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दलाई लामा का 90वां जन्मदिन, बोले- 130 साल जीना है:PM मोदी ने प्रेम-करुणा का प्रतीक बताया; अमेरिका के 3 पूर्व राष्ट्रपतियों का VIDEO संदेश आया

दलाई लामा का 90वां जन्मदिन, बोले- 130 साल जीना है:PM मोदी ने प्रेम-करुणा का प्रतीक बताया; अमेरिका के 3 पूर्व राष्ट्रपतियों का VIDEO संदेश आया

धर्मशाला1 घंटे पहले
धर्मशाला में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के 90वें जन्मदिन पर हुई प्रार्थना सभा।

हिमाचल के धर्मशाला में रविवार, 6 जुलाई को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा का 90वां जन्मदिन मनाया जा रहा है। इस अवसर पर धर्मशाला स्थित त्सुगलाखंग मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु, तिब्बती समुदाय के लोग, बौद्ध भिक्षु और अंतरराष्ट्रीय अनुयायी एकत्र हुए। तिब्बती संगीत, नृत्य और पारंपरिक पूजा-अर्चना का आयोजन हुआ।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, सिक्किम के धार्मिक मंत्री सोनम, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे, आदि मौजूद हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने दलाई लामा को शुभकामनाएं देते हुए अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा- 1.4 अरब भारतीयों की ओर से मैं परम पूज्य दलाई लामा को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। वह प्रेम, करुणा, धैर्य और नैतिक अनुशासन का प्रतीक हैं।

इसके अलावा, अमेरिका के 3 पूर्व राष्ट्रपतियों, बराक ओबामा, बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश का वीडियो संदेश भी चलाया गया, जिसमें वे दलाई लामा को शांति का प्रतीक बताते नजर आए। उन्होंने दलाई लामा को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं।

वहीं, जन्मदिन से एक दिन पहले शनिवार को दलाई लामा ने कहा था कि वह 130 साल या उससे अधिक जीवित रहना चाहते हैं। उनका उद्देश्य बौद्ध धर्म और तिब्बती समाज की सेवा करना है। उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर से गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस होता है।

दलाई लामा ने कहा कि वह हर सुबह अवलोकितेश्वर के बारे में सोचकर दिन की शुरुआत करते हैं। उनकी वर्तमान शक्ति और धैर्य अवलोकितेश्वर के आशीर्वाद का परिणाम है।

धर्मशाला के मैक्लोडगंज के त्सुगलाखंग बौद्ध मठ में दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित समारोह में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू, केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन, हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गेरे समेत अन्य नामचीन लोग मौजूद रहे।

बचपन में ही पहचान ली गई थी दलाई लामा की महानता दलाई लामा का असली नाम ल्हामो धोन्डुप था, जिन्हें बाद में तेन्जिन ग्यात्सो नाम से जाना गया। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के ताक्सर गांव (अमदो क्षेत्र) में हुआ। केवल दो वर्ष की आयु में ही उन्हें 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में पहचाना गया।

1939 में उन्हें तिब्बत की राजधानी ल्हासा लाया गया और 22 फरवरी 1940 को पारंपरिक, धार्मिक और राजनीतिक अनुष्ठानों के साथ उन्हें तिब्बत का सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। मात्र 6 साल की उम्र में उन्होंने बौद्ध दर्शन, तंत्र, संस्कृत, तर्क और अन्य शास्त्रों की पढ़ाई शुरू कर दी थी।

1959 में भारत आए, यहीं से दे रहे हैं शांति का संदेश 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर हमला किया, तब महज 15 वर्ष की आयु में दलाई लामा को राजनीतिक जिम्मेदारी उठानी पड़ी। इसके बाद मार्च 1959 में तिब्बत में राष्ट्रीय विद्रोह को जब बेरहमी से दबा दिया गया, तो दलाई लामा को 80 हजार से अधिक तिब्बती शरणार्थियों के साथ भारत आना पड़ा।

