इलाहाबाद हाईकोर्ट जज के खिलाफ महाभियोग के लिए नोटिस:राज्यसभा में 55 सांसदों ने हस्ताक्षर किए, कहा था-कठमुल्ले घातक
प्रयागराज/नई दिल्ली4 घंटे पहले
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने 8 दिसंबर को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में बयान दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिया है। प्रस्ताव पर 55 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर हैं। कपिल सिब्बल के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने महाभियोग प्रस्ताव पेश किया। प्रतिनिधिमंडल में सांसद विवेक तन्खा, दिग्विजय सिंह, पी. विल्सन, जॉन ब्रिटास और केटीएस तुलसी शामिल हैं।
8 दिसंबर को प्रयागराज में VHP की लीगल सेल के कार्यक्रम में जस्टिस शेखर यादव ने कहा था- मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यह हिंदुस्तान है और यह देश यहां रहने वाले बहुसंख्यकों की इच्छा से चलेगा। यह जो कठमुल्ला हैं, यह सही शब्द नहीं है, लेकिन कहने में परहेज नहीं है, क्योंकि वह देश के लिए बुरा है…घातक है। देश के खिलाफ हैं। जनता को भड़काने वाले लोग हैं। देश आगे न बढ़े, ऐसा सोचने वाले लोग हैं। उनसे सावधान रहने की जरूरत है।
जस्टिस शेखर यादव इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज हैं। वह 2026 में रिटायर होंगे।
महाभियोग में यह आरोप लगाया
महाभियोग प्रस्ताव में आरोप लगाया गया कि जस्टिस यादव का भाषण भड़काऊ, पूर्वाग्रही और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने वाला था। उन्होंने जज के रूप में पद की शपथ और संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का उल्लंघन किया। उनके इस कथन पर भी आपत्ति जताई गई कि मुस्लिम बच्चों से दयालुता की उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि वे छोटी उम्र में ही जानवरों के वध के संपर्क में आ जाते हैं। विभाजनकारी और पूर्वाग्रही बयान देकर जस्टिस यादव ने न्यायपालिका में जनता का विश्वास खत्म कर दिया।
पॉइंट वार महाभियोग की पूरी प्रक्रिया समझिए
संसद के किसी एक सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। प्रस्ताव को पेश करने के लिए एक निश्चित संख्या में सांसदों का समर्थन आवश्यक है।
लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों का समर्थन, जबकि राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है। प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति या लोकसभा स्पीकर के सामने पेश किया जाता है।
सभापति या स्पीकर प्रस्ताव की प्रारंभिक जांच के लिए जांच समिति का गठन करते हैं। समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाईकोर्ट के एक चीफ जस्टिस और एक विशिष्ट विधि विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
समिति जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट देती है। अगर समिति की रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है।
प्रस्ताव को पारित करने के लिए सदन के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। अगर एक सदन में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद संबंधित जज को उनके पद से हटा दिया जाता है।
क्या महाभियोग से जज को हटाया जा सकता है?
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज को महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217 में इसका जिक्र है। यह प्रक्रिया बहुत कठोर है। केवल जज के दुराचार या कर्म-अक्षमता के आधार पर ही इसे शुरू कर सकते हैं।
हालांकि, भाषण इस श्रेणी में नहीं आते। लेकिन उनको ख्याल रखना होता है कि बातों पर सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी करनी चाहिए या नहीं और किस स्तर तक, क्योंकि वो जिस संस्था से जुड़े हैं, वो न्याय से संबंधित है, जिसमें न्याय करना होता है।
अब तक किसी भी जज के खिलाफ नहीं हुई ऐसी कार्रवाई
जजों के खिलाफ महाभियोग पर नजर डालें तो स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज तक एक भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है।
नब्बे की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर महाभियोग लाया गया था, लेकिन यह लोकसभा में पास नहीं हो सका।
इसके बाद कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन के खिलाफ पैसों को लेकर प्रस्ताव आया था, लेकिन उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया।
2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया। उन पर विपक्षी दलों ने दुर्व्यवहार का आरोप लगाया। लेकिन तत्कालीन राज्यसभा सभापति ने उसे खारिज कर दिया।
जस्टिस के बयान पर किसने क्या कहा?
