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एंटीबायोटिक्स बेअसर होने से इलाज महंगा हुआ:नई मेडिसिन 10 गुना तक महंगी; निमोनिया-ब्लड इंफेक्शन जैसी बीमारियों में खतरा बढ़ा

बीमारी से जल्दी राहत दिलाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं अब इलाज में दम तोड़ने लगी हैं। सीसीयू और वेंटिलेटर वाले 25% मरीजों में कॉमन एंटीबायोटिक्स बेअसर हो चुकी हैं। 2-5% बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक्स ने काम करना लगभग बंद कर दिया है।

पिछले दिनों इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की रिपोर्ट में ये चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे यूरिनरी ट्रैक इंफेक्शन, निमोनिया, टाइफाइड और ब्लड इंफेक्शन जैसी बीमारियों में ये बेअसर हो रही हैं।

दैनिक भास्कर ने दिल्ली एम्स के आपातकालीन विभाग के प्रमुख प्रो. राकेश यादव और मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक एडिशनल प्रोफेसर नीरज निश्चल से इसके खतरों में बारे में विस्तार में जाना।

प्रो. राकेश यादव ने बताया कि एंटी बायोटिक्स बेअसर होने से मरीजों को हाई एंटीबायोटिक्स दवा दी जा रही है। ये न सिर्फ आठ से 10 गुना महंगी हैं, बल्कि मरीजों का हॉस्पिटल स्टे बढ़ जाता है, जिससे इलाज काफी महंगा हो जाता है।

2050 से हर साल इससे एक करोड़ मौतें हाेने की आशंका लैंसेट ने 200 देशों में किए अध्ययन से बताया, यदि एंटीबायोटिक्स को नियंत्रित नहीं किया गया तो 2050 से हर साल करीब 20 लाख लोगों की मौत एंटीबायोटिक्स रेजिस्टेंस से हो सकती हैं। वहीं, 80 लाख से अधिक मौतें दवाओं के रेजिस्टेंस संबंधी बीमारियों से हो सकती हैं। सर्दी-जुकाम में भी ले रहे एंटीबायोटिक्स, जो बिल्कुल गैरजरूरी मामूली सर्दी, खांसी और जुकाम में भी एंटीबायोटिक्स दे दी जाती है, जबकि इन बीमारियों में आमतौर पर इसकी कोई जरूरत ही नहीं होती है। एंटीबायोटिक्स की पूरी डोज नहीं लेने पर भी उससे रेजिस्टेंस का खतरा पैदा हो सकता है।

एंटीबायोटिक्स दवा एक्सपायर हो जाने के बाद खुले में फेंक देने पर भी वातावरण से उस बैक्टीरिया के खिलाफ शरीर में रेजिस्टेंस का खतरा है। लिहाजा एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल के साथ-साथ उसके डिस्पोजल के लिए भी सरकार को स्पष्ट नीति बनानी होगी। अभी हमारे देश में डिस्पोजल को लेकर किसी तरह के कोई सख्त दिशा-निर्देश तय नहीं हैं।

5-10 साल में कम उम्र वालों पर नई एंटीबायोटिक बेअसर होंगी डॉ. नीरज निश्चल कहते हैं, जितनी एंटीबायोटिक्स बेअसर हो रही हैं, उसकी तुलना में बेहद कम नई एंटीबायोटिक्स आ रही हैं। दरअसल, ह्यूमन और बैक्टीरिया दोनों में सर्वाइवल की लड़ाई चल रही है।

ऐसे में जब आप गैरजरूरी एंटीबायोटिक्स खाते हैं, तो शरीर के अंदर मौजूद बैक्टीरिया अपने आपको म्यूटेट करता है और उस एंटीबायोटिक्स के खिलाफ अपने आपको रेजिस्ट कर लेता है। ऐसी स्थिति में जब आपके शरीर में उस बैक्टीरिया से संक्रमण होता है और आप उसके लिए एंटीबायोटिक्स देते हैं तो वह बेअसर हो जाती है।

प्रो. राकेश यादव का कहना है कि कम उम्र में ही यदि नई एंटीबायोटिक्स दी जाने लगीं तो आने वाले पांच से 10 साल में ये उन पर बेअसर होने लग जाएंगी और यह भयावह स्थिति होगी। यदि समय रहते एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल और डिस्पोजल पर सख्ती नीति नहीं बनाई गई तो आने वाले समय में ऐसे मरीजों की संख्या लाखों में होगी और इनकी बीमारी लाइलाज हो सकती है।

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