालिटी का विरोध नहीं करते हैं, वे सिर्फ इस केस से जुड़े तथ्य और बदलाव की स्थिति में फोर्स की तैयारियों की जानकारी साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी बदलाव को लागू करने की एक व्यवस्थित प्रकिया होती है। मैं सिर्फ ये बता रहा हूं कि इसे हम किस तरह मैनेज करेंगे।

इस पर CJI ने कहा कि पहले कहा जाता था कि महिलाओं को नेवी जॉइन नहीं करनी चाहिए, क्योंकि नेवी में महिलाओं के लिए टॉयलेट नहीं होते हैं। लेकिन, अब महिलाएं नेवी जॉइन कर रही हैं।

कोर्ट बोला- महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन दे केंद्र
इंडियन कोस्ट गार्ड ने पहले कहा था कि वह अधिक महिला अफसरों को शामिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, उसने कोर्ट को ये भी बताया कि शॉर्ट सर्विस कमीशन अफसरों से संबंधित मौजूदा रिक्रूटमेंट रूल साफतौर पर कहते हैं कि महिलाएं परमानेंट कमीशन की मांग नहीं कर सकती हैं।

इस तर्क पर बेंच ने कहा कि ये सभी तर्क 2024 में कोई अर्थ नहीं रखते हैं। महिलाओं को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता है। अगर आप सही नियम नहीं बनाएंगे, तो हम बनाएंगे। आप नारी शक्ति की बात करते हैं, अब इसे यहां दिखाइए। आप इस मामले में गहरे पानी में हैं। आपको ऐसे नियम बनाने होंगे जो महिलाओं के साथ बराबरी का व्यवहार करें। इस टिप्पणी के साथ बेंच ने केंद्र को आदेश दिया कि कोस्ट गार्ड में महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन दिया जा सुनिश्चित करें।

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शादी के बाद महिला को नौकरी से निकालना लैंगिक असमानता:पूर्व आर्मी नर्स के पक्ष में SC का फैसला; केंद्र को आदेश- 60 लाख मुआवजा दें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शादी के आधार पर महिलाओं को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता है। शादी करने की वजह से महिलाओं को नौकरी से निकाल देने वाले नियम असंवैधानिक और पितृसत्तात्मक हैं। दरअसल, आर्मी नर्स सेलिना जॉन को आर्मी नर्सिंग सर्विस ने शादी करने की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को 60 लाख रुपए का मुआवजा याचिकाकर्ता सेलिना जॉन को देने का आदेश दिया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

SC ने PIB की फैक्ट चेक यूनिट पर रोक लगाई:कहा- ये अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ; केंद्र ने एक दिन पहले ही नोटिफाई किया था

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के अंतर्गत फैक्ट चेक यूनिट (FCU) का गठन करने वाली केंद्र सरकार की अधिसूचना पर रोक लगा दी। केंद्र ने एक दिन पहले बुधवार यानी 20 मार्च को ही IT यानी सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत फैक्ट चेक यूनिट को नोटिफाई किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘यह यूनिट अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है।’ यह फैक्ट चेक यूनिट केंद्र सरकार के बारे में सोशल मीडिया में वायरल हो रही फर्जी सूचनाओं और पोस्ट की पहचान करने के साथ उसे प्रतिबंधित करने के लिए बनाई जानी थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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