भारत सरकार ने उन्हें धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में शरण दी, जहां से उन्होंने तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना की। तब से लेकर आज तक दलाई लामा भारत को अपना आध्यात्मिक और सांस्कृतिक घर मानते हुए यहीं निवास कर रहे हैं और शांति, करुणा, सहिष्णुता और सार्वभौमिक मानवता का संदेश पूरी दुनिया में फैला रहे हैं।

दलाई लामा ने 130 साल तक जीने की इच्छा जताई।

1989 में मिला था नोबेल शांति पुरस्कार दलाई लामा को दुनियाभर में शांति, अहिंसा और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। साल1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने दुनिया के कई देशों में यात्राएं कर लोगों को करुणा, संवाद और आंतरिक शांति के महत्व को समझाया है।

वर्तमान में वह वैश्विक मंचों पर प्राचीन भारतीय ज्ञान- विशेषकर बुद्ध धर्म, योग, ध्यान और मन की प्रकृति की शिक्षा देकर मनोविज्ञान और भावनात्मक संतुलन को लेकर नई दिशा दे रहे हैं।

भारत से उनका विशेष संबंध दलाई लामा ने कई बार कहा है कि वह भारत को न केवल अपनी शरणस्थली, बल्कि “गुरु का देश” मानते हैं। उनका कहना है, “मेरे शरीर का पोषण भारत के भोजन से हुआ है और मेरा मन प्राचीन भारतीय ज्ञान से प्रेरित है।” उन्होंने यह भी कहा कि वह मानव मूल्यों, धार्मिक सौहार्द और आंतरिक शांति को जीवन का उद्देश्य मानते हुए कार्य करते रहेंगे।

व्यायाम और संतुलित जीवन में छिपे हैं दलाई लामा की सेहत के राज…

  • सादा दिनचर्या जीवन का सूत्र: दलाई लामा 90 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन उनका स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन चौंकाने वाला है। वह इसका श्रेय अपनी सादा दिनचर्या, सीमित आहार और माइंडफुलनेस को देते हैं। इसे वह जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मानते हैं।
  • सुबह 3 बजे दिन की शुरुआत: दलाई लामा का दिन सुबह 3 बजे शुरू हो जाता है। स्नान के बाद वह प्रार्थना और ध्यान में लीन हो जाते हैं। सुबह 5 बजे तक साधना और फिर हल्की सैर करते हैं। बारिश के दिनों में ट्रेडमिल का सहारा लेते हैं। सुबह साढ़े 5 बजे वह सादा नाश्ता करते हैं, जिसमें दलिया, साम्पा (जौ का पाउडर), ब्रेड और चाय शामिल होती है। इसी दौरान वह न्यूज भी सुनते हैं।
  • दोपहर तक पढ़ाई, शाम तक काम: सुबह 6 से 9 बजे तक वह फिर ध्यान और मंत्र जाप करते हैं। 9 बजे के बाद बौद्ध ग्रंथों और पुराने लेखों का अध्ययन करते हैं। सुबह साढ़े 11 बजे शाकाहारी भोजन करते हैं। दोपहर साढ़े 12 से साढ़े 3 बजे तक ऑफिस वर्क, मुलाकातें और इंटरव्यू होते हैं।
  • रात को भोजन नहीं करते: शाम 5 बजे दलाई लामा चाय पीते हैं और फिर ध्यान करते हैं। वह रात का भोजन नहीं करते। यह बौद्ध मठ अनुशासन का हिस्सा है। फिर शाम 7 बजे वह विश्राम के लिए चले जाते हैं।
  • तन-मन की सेहत का राज: दलाई लामा का मानना है कि “हर पल को पूरी सजगता से जीना ही असली ध्यान है”। उनके मुताबिक, केवल ध्यान में बैठना ही नहीं, बल्कि जीवन के हर काम में संतुलन और जागरूकता जरूरी है। यही उन्हें मानसिक रूप से स्थिर और स्वस्थ बनाए रखता है।

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