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राज्यसभा उपचुनाव-12 सीटों में भाजपा के 5 कैंडिडेट निर्विरोध जीते:बिहार से दो और राजस्थान से एक उम्मीदवार; 7 सीटों पर 3 सितंबर को चुनाव

राज्यसभा उपचुनाव-12 सीटों में भाजपा के 5 कैंडिडेट निर्विरोध जीते:बिहार से दो और राजस्थान से एक उम्मीदवार; 7 सीटों पर 3 सितंबर को चुनाव

नई दिल्ली18 मिनट पहले
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और किरण चौधरी को राज्यसभा सीट से जीत का प्रमाण पत्र दिया गया।

9 राज्यों की 12 सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले ही भाजपा के 5 कैंडिडेट निर्विरोध चुन लिए गए हैं। इनमें राजस्थान से रवनीत सिंह बिट्टू, हरियाणा से किरण चौधरी, मध्यप्रदेश से जॉर्ज कुरियन, बिहार से उपेंद्र कुशवाहा और मनन कुमार मिश्रा शामिल हैं। पांचों कैंडिडेट्स को जीत का सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया है।

अब असम, महाराष्ट्र की दो-दो सीट, त्रिपुरा, तेलंगाना और ओडिशा की एक-एक सीट पर 3 सितंबर को उपचुनाव होना है।

बिहार से उपेंद्र कुशवाहा और मनन मिश्रा: बिहार से राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और मनन कुमार मिश्रा राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुन लिए गए हैं। मंगलवार को राज्यसभा उपचुनाव के लिए नाम वापस लेने की अंतिम तारीख थी। इन दोनों के अलावा किसी ने भी नामांकन नहीं किया। इसलिए नाम वापसी का समय समाप्त होने के बाद उन्हें जीत का सर्टिफिकेट विधानसभा सचिव की ओर से दे दिया गया।

राज्यसभा में उपेंद्र कुशवाहा का 2 साल, जबकि मनन मिश्रा का 4 साल कार्यकाल रहेगा। राजद नेत्री मीसा भारती और बीजेपी नेता विवेक ठाकुर का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ये दोनों सीटें खाली हुईं थी। अब राज्यसभा में बिहार से एनडीए का 10 सीटों पर कब्जा हो गया है। अभी बिहार में राज्यसभा की 16 सीटें हैं। पूरी खबर पढ़ें …

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और मनन कुमार मिश्रा राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुन लिए गए हैं।

हरियाणा से किरण चौधरी: हरियाणा में भाजपा की राज्यसभा उम्मीदवार किरण चौधरी निर्विरोध सांसद चुन ली गई हैं। मंगलवार को उन्हें रिटर्निंग ऑफिसर साकेत कुमार ने राज्यसभा सीट से निर्विरोध सांसद का प्रमाण पत्र दिया।

20 अगस्त को भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार घोषित किया था। 21 अगस्त को उन्होंने CM नायब सैनी की उपस्थिति में अपना नामांकन दाखिल किया। कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों की ओर से कोई भी उम्मीदवार खड़ा नहीं किया गया, इस कारण से किरण चौधरी का निर्विरोध राज्यसभा जाने का रास्ता बन गया। पूरी खबर पढ़ें …

पंजाब से रवनीत बिट्टू: पंजाब से केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्‌टू राज्यसभा सांसद बन गए हैं। मंगलवार को राज्यसभा उपचुनाव के नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख थी। इसके बाद परिणाम घोषित कर दिए गए। रवनीत सिंह के खिलाफ मैदान में कांग्रेस की तरफ से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा गया था। पूरी खबर पढ़ें …

किरण चौधरी को राज्यसभा सीट का प्रमाण पत्र देते रिटर्निंग ऑफिसर साकेत कुमार। उनके साथ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और CM नायब सैनी भी मौजूद रहे।

NDA के पास अब 106 सीटें
NDA के पास राज्यसभा में अभी 101 सीटें थीं। इन पांच सीटों पर जीत के बाद संख्या बढ़कर 106 हो गई है। इनमें भाजपा के पास 91 और सहयोगी दलों के पास 15 सीटें हैं। वहीं I.N.D.I.A गुट के पास 87 और बाकी के दलों के पास 28 सीटें हैं।

राज्यसभा में सांसदों की कुल संख्या 245 है। फिलहाल राज्यसभा में 230 सांसद हैं, जबकि 15 सीटें खाली हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर की 4 और नामित सदस्यों की 4 सीटें हैं। 5 सीटों पर निर्विरोध सांसद चुने जाने के बाद अब 3 सितंबर को 7 सीटों पर उपचुनाव होंगे।

10 साल में 55 से 106 तक पहुंची भाजपा
राज्यसभा में भाजपा 10 साल में 55 से 106 तक पहुंच गई। भाजपा के 2014 में 55 और 2019 में 78 सांसद थे। जून 2020 में यह संख्या 90 हो गई। इसके बाद पार्टी ने 11 सीटें जीतीं। इससे सदस्यों की संख्या 101 तक पहुंच गई। 1990 के ऐसा पहली बार हुआ था, जब किसी पार्टी ने 100 का आंकड़ा पार किया था।

कैसे खाली हुई हैं राज्यसभा की सीटें
राज्यसभा की कुल 20 खाली सीट में से जम्मू-कश्मीर से 4 और नामित सदस्यों की 4 सीटें हैं। 10 सीटें राज्यसभा सांसदों के लोकसभा चुनाव लड़ने और जीतने के कारण खाली हुई हैं। इसके अलावा एक सीट भारत राष्ट्र समिति (BRS) नेता के. केशव राव के कांग्रेस में जाने से खाली हुई है। दूसरी सीट ओडिशा से BJD सांसद ममता मोहंता के इस्तीफे के बाद खाली हुई। उन्होंने 31 जुलाई को पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दिया और भाजपा में शामिल हो गईं।

राज्यसभा में किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत होने का फायदा और नुकसान क्या है?
भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा का चुनाव इस तरह से होता है कि लोकसभा और राज्यसभा में किसी एक दल को एक समय पर स्पष्ट बहुमत मिलना मुश्किल होता है। अगर किसी बड़े दल के पास स्पष्ट बहुमत होता है तो इसका फायदा यह है कि छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों या निर्दलीय सांसदों की अपने समर्थन के बदले अनुचित मांगों को लेकर सरकार से मोलभाव करने की स्थिति खत्म हो जाती है।

हालांकि इसका नकारात्मक पहलू भी है। जब किसी एक दल के पास लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगहों पर बहुमत हो तो संसदीय कामकाज में आम सहमति बनाने की स्थिति कम हो जाती है। बड़ी पार्टी अपने मन से फैसला लेती है। वह छोटे और दूसरे दलों से सलाह नहीं लेती है। यह लोकतंत्र के लिए सेहतमंद स्थिति नहीं है।

1989 तक कांग्रेस पार्टी के पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत हुआ करता था। इस समय अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी। 1989 से लेकर आज तक सभी सरकारों को राज्यसभा में महत्वपूर्ण विधेयकों पारित कराने में छोटे-छोटे दलों को साधना पड़ा है या विपक्षी दलों के साथ मिलकर आम सहमति बनानी पड़ी है।

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