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RSS मुखपत्र में लिखा-स्वार्थ के लिए मंदिर का प्रचार गलत:इसे राजनीति का हथियार न बनाएं; भागवत ने कहा था- मंदिर-मस्जिद विवाद सही नहीं

RSS मुखपत्र में लिखा-स्वार्थ के लिए मंदिर का प्रचार गलत:इसे राजनीति का हथियार न बनाएं; भागवत ने कहा था- मंदिर-मस्जिद विवाद सही नहीं

नई दिल्ली7 घंटे
संघ प्रमुख मोहन भागवत 19 दिसंबर को पुणे में एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। यहां उन्होंने कहा था भारत को दिखाने की जरूरत है कि हम एक साथ रह सकते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुखपत्र पांचजन्य ने मंदिर-मस्जिद विवाद पर RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान का समर्थन किया है। पांचजन्य ने संपादकीय में लिखा कि कुछ लोग अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए मंदिरों का प्रचार कर रहे हैं और खुद को हिंदू विचारक के रूप में पेश कर रहे हैं।

पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने संपादकीय ‘मंदिरों पर यह कैसा दंगल’ में लिखा- मंदिरों का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं है। इसे राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए। भागवत का बयान गहरी दृष्टि और सामाजिक विवेक का आह्वान है।

मोहन भागवत ने 19 दिसंबर को पुणे में कहा था कि राम मंदिर के निर्माण के बाद कुछ लोगों को लगता है कि वे नई जगहों पर इस तरह के मुद्दे उठाकर हिंदुओं के नेता बन सकते हैं। हर दिन एक नया मामला उठाया जा रहा है। इसकी इजाजत कैसे दी जा सकती है? भारत को दिखाने की जरूरत है कि हम एक साथ रह सकते हैं।

हालांकि, RSS के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने मोहन भागवत से अलग राय रखी थी। पत्रिका ने इसे ऐतिहासिक सच जानने और सभ्यतागत न्याय की लड़ाई कहा था।

मोहन भागवत ने यह बयान 19 दिसंबर को पुणे में दिया था।
5 पॉइंट में पांचजन्य का संपादकीय

भागवत के बयान के बाद मीडिया में लड़ाई जैसी स्थिति पैदा हो गई है। या तो यह जानबूझकर बनाई जा रही है। एक स्पष्ट बयान से कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। भागवत का बयान समाज से इस मुद्दे पर समझदारी से निपटने की एक स्पष्ट अपील थी।
इन मुद्दों पर अनावश्यक बहस और भ्रामक प्रचार को बढ़ावा देना चिंताजनक है। सोशल मीडिया ने इसे और बढ़ाया है। कुछ असामाजिक तत्व खुद को सामाजिक समझदार मानते हैं। वे सोशल मीडिया पर समाज की भावनाओं का शोषण कर रहे हैं। ऐसे असंगत विचारकों से दर रहना जरूरी है।
भारत एक सभ्यता और संस्कृति का नाम है, जो हजारों साल से विविधता में एकता का सिद्धांत न केवल सिखाता रहा है, बल्कि इसे जीवन में भी अपनाया है।
आज के समय में मंदिरों से जुड़े मुद्दों को राजनीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चिंताजनक है। सरसंघचालक ने इस प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह दृष्टिकोण दिखाता है कि हिंदू समाज को अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करते हुए राजनीतिक झगड़ों, व्यक्तिगत महिमामंडन और विवादों से बचना चाहिए।
भागवत का संदेश एक गहरी सामाजिक चेतना को जागृत करता है। यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास के घावों को कुरेदने के बजाय हमें अपने सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करते हुए समाज में सामंजस्य और सौहार्द की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।
ऑर्गनाइजर की राय अलग, कहा- धार्मिक वर्चस्व नहीं, सभ्यतागत न्याय की लड़ाई

RSS के अंग्रेजी मुखपपत्र ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने संपादकीय में लिखा था कि सोमनाथ से लेकर संभल और उससे आगे का ऐतिहासिक सत्य जानने की यह लड़ाई धार्मिक वर्चस्व के बारे में नहीं है। यह हमारी राष्ट्रीय पहचान की पुष्टि करने और सभ्यतागत न्याय की लड़ाई है।

पत्रिका ने कांग्रेस पर चुनावी लाभ के लिए जातियों का शोषण करने का आरोप लगाया। केतकर लिखते हैं कि कांग्रेस ने जातियों को सामाजिक न्याय दिलाने में देरी की। जबकि अंबेडकर जाति-आधारित भेदभाव के मूल कारण तक गए और इसे दूर करने के लिए संवैधानिक व्यवस्था की। पूरी खबर पढ़ें…

3 हिंदू धर्माचार्य भागवत का विरोध कर चुके हैं…

रामभद्राचार्य बोले- भागवत संघ के संचालक, हमारे नहीं

रामभद्राचार्य ने कहा था कि मोहन भागवत और हमारा क्षेत्र अलग-अलग है।
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने 23 दिसंबर को न्यूज एजेंसी PTI से बातचीत में कहा था कि संघ प्रमुख ने अच्छा नहीं कहा। संघ भी हिंदुत्व के आधार पर बना है। जहां-जहां मंदिर या मंदिर के अवशेष मिल रहे हैं, उन्हें हम लेंगे। वे (मोहन भागवत) संघ प्रमुख हैं, हम धर्माचार्य हैं। हमारा क्षेत्र अलग है, उनका अलग। वे संघ के सरसंघचालक हैं, हमारे नहीं। राम मंदिर पर बयान देना दुर्भाग्यपूर्ण है।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी उठाए सवाल

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने मोहन भागवत के बयान पर आपत्ति जताई थी।
ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संघ प्रमुख पर राजनीतिक सुविधा के अनुसार बयान देने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था- जब सत्ता हासिल करनी थी, तब वे मंदिर-मंदिर करते थे। अब सत्ता मिल गई तो मंदिर नहीं ढूंढने की नसीहत दे रहे हैं। अगर हिंदू समाज अपने मंदिरों का पुनरुद्धार कर उन्हें पुनः संरक्षित करना चाहता है तो इसमें गलत क्या है।

धर्म पर धार्मिक गुरु फैसले लें- जितेंद्रानंद सरस्वती
जितेंद्रानंद ने कहा था कि 56 स्थलों पर मंदिर संरचनाओं की पहचान की गई है।
अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने भी 23 दिसंबर को टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा था कि जब धर्म का मुद्दा उठता है तो धार्मिक गुरुओं को फैसला लेना होता है और वे जो भी फैसला लेंगे, उसे संघ और विहिप स्वीकार करेंगे।

पिछले 20 दिनों में भागवत के 3 बड़े बयान

22 दिसंबर: धर्म का अधूरा ज्ञान अधर्म करवाता है, गलत समझ के कारण अत्याचार हुए

RSS चीफ 22 दिसंबर को महाराष्ट्र के अमरावती में एक आयोजन में शामिल हुए थे।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि धर्म को समझना बहुत कठिन है। धर्म के नाम पर होने वाले सभी उत्पीड़न और अत्याचार गलतफहमी और धर्म की समझ की कमी के कारण हुए।

धर्म महत्वपूर्ण है, इसकी सही शिक्षा दी जानी चाहिए। धर्म का अनुचित और अधूरा ज्ञान अधर्म की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि धर्म सत्य का आधार है, इसलिए धर्म की रक्षा जरूरी है। संप्रदाय कभी लड़ना नहीं सिखाता, वह समाज को जोड़ता है। पूरी खबर पढ़ें…

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