राज्यसभा सांसद और वकील कपिल सिब्बल ने कहा- जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाएंगे।
चंद्रशेखर आजाद: आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कहा- कठमुल्ला जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह न्यायपालिका की निष्पक्षता पर भी प्रश्न चिह्न लगाता है। ऐसे बयान समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा देते हैं, जो न्यायपालिका जैसे पवित्र संस्थान के लिए अक्षम्य है।
शलभ मणि त्रिपाठी: देवरिया से भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा, हमारे यहां बच्चा जन्म लेता है तो उसे ईश्वर की तरफ़ ले जाते हैं, वेद मंत्र बताते हैं, उनके यहां बच्चों के सामने बेजुबानों का बेरहमी से वध होता है, सैल्यूट है जस्टिस शेखर यादव, सच बोलने के लिए।
कपिल सिब्बल: राज्यसभा सांसद और वकील कपिल सिब्बल ने दिल्ली में कहा- यह भारत को तोड़ने वाला बयान है। जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाएंगे। राजनेता भी ऐसी बात नहीं करते। वे संविधान की रक्षा के लिए बैठे हैं। उनको ये शब्द शोभा नहीं देते। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को देखना चाहिए कि ऐसे लोग जज न बनें।
इससे पहले भी जस्टिस शेखर यादव चर्चा में रहे, उनकी 3 सलाह….
तस्वीर रविवार को प्रयागराज में हुए कार्यक्रम की है। 26 मार्च 2021 को जस्टिस शेखर यादव ने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।
1.) गोरक्षा ‘हिंदुओं का मौलिक अधिकार’ घोषित हो
1 सितंबर को 2021 को जस्टिस शेखर यादव ने कहा था- वैज्ञानिकों का मानना है कि गाय ही एकमात्र जानवर है जो ऑक्सीजन छोड़ती है। उन्होंने संसद से गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने और गोरक्षा को “हिंदुओं का मौलिक अधिकार” घोषित करने का भी आह्वान किया था।
2.) हिंदू धर्म पर बड़ा सुझाव देकर खड़ा किया था विवाद
अक्टूबर 2021 में जस्टिस शेखर यादव ने एक फैसले में विवादित सुझाव दिया था। सरकार से राम, कृष्ण, रामायण, गीता, महर्षि वाल्मीकि और वेद व्यास को राष्ट्रीय सम्मान और विरासत का दर्जा देने के लिए एक कानून लाने पर विचार करने के लिए कहा था।
यह भी कहा था कि भगवान राम हर नागरिक के दिल में निवास करते हैं। भारत उनके बिना अधूरा है। वह देवताओं की अश्लील तस्वीरें बनाने के आरोपी को जमानत पर फैसला दे रहे थे। उनका सुझाव यह भी था कि भारत की सांस्कृतिक विरासत पर बच्चों के लिए स्कूलों में अनिवार्य पाठ होने चाहिए।
3.) अकबर-जोधाबाई अंतर धार्मिक विवाह के अच्छे उदाहरण
अंतर-धार्मिक विवाह पर उनकी टिप्पणी सुर्खियां बन गईं थीं। जून 2021 में वह धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत एक आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उस पर एक लड़की के अपहरण और जबरन मुस्लिम धर्म कबूल कराने का आरोप था।
जज ने कहा था कि अगर बहुसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति अपमान के बाद अपने धर्म से धर्मांतरण करता है, तो देश कमजोर हो जाता है। अकबर और जोधाबाई को अंतर धार्मिक विवाह के अच्छे उदाहरण के रूप में बताया था।
अब जस्टिस शेखर कुमार यादव के बारे में जानिए…
वर्तमान में शेखर कुमार यादव इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश हैं।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से 1988 में लॉ ग्रेजुएट शेखर कुमार यादव ने 1990 में वकील के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन कराया था।
उन्हें 12 दिसंबर, 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था।
26 मार्च, 2021 को उन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।
अपनी पदोन्नति से पहले उत्तर प्रदेश राज्य के स्थायी वकील रहे।
भारत संघ के लिए अतिरिक्त स्थायी वकील रहे।
यूपी की अदालतों में रेलवे के लिए स्थायी वकील का पद संभाला था।
