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अमित शाह ने स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया:गृहमंत्री ने कहा- भारत में एक बूंद खून बहाए बिना सत्ता परिवर्तन होता रहा है

गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को दिल्ली विधानसभा में ऑल इंडिया स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया। यह कॉन्फ्रेंस दो दिन चलेगी। इसमें 29 राज्यों की विधानसभाओं के स्पीकर और छह राज्यों की विधान परिषदों के सभापति और उपसभापति शामिल हुए हैं।

कॉन्फ्रेंस में अलावा राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार और कई केंद्रीय कैबिनेट मंत्री भी शामिल होंगे। दिल्ली विधानसभा स्पीकर विजेंदर गुप्ता ने बताया कि 24 अगस्त, 1925 को विट्ठलभाई पटेल सेंट्रल असेंबली के पहले भारतीय स्पीकर चुने गए थे। इसके 100 साल पूरे होने पर यह कॉन्फ्रेंस हो रही है।

अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा-

जब हमारा देश आजाद हुआ तो चर्चा होती थी। लोग मखौल उड़ाते थे कि देश कैसे चलाएंगे। मगर आज मैं गौरव के साथ इस ऐतिहासिक सदन में कह रहा हूं कि हमने 80 साल में लोकतंत्र की नींव को पाताल से गहरा डालने का काम किया है। और हमने सिद्ध किया है कि भारतीय जनता की रग-रग में, भारतीय जनता के स्वभाव में लोकतंत्र है। क्योंकि, कई देश हमने देखें हैं, जिनकी शुरुआत तो लोकतांत्रिक तरीके से हुई। मगर एक दशक, दो दशक, तीन दशक, चार दशक होते होते लोकतंत्र की जगह अलग-अलग प्रकार का काम होने लगा।

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कई सारे देशों में परिवर्तने के लिए खून बहा, युद्ध और विद्रोह हुए। खून बहा। लेकिन भारत एकमात्र ऐसा देश हैं, जहां आजादी के 80 साल बाद भी संवैधानिक तरीके और बिना खून की एक बूंद बहाए बिना सत्ता परिवर्तन होते रहे हैं।

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केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का स्वागत करती हुईं दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता।

जब भी सभाओं ने अपनी गरिमा खोई, बुरे परिणाम भुगतने पड़े

अपने राजनीतक हितों के लिए संसद में वाद-विवाद न होने देना गलत है। पूरे-पूरे दिन सत्र को न चलने देने पर हमें विचार करना होगा। जब-जब भी सभाओं ने अपनी गरिमा खोई है तो बहुत बुरे परिणाम हमें भुगतने पड़ें हैं। इस मौके पर मैं आपको महाभारत की हस्तिनापुर की सभा का उदाहरण देना चाहता हूं। जब सभा में स्त्री का सम्मान नहीं हुआ, तब ही महाभारत हुई थी।

सभाओं की गरिमा देश के हित में जनता की आवाज बनने का माध्यम होना चाहिए। इसलिए सभापति को हमारे यहां इंस्टीट्यूशन का स्टेटस दिया गया है। सभापति अपने आपमें एक संस्था होता है। सभापति चुनकर तो आते हैं एक राजनीतिक दल से। वे आते तो हैं एक राजनीतिक विचारधारा से संबंध होकर।

लेकिन सभापति की शपथ लेते ही उनको अंपायर के नाते काम करना होता है। इसलिए सबसे कठिन भूमिका पूरी असेंबली में किसी को होती है तो वो सभापति की होती है।

मैं आज गौरव के साथ कह सकता हूं भारतीय आजादी के इस 80 साल में और हमारे संविधान के 75 साल में हमारे देश भर की असेंबलीज, विधानसभाएं और लोकसभा में हमेशा सभापतियों ने विधानसभा और लोकसभा में भारत के गौरव को आगे बढ़ाने का काम किया है। और हमारे लोकतंत्र को हमने मजबूत किया है।

दिल्ली विधानसभा में कॉन्फ्रेंस होने की खास वजह

दिल्ली विधानसभा की मौजूदा इमारत 1912 में बनी थी। इसे ई मोंटेग थॉमस ने डिजाइन किया था।

इस मौके पर भारत के पहले चुने गए स्पीकर विट्ठलभाई पटेल की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में डाक टिकट भी जारी किया जाएगा। कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे।

ऑल इंडिया स्पीकर्स कॉन्फ्रेंस दिल्ली विधानसभा में आयोजित किए जाने की भी एक खास वजह है। जिस सफेद इमारत में दिल्ली की मौजूद विधानसभा है, अंग्रेजी शासन के दौरान वह सेंट्रल असेंबली हुआ करती थी।

इसी जगह भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दो बम फेंके थे। इस घटना का मकसद किसी को मारना या नुकसान पहुंचाना नहीं था। बम में विस्फोटक के साथ धुआं पैदा करने वाले पदार्थ ही थे।

इसका मकसद ब्रिटिश सरकार तक अपनी बात पहुंचाना था। यही वजह थी कि बम फेंकने के बाद दोनों क्रांतिकारियों वहां से भागे नहीं बल्कि इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए गिरफ्तारी दी थी।

बम कांड में दोषी पाए जाने पर दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। बटुकेश्वर दत्त को अंडमान-निकोबार की सेल्यूलर जेल (काला पानी) भेजा गया था। वहीं, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या मामले में 24 मार्च, 1931 दी गई थी।

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