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165 साल तक बिना शंकराचार्य के रही बद्रीकाश्रम पीठ:चयन के लिए जगतगुरु की किताब से बने सख्त नियम, पदवी को लेकर आज भी विवाद जारी

प्रयागराज माघ मेला प्रशासन के नोटिस के बाद उत्तराखंड में स्थित ज्योतिषपीठ (बद्रीकाश्रम) के शंकराचार्य पद का विवाद फिर चर्चा में आ गया है। प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से सवाल किया है कि वे सार्वजनिक तौर पर अपने नाम के आगे “शंकराचार्य” क्यों लिख रहे हैं।

असल में ज्योतिषपीठ का विवाद कोई नया नहीं है। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने चारों पीठों के लिए पहले से नियम तय कर दिए थे और इसके लिए उन्होंने ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ नाम का ग्रंथ भी लिखा था, लेकिन इसके बावजूद यह पीठ लंबे समय तक विवाद और दावों में उलझी रही।

स्वामी रामकृष्ण तीर्थ के निधन के बाद यह पीठ करीब 165 साल तक निष्क्रिय रही, यानी शंकराचार्य पद लंबे समय तक खाली ही रहा। इसी खालीपन और खींचतान की वजह से कई दावेदार सामने आए और मामला कोर्ट तक पहुंचा। इस स्टोरी में हम बताएंगे कि ज्योतिषपीठ का विवाद कैसे शुरू हुआ और आजादी से पहले यानी 1941 में इसे थामने के लिए शंकराचार्य की किताब से कैसे चयन के नियम तय किए गए।

165 सालों के बाद 1941 में स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को बद्रिकाश्रम का शंकराचार्य नियुक्त किया गया।

पहले बद्रिकाश्रम और पद का विवाद समझिए…

पद खाली हुआ तो कई दावे सामने आए

उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित बद्रिकाश्रम आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से एक माना जाता है। इसे उत्तराम्नाय मठ या उत्तरी आम्नाय पीठ भी कहा जाता है। इस पीठ पर 18वीं शताब्दी में स्वामी रामकृष्ण तीर्थ आसीन थे, लेकिन उनके निधन के बाद यह मठ करीब 165 वर्षों तक निष्क्रिय रहा।

इस लंबे अंतराल में शंकराचार्य उपाधि को लेकर कई गुरुओं ने दावा किया और दावेदारों व उनके प्रतिनिधियों की ओर से मुकदमे भी चलते रहे। यह विवाद 1900 के दशक से कानूनी रूप में भी सामने आने लगा था। एक समय ऐसा भी आया जब बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल को भी कुछ लोगों ने वहां शंकराचार्य उपाधि धारण करने वाला माना।

स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती लंबे अंतराल के बाद शंकराचार्य बने

ज्योतिष्पीठ पर औपचारिक अधिकार की शुरुआत तब मानी गई, जब अन्य तीन मठों के नेताओं ने स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को यह पद स्वीकार करने के लिए राजी किया। इसके बाद 11 मई 1941 को वाराणसी स्थित भारत धर्म महामंडल (बीडीएम) के विद्वानों के समूह ने स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की नियुक्ति की। इस चयन को उस समय पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ और श्रृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखर भारती ने स्वीकार किया।

इसके साथ ही गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा के शासकों जैसे धार्मिक संस्थानों के सम्मानित समर्थकों ने भी स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का समर्थन किया। उनकी मान्यता से पहले से मौजूद दावेदारों का विरोध कमजोर पड़ा और ब्रह्मानंद सरस्वती ने करीब 70 साल की उम्र में ये पदभार ग्रहण किया। ये विवाद दोबारा ना हो इसके लिए 1941 में ही ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ को आधार मानकर शंकराचार्य के चयन के लिए कुछ नियम बने जो अभी तक लागू हैं।

1941 में बद्रीकाश्रम शंकराचार्य बनने के लिए क्या नियम बने…

  • संन्यासी होना जरूरी: उम्मीदवार ने गृहस्थ जीवन छोड़कर विधिवत संन्यास लिया हो।
  • ब्राह्मण होना जरूरी: उम्मीदवार ‘ब्राह्मण’ हो। यहां ब्राह्मण का मतलब जाति नहीं, बल्कि गुण और आचरण के आधार पर माना गया है।
  • शास्त्रों का पूरा ज्ञान: उम्मीदवार को चारों वेदों और छह वेदांगों का पूरा ज्ञान होना चाहिए।
  • शास्त्रार्थ में निपुण: वह विद्वानों के साथ धार्मिक चर्चा और शास्त्रार्थ में सक्षम हो।
  • जितेंद्रिय और पवित्र चरित्र: उम्मीदवार इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला हो और तन-मन से शुद्ध व पवित्र जीवन जीता हो।
  • अन्य पीठों की मान्यता जरूरी: चयन को पुरी और श्रृंगेरी पीठ के तत्कालीन शंकराचार्यों का समर्थन और अनुमोदन मिलना जरूरी माना गया।
  • काशी विद्वत परिषद की मुहर जरूरी: चयन प्रक्रिया में काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति/मुहर को अनिवार्य माना गया।
  • अखाड़ों-संतों की सहमति जरूरी: प्रमुख अखाड़ों के महामंडलेश्वर और संतों की सहमति भी जरूरी मानी गई।

शंकराचार्य पीठों का संविधान है ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’

आदि शंकराचार्य ने देश में शंकराचार्य की चार प्रमुख पीठों की स्थापना की थी। माना जाता है कि उन्हें आगे चलकर परंपरा और उत्तराधिकार को लेकर विवाद होने की आशंका रही होगी। इसी वजह से उन्होंने शंकराचार्य पीठों के लिए एक तरह का “संविधान” भी लिखा, जिसमें स्पष्ट नियम और व्यवस्था बताई गई। इस ग्रंथ में कुल 73 श्लोक हैं और इसे ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ के नाम से जाना जाता है।

आदि शंकराचार्य द्वारा संस्कृत भाषा में रचित इस ग्रंथ में श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिषपीठ जैसे शंकराचार्य मठों के स्वरूप और व्यवस्थाओं का उल्लेख है। इसमें मठों की व्यवस्था, आचार्यों के चुनाव की प्रक्रिया, पीठ पर आसीन होने वाले आचार्य के लिए जरूरी शास्त्रीय ज्ञान, गुण और आध्यात्मिक नियमों का विवरण दिया गया है। इसी मूल संविधान को ‘मठाम्नाय सेतु’ या ‘महानुशासन’ के नाम से भी जाना जाता है।

‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ में है चार मठों का जिक्र

अब अविमुक्तेश्वरानांद के बारे में और उनके विवाद के बारे में जानिए…